१७७१

1771 ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है।

घटनाएँ

अक्टूबर-दिसम्बर

जन्म

अक्टूबर-दिसम्बर

निधन

अल्फाबेतुम ब्रम्हानिकुम

अल्फाबेतुम ब्रम्हानिकुम कैसियानो बेलिगत्ती द्वारा लैटिन भाषा में लिखा हुआ हिंदी व्याकरण का ग्रंथ है। इसका प्रकाशन सन १७७१ ईस्वी में हुआ। इसकी विशेषता यह है कि इसमें नागरी के अक्षर एवं शब्द सुन्दर टाइपों में मुद्रित हैं। ग्रियर्सन के अनुसार यह हिन्दी वर्णमाला सम्बन्धी श्रेष्ठ रचना है। अल्फाबेतुम यूनानी भाषा का शब्द है जिससे अंग्रेज़ी का अलफ़ाबेट शब्द बना है। इसका अर्थ अक्षरमाला है। इस पुरस्तक के अध्याय एक में स्वर, अध्याय दो में मूल व्यंजन, अध्याय तीन में व्यंजनों के उच्चारण के विशेष विवरण, अध्याय चार में व्यंजनों के साथ स्वरों का संयोग, अध्याय पाँच में स्वर-संयुक्त व्यंजन, अध्याय छह में संयुक्ताक्षर और उनके नाम, अध्याय सात में संयुक्ताक्षर की तालिका, अध्याय आठ में किस प्रकार हिन्दुस्तानी कुछ अक्षरों की कमी पूरी करते हैं, अध्याय नौ में नागरी या जनता की वर्णमाला, अध्याय दस में हिन्दुस्तानी वर्णमाला की लैटिन वर्णमाला के क्रम और उच्चारण के साथ तुलना, अध्याय ग्यारह में अरबी अंकों के साथ हिन्दुस्तानी अंकों और अक्षरों में संख्याएं तथा अध्याय बारह में अध्येताओं के अभ्यास के लिए कुछ प्रार्थनाएं भी हिन्दुस्तानी लिपि में दी गई हैं। इसमें लैटिन प्रार्थनाओं का हिन्दुस्तानी लिपि में केवल लिप्यंतरण मिलता है। अंत में हिन्दुस्तानी भाषा में हे पिता आदि प्रार्थनाएं अनूदित हैं। इस रचना की भूमिका इटली की राजधानी रोम में ईसाई धर्म के प्रचारार्थ संस्था प्रोपगन्दा फीदे के अध्यक्ष योहन ख्रिस्तोफर अमादुसी ने लिखी थी। इस पुस्तक की भूमिका से यह स्पष्ट होता है कि सन १७७१ ईस्वी में भी नागरी लिपि में लिखी जनभाषा हिन्दी या हिन्दुस्तानी का राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार था। जो विदेशी उस समय भारत में व्यापार करने के लिए अथवा घूमने फिरने के लिए आते थे, वे भारत आने के पूर्व इसको सीखते थे तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसके माध्यम से अपना कार्य सम्पन्न करते थे।

