१७८५

1785 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है।

घटनाएँ

  • 15 जून- विश्व की पहली हवाई दुर्घटना में गुब्बारे से उड़ान भर रहे दो फ्रांसिसि नागरिकों की मृत्यु हो गई।

जन्म

अक्टूबर-दिसम्बर

निधन

ओज़ोन

'ओजोन'OZONE' (O3) आक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है जो वायुमण्डल में बहुत कम मत्रा (०.०२%) में पाई जाती हैं। समुद्र-तट से 30-32km की ऊँचाई पर इसकी सान्द्रता अधिक होती है। यह तीखे गंध वाली अत्यन्त विषैली गैस है।

'ओजोन'OZONE' (O3) आक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बनने वाली एक गैस है जो वायुमण्डल में बहुत कम मात्रा (०.०२%) में पाई जाती हैं। समुद्र-तट से 30-32km की ऊँचाई पर इसकी सान्द्रता अधिक होती है। यह तीखे गंध वाली अत्यन्त विषैली गैस है। जमीन के सतह के उपर अर्थात निचले वायुमंडल में यह एक खतरनाक दूषक है, जबकि वायुमंडल की उपरी परत ओजोन परत के रूप में यह सूर्य के पराबैंगनी विकिरण से पृथ्वी पर जीवन को बचाती है, जहां इसका निर्माण ऑक्सीजन पर पराबैंगनी किरणों के प्रभावस्वरूप होता है। ओजोन ऑक्सीजन का एक अपररूप है। यह समुद्री वायु में उपस्थित होती है।ऑक्सीजन की एक मंद शुष्क धारा नीरव विद्युत विसर्जन से गुजरे जाने पर ओजोन में परिवर्तित होती है।

क़ाजार राजवंश

क़ाजार राजवंश (फ़ारसी: سلسله قاجاریه‎, सिलसिला क़ाजारिया) तुर्कियाई नस्ल का एक राजघराना था जिसने सन् १७८५ ई॰ से १९२५ ई॰ तक ईरान पर राज किया। इस परिवार ने ज़न्द राजवंश के अंतिम शासक, लोत्फ़ अली ख़ान, को सत्ता से हटाकर सन् १७९४ तक ईरान पर पूरा क़ब्ज़ा जमा लिया। १७९६ में मुहम्मद ख़ान क़ाजार ने औपचारिक रूप से ईरान के शाह का ताज पहन लिया। क़ाजारों के दौर में ईरान ने फिर से कॉकस के कई भागों पर हमला किया और उसे अपनी रियासत का हिस्सा बना लिया।

कुड्डलोर

कुड्डलोर (Cuddalore) भारत के तमिल नाडु राज्य के कुड्डलोर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह उस ज़िले का मुख्यालय भी है।

चार्ल्स मैटकाफ

सर चार्ल्स मैटकाफ (१७८५-१८४६) भारत के गवर्नर जनरल रहे थे।

इनका जन्म कलकत्ते में सेना के एक मेजर के घर सन् १७८५ ईसवीं में हुआ। प्रारंभ से ही इनका अनेक भाषाओं की ओर रुझान रहा। १५ वर्ष की उम्र में कंपनी की नौकरी में एक क्लर्क के रूप में प्रविष्ट हुए। शीघ्र ही गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली की, जिसे योग्य व्यक्तियों को पहचानने की अपूर्व क्षमता थी, निगाह इनके ऊपर पड़ी और आपने महाज सिंधिया के दरबार में स्थित रेजीडेंट के सहायक के पद से अपना कार्य प्रारंभ कर, अनेक पदों पर कार्य किया। सन् १८०८ में इन्होने अंग्रेजी राजदूत की हैसियत से सिक्ख महाराजा रणजीत सिंह को अपनी विस्तार नीति को सीमित करने पर बाध्य कर दिया तथा सन् १८०९ ई० की अमृतसर की मैत्रीपूर्ण संधि का महाराज रणजीत सिंह ने यावज्जीवन पालन किया। गर्वनर जनरल लार्ड हेंसटिंग्ज ने इनके माध्यम से ही विद्रोही खूखाँर पठान सरदार अमीर खान तथा अंग्रेजों के बीच संधि कराई। भरतपुर के सुदृढ़ किले को भी नष्ट करने में आपका योगदान था। सन् १८२७ में इन्हे नाइट पदवी से विभूषित किया गया। जब आगरे का नया प्रांत बना तो आपको ही उसका प्रथम गवर्नर मनोनीत किया गया। थोड़े ही दिनों में इनको अस्थायी गवर्नर जनरल बनाया गया। इस कार्यकाल का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भारतीय प्रेस को स्वतंत्र बनाना था। सन् १८३८ ईसवीं में ये स्वदेश लौट गए। तदुपरांत इन्होने जमायका के गवर्नर का तथा कनाडा के गर्वनर-जनरल का पदभार संभाला। अंत में १८४६ में कैंसर के भीषण रोग से इनकी मृत्यु हो गई।

जॉन ऐडम्स

जॉन ऐडम्स (१७३५-१८२६) प्रसिद्ध विद्वान्, सफल विधिज्ञ तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के दूसरे राष्ट्रपति थे। इनका कार्यकाल १७९७ से १८०१ तक था। ये फ़ेडरलिस्ट पार्टी से थे।

जॉन जे

जॉन जे (John Jay) एक अमेरिकी राजनेता और १७८९-१७९५ काल में उस देश के पहले मुख्य न्यायाधीश थे। उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपिताओं में से एक समझा जाता है।

१७७६ में अमेरिका को अपने स्वतंत्रता संग्राम में विजय मिलने के बाद उन्होंने उस देश में एक संगठित और सशक्त केन्द्रीय सरकार बनाने पर जोर दिया और इस विचार पर आधारित प्रस्तावित संविधान को स्वीकृति मिलने के लिए भरसक प्रयत्न किया। कई राजनेता इसके विरोध में थे और वे चाहते थे कि अमेरिका के तेराह उपनिवेश एक सूत्र में बंधने की बजाए अलग-अलग राष्ट्रों की तरह हों। जॉन जे ने जेम्ज़ मैडिसन और ऐलॅक्सैण्डर हैमिलटन के साथ मिलकर १७८८ में 'फ़ेडेरेलिस्ट पेपर्ज़​' (अर्थ: संघ-समर्थक काग़ज़ात​') के नाम से संविधान के लिए समर्थन बनवाने के लिए एक लेखों की शृंखला प्रकाशित की। १७८९ में यह संविधान मंज़ूर होने के बाद लागू हो गया।

फिर वे फ़ेडेरेलिस्ट पार्टी नमक राजनैतिक दल के नेता रहे और १७९५-१८०१ काल में न्यू यॉर्क राज्य के राज्यपाल रहे। वे अमेरिका की उस समय की दासप्रथा के सख़्त​ विरोध में थे और उन्होंने न्यू यॉर्क में इसे बंद करवाने की बहुत कोशिस करी। १७७७ और १७८५ में उनके पहले दो प्रयास नाकाम रहे लेकिन १७९९ में उन्होंने दासों को धीरे-धीरे आज़ाद करवाने का विधेयक पारित करवा लिया और उनकी १८२९ में हुई मृत्यु से पहले ही न्यू यॉर्क के सभी दास मुक्त किये जा चुके थे।

देहरादून जिला

देहरादून, भारत के उत्तराखंड राज्य की राजधानी है इसका मुख्यालय देहरादून नगर में है। इस जिले में ६ तहसीलें, ६ सामुदायिक विकास खंड, १७ शहर और ७६४ आबाद गाँव हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ १८ गाँव ऐसे भी हैं जहाँ कोई नहीं रहता। देश की राजधानी से २३० किलोमीटर दूर स्थित इस नगर का गौरवशाली पौराणिक इतिहास है। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह नगर अनेक प्रसिद्ध शिक्षा संस्थानों के कारण भी जाना जाता है। यहाँ तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय पेट्रोलियम संस्थान आदि जैसे कई राष्ट्रीय संस्थान स्थित हैं। देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान, भारतीय राष्ट्रीय मिलिटरी कालेज और इंडियन मिलिटरी एकेडमी जैसे कई शिक्षण संस्थान हैं। यह एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। अपनी सुंदर दृश्यवाली के कारण देहरादून पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और विभिन्न क्षेत्र के उत्साही व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। विशिष्ट बासमती चावल, चाय और लीची के बाग इसकी प्रसिद्धि को और बढ़ाते हैं तथा शहर को सुंदरता प्रदान करते हैं।

देहरादून दो शब्दों देहरा और दून से मिलकर बना है। इसमें देहरा शब्द को डेरा का अपभ्रंश माना गया है। जब सिख गुरु हर राय के पुत्र रामराय इस क्षेत्र में आए तो अपने तथा अनुयायियों के रहने के लिए उन्होंने यहाँ अपना डेरा स्थापित किया। कालांतर में नगर का विकास इसी डेरे का आस-पास प्रारंभ हुआ। इस प्रकार डेरा शब्द के दून शब्द के साथ जुड़ जाने के कारण यह स्थान देहरादून कहलाने लगा। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि देहरा शब्द स्वयं में सार्थकता लिए हुए है, इसको डेरा का अपभ्रंश रूप नहीं माना जा सकता है। देहरा शब्द हिंदी तथा पंजाबी में आज भी प्रयोग किया जाता है। हिंदी में देहरा का अर्थ देवग्रह अथवा देवालय है, जबकि पंजाबी में इसे समाधि, मंदिर तथा गुरुद्वारे के अर्थो में सुविधानुसार किया गया है। इसी तरह दून शब्द दूण से बना है और यह दूण शब्द संस्कृत के द्रोणि का अपभ्रंश है। संस्कृत में द्रोणि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है। यह भी विश्वास किया जाता है कि यह पूर्व में ऋषि द्रोणाचार्य का डेरा था।

पतला लोरिस

पतला लोरिस (Slender loris) भारत और श्रीलंका में मिलने वाला लोरिस का एक वंश है।

पैराशूट

दुनिया में पहला व्यावहारिक रूप से सफल पैराशूट बनाने का श्रेय फ्रांसीसी नागरिक लुइ सेबास्तियन लेनोर्मां को जाता है, जिन्होंने वर्ष १७८३ में इसका पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। हालांकि पंद्रहवीं सदी के दौरान लिओनार्दो दा विंची ने सबसे पहले पैराशूट की कल्पना करते हुए इसका रेखाचित्र भी तैयार किया था। दा विंची की इस डिजाइन से प्रेरणा लेकर फॉस्ट ब्रांसिस ने वर्ष १६१७ में एक सख्त फ्रेम वाला पैराशूट पहनकर वेनिस टॉवर से छलांग लगाई थी। उन्होंने अपने इस पैराशूट को होमो वोलंस नाम दिया था। हालांकि आपातकाल में पैराशूट के इस्तेमाल का पहला प्रयोग १७८५ में फ्रांसीसी नागरिक ज्यां पियरे ब्लांचार्ड ने किया था, जिन्होंने ऊंचाई पर तैर रहे एक हॉट एयर बैलून से एक कुत्ते को पैराशूट बंधी टोकरी के जरिए नीचे गिराया था। ब्लांचार्ड ने ही पहली बार सिल्क के कपड़े से तह करने लायक पैराशूट तैयार किया था। इसे इस्तेमाल करना भी आसान था। १७९७ में फ्रांस के आंद्रे गार्नेरिन ने पहली बार इसी तरह के पैराशूट के जरिए सफल जंप को अंजाम दिया था। गार्नेरिन ने कंपन कम करने के इरादे से इसमें कुछ और सुधार किया और इस तरह पहला छिद्रित पैराशूट अस्तित्व में आया।

बुसी

बुसी (Charles Joseph Patissier, Marquis de Bussy-Castelnau ; १७१८-१७८५ ई.) फ्रांस का यशस्वी सेनानायक तथा सफल कूटनीतिज्ञ था। प्रथम कर्नाटक युद्ध के समय वह लाबूर्दने के साथ पुद्दुचेरी पहुँचा। अंबर के युद्ध (१७४८) में वह डूप्ले का विश्वासपात्र बना।

डूप्ले की साम्राज्य-निर्माण-योजना कार्यान्वित करने में बुसी ने विशेष कौशल दिखाया। इससे भारत में फ्रांसीसियों की प्रतिष्ठा बढ़ी। १७५० में जिंजी की विजय बुसी की पहली सफलता थी। १७५१ में पाँडिचेरी से औरंगाबाद तक उसका प्रयाण तथा मार्ग में मुजफ्फरजंग की मृत्यु के बाद सलाबतजंग को निज़ाम घोषित करके आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुओं से उसे सुरक्षित बनाना उसकी बड़ी सफलता थी। इससे दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों की धाक जम गई; सैनिक खर्च के लिए उन्हें उत्तरी सरकार के जिले मिले; डूप्ले को कृष्णा नदी के दक्षिण के प्रदेश की सूबेदारी मिली; तथा अंग्रेजों की सभी चालें विफल हुईं।

तृतीय कर्नाटक युद्ध के समय बुसी को हैदराबाद से वापस बुलाया गया। फलत: फ्रांसीसी प्रभाव वहाँ से जाता रहा तथा उत्तरी सरकार प्रदेश उनसे छिन गया। मद्रास के घेरे तथा वांडीवाश के युद्ध में बुसी ने लैली को हार्दिक सहायता दी। सन् १७६० ई में अंग्रेजों ने उसे बंदी बना लिया और संधि हो जाने पर फ्रांस भेज दिया।

सन् १७८३ ई. में वह पुन: भारत आया और कुदालोर में उसने अंग्रेजों से रक्षात्मक युद्ध किया। युद्ध समाप्त होने पर उसे भारत में फ्रांसीसियों का भविष्य निराशाजनक प्रतीत हुआ। १७८५ में उसका देहान्त हो गया।

मांझी विद्रोह

मांझी विद्रोह १७८४ में तिलका मांझी के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ आंदोलन है। १७८५ में तिलका मांझी को फांसी दे देने के बाद इसका नेतृत्व भागीरथी मांझी ने किया।

मास्को

मास्को या मॉस्को (रूसी: Москва́ (मोस्कवा)), रूस की राजधानी एवं यूरोप का सबसे बडा शहर है, मॉस्को का शहरी क्षेत्र दुनिया के सबसे बडे शहरी क्षेत्रों में गिना जाता है। मास्को रूस की राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, वित्तीय एवं शैक्षणिक गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है। यह मोस्कवा नदी के तट पर बसा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से यह पुराने सोवियत संघ एवं प्राचीन रूसी साम्राज्य की राजधानी भी रही है। मास्को को दुनिया के अरबपतियों का शहर भी कहा जाता है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा अरबपति बसते हैं। २००७ में मास्को को लगातार दूसरी बार दुनिया का सबसे महंगा शहर भी घोषित किया गया था।

वंशराज पाँडे

वंशराज पाँडे नेपाली सेनाका उच्च पदस्थ अधिकारी और प्रशासकीय अधिकारी थे । गोरखा के पाँडे वंशके काजी कालु पांडेके ज्येष्ठ पुत्र थे। उनको राजा प्रतापसिंह शाहने देवान (प्रधानमंत्री) बनाया था। राजा रणबहादुर शाहके समयमें काजी स्वरुप सिंह कार्की के दरबारिया षड्यन्त्र में राजमाता रानी राजेन्द्र लक्ष्मी ने वंशराज को मृत्यदण्ड दिया था ।

वाराणसी

यह लेख वाराणसी (बनारस) शहर के लिये है। काशी हेतु देखें काशी

वाराणसी (अंग्रेज़ी: Vārāṇasī, हिन्दुस्तानी उच्चारण: [ʋaːˈɾaːɳəsiː] ( सुनें)) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का प्रसिद्ध नगर है। इसे 'बनारस' और 'काशी' भी कहते हैं। इसे हिन्दू धर्म में सर्वाधिक पवित्र नगरों में से एक माना जाता है और इसे अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है। इसके अलावा बौद्ध एवं जैन धर्म में भी इसे पवित्र माना जाता है। यह संसार के प्राचीनतम बसे शहरों में से एक और भारत का प्राचीनतम बसा शहर है।काशी नरेश (काशी के महाराजा) वाराणसी शहर के मुख्य सांस्कृतिक संरक्षक एवं सभी धार्मिक क्रिया-कलापों के अभिन्न अंग हैं। वाराणसी की संस्कृति का गंगा नदी एवं इसके धार्मिक महत्त्व से अटूट रिश्ता है। ये शहर सहस्रों वर्षों से भारत का, विशेषकर उत्तर भारत का सांस्कृतिक एवं धार्मिक केन्द्र रहा है। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बनारस घराना वाराणसी में ही जन्मा एवं विकसित हुआ है। भारत के कई दार्शनिक, कवि, लेखक, संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, त्रैलंग स्वामी, शिवानन्द गोस्वामी, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।वाराणसी में चार बड़े विश्वविद्यालय स्थित हैं: बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइयर टिबेटियन स्टडीज़ और संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय। यहां के निवासी मुख्यतः काशिका भोजपुरी बोलते हैं, जो हिन्दी की ही एक बोली है। वाराणसी को प्रायः 'मंदिरों का शहर', 'भारत की धार्मिक राजधानी', 'भगवान शिव की नगरी', 'दीपों का शहर', 'ज्ञान नगरी' आदि विशेषणों से संबोधित किया जाता है।प्रसिद्ध अमरीकी लेखक मार्क ट्वेन लिखते हैं: "बनारस इतिहास से भी पुरातन है, परंपराओं से पुराना है, किंवदंतियों (लीजेन्ड्स) से भी प्राचीन है और जब इन सबको एकत्र कर दें, तो उस संग्रह से भी दोगुना प्राचीन है।"

विलियम बाउमैन

विलियम बाउमैन (सन् १७८५ - १८५३) अमरीकी सेना में शरीरक्रिया वैज्ञानिक थे जो 'जठर क्रियाविज्ञान के जनक' (Father of Gastric Physiology) कहे जाते हैं। इनहोने मानव के पाचनतंत्र पर बहुत महत्वपूर्ण कार्य किया था।

इनका जन्म कृषक परिवार में हुआ था। यह कुशाग्रबुद्धि बालक आगे चलकर प्रसिद्ध वैज्ञानिक हुआ। चिकित्सा विज्ञान की शिक्षा इन्होंने वैयक्तिक रूप से एक चिकित्सक से पाई और वरमांट राज्य की तृतीय मेडिकल सोसायिटी से चिकित्सावृत्ति का लाइसेंस प्राप्त किया। बाद में ये अमरीकी सेना में सर्जन के पद पर नियुक्त हो गए।

शरीररचना और उसके कार्य से संबंधित अनेक बातें उन दिनों अज्ञात थीं। बाउमैंन ने अनुसन्धान किया और बताया कि आमाशय के पाचक रस क्या कार्य करते हैं और कब तक किन अवस्थाओं में यह रस नहीं बनता। बाउमैन ने पाचन के रासायनिक रूप की सूत्रमाण स्थापना की। इन कार्यों की उनके शोधप्रबंध एक्सपेरिमेंट्स ऐंड आब्ज़रवेशंस में विस्तार से चर्चा है। शरीर क्रिया विज्ञान में बाउमैन का अनुदान महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने प्रयोग और अवलोकन को नई दिशा प्रदान की।

सन्त चरणदास

सन्त चरणदास (१७०६ - १७८५) भारत के योगाचार्यों की श्रृंखला में सबसे अर्वाचीन योगी के रूप में जाने जाते है। आपने 'चरणदासी सम्प्रदाय' की स्थापना की। इन्होने समन्वयात्मक दृष्टि रखते हुए योगसाधना को विशेष महत्व दिया।

हिलियम

हिलियम (अंग्रेज़ी: Helium) एक रासायनिक तत्त्व है जो प्रायः गैसीय अवस्था में रहता है। यह एक निष्क्रिय गैस या नोबेल गैस (Noble gas) है तथा रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, विष-हीन (नॉन-टॉक्सिक) भी है। इसका परमाणु क्रमांक २ है। सभी तत्वों में इसका क्वथनांक (boiling point) एवं गलनांक (melting point) सबसे कम है। द्रव हिलियम का प्रयोग पदार्थों को अत्यन्त कम ताप तक ठण्डा करने के लिये किया जाता है; जैसे अतिचालक तारों को १.९ डिग्री केल्विन तक ठण्डा करने के लिये।

हीलियम अक्रिय गैसों का एक प्रमुख सदस्य है। इसका संकेत He, परमाणुभार ४, परमाणुसंख्या २, घनत्व ०.१७८५, क्रांतिक ताप -२६७.९०० और क्रांतिक दबाव २ २६ वायुमंडल, क्वथनांक -२६८.९० सें. और गलनांक -२७२ डिग्री से. है। इसके दो स्थायी समस्थानिक He3, परमाण्विक द्रव्यमान ३.०१७० और He4, परमाण्विक द्रव्यमान ४.००३९ और दो अस्थायी समस्थानिक He5, परमाण्विक द्रव्यमान ५.०१३७ और रेडियोएक्टिव He6, परमाण्विक द्रव्यमान ६.०२८ पाए गए हैं।

हेरासिम स्तेपनोविच लेबिदोव

हेरासिम स्तेपनोविच लेबिदोव (रूसी: Герасим Степанович Лебедев १७४९-१८१७) एक रूसी भाषाविद थे। वे सन् १७८५ से सन् १८०० ईस्वी की अवधि में भारत में रहे। भारत में रहकर इन्होंने हिन्दी सीखी तथा हिन्दी का व्याकरण तैयार किया। इनका व्याकरण अपेक्षाकृत अधिक प्रमाणिक है। सन् १८०१ ईस्वी में इन्होंने यह व्याकरण अपने व्यय से लंदन में प्रकाशित कराया। व्याकरण ग्रन्थ का नाम है - ‘ग्रामर ऑफ द प्योर एण्ड मिक्स्ड ईस्ट इंडियन डाइलेक्ट्स'।

१७८५ ईसा पूर्व

१७८५ ईसा पूर्व ईसा मसीह के जन्म से पूर्व के वर्षों को दर्शाता है। ईसा के जन्म को अधार मानकर उसके जन्म से १७८५ ईसा पूर्व या वर्ष पूर्व के वर्ष को इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है। यह जूलियन कलेण्डर पर अधारित एक सामूहिक वर्ष माना जाता है। अधिकांश विश्व में इसी पद्धति के आधार पर पुराने वर्षों की गणना की जाती है। भारत में इसके अलावा कई पंचाग प्रसिद्ध है जैसे विक्रम संवत जो ईसा के जन्म से ५७ या ५८ वर्ष पूर्व शुरु होती है। इसके अलावा शक संवत भी प्रसिद्ध है। शक संवत भारत का प्राचीन संवत है जो ईसा के जन्म के ७८ वर्ष बाद से आरम्भ होता है। शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

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