कैसियानो बेलिगत्ती

कैसियानो बेलिगत्ती कैथलिक कैपूचिन मिशनरी इटली के मचेराता नगर के रहने वाले हिन्दी के विद्वान थे। आरम्भ में इन्होंने तिब्बत में कार्य किया था। बाद में नेपाल होकर बिहार के बेतिया नगर में आ बसे। इन्होंने पटना में भी धर्म प्रचार का कार्य किया। पटना में रहकर इन्होंने अल्फाबेतुम ब्रम्हानिकुम का लैटिन भाषा में प्रणयन किया। इसका प्रकाशन सन १७७१ ईस्वी में हुआ। इसकी विशेषता यह है कि इसमें नागरी के अक्षर एवं शब्द सुन्दर टाइपों में मुद्रित हैं। ग्रियर्सन के अनुसार यह हिन्दी वर्णमाला सम्बन्धी श्रेष्ठ रचना है।इस पुस्तक के अध्याय एक में स्वर, अध्याय दो में मूल व्यंजन, अध्याय तीन में व्यंजनों के उच्चारण के विशेष विवरण, अध्याय चार में व्यंजनों के साथ स्वरों का संयोग, अध्याय पाँच में स्वर-संयुक्त व्यंजन, अध्याय छह में संयुक्ताक्षर और उनके नाम, अध्याय सात में संयुक्ताक्षर की तालिका, अध्याय आठ में किस प्रकार हिन्दुस्तानी कुछ अक्षरों की कमी पूरी करते हैं, अध्याय नौ में नागरी या जनता की वर्णमाला, अध्याय दस में हिन्दुस्तानी वर्णमाला की लैटिन वर्णमाला के क्रम और उच्चारण के साथ तुलना, अध्याय ग्यारह में अरबी अंकों के साथ हिन्दुस्तानी अंकों और अक्षरों में संख्याएं तथा अध्याय बारह में अध्येताओं के अभ्यास के लिए कुछ प्रार्थनाएं भी हिन्दुस्तानी लिपि में दी गई हैं। इसमें लैटिन प्रार्थनाओं का हिन्दुस्तानी लिपि में केवल लिप्यंतरण मिलता है। अंत में हिन्दुस्तानी भाषा में हे पिता आदि प्रार्थनाएं अनूदित हैं। अध्याय नौ के अंतर्गत जनता की वर्णमाला पर प्रकाश डालते हुए लेखक ने लिखा है कि इस भाषा का नाम भाखा है और यह जन सामान्य के प्रयोग की भाषा है। इस रचना की भूमिका इटली की राजधानी रोम में क्रिश्चियन धर्म के प्रचारार्थ संस्था प्रोपगन्दा फीदे के अध्यक्ष योहन ख्रिस्तोफर अमादुसी ने लिखी। डॉ॰ जार्ज ग्रियर्सन ने इस भूमिका को बहुत महत्व दिया। भूमिका में हिन्दुस्तानी भाषा की सार्वदेशिक व्यवहार की भूमिका स्पष्ट रूप में प्रतिपादित है। इस भूमिका से यह स्पष्ट होता है कि सन १७७१ ईस्वी में भी नागरी लिपि में लिखी जनभाषा हिन्दी या हिन्दुस्तानी का राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार था। जो विदेशी उस समय भारत में व्यापार करने के लिए अथवा घूमने फिरने के लिए आते थे, वे भारत आने के पूर्व इसको सीखते थे तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसके माध्यम से अपना कार्य सम्पन्न करते थे। इन तीन रचनाकृतियों का ऐतिहासिक महत्व बताते हुए इनके समेकित महत्व की डॉ॰ उदय नारायण तिवारी ने सारगर्भित विवेचना की है। इन तीनों रचनाओं को श्री मैथ्यु वेच्चुर ने लैटिन से हिन्दी में अनूदित किया है, जो स्वयं एक भाषाविद थे।

जीवविज्ञान का इतिहास

c. ७०० BCE - सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता की रचना की जिसमें शल्यचिकित्सा में प्रयुक्त १२० से अधिक उपकरणों का विवरण है। इसमें शल्यचिकित्सा की ३०० प्रक्रियाओं का भी वर्णन है। इसमें मानव की शल्यचिकित्सा को ८ श्रेणीयों में बांटा गया है। सुश्रुत प्रथम सौंदर्यचिकित्सक (cosmetic surgeon) थे।c. ३५० BCE - अरस्तू ने जीवों के समग्र वर्गीकरण की कोशिश की।c. ३२० BCE - थियोफ्रेटस ने वनस्पति विज्ञान का विधिवत अध्ययन शुरू किया।c. ३०० BCE - डायोक्लीज ने शरीररचना पर प्रथम ज्ञात पुस्तक लिखी।१६५८ - जन स्वामर्दम (Jan Swammerdam) ने सूक्ष्मदर्शी के द्वारा लाल रक्त कणिकाओं को देखा।१६६३ - रॉबर्ट हुक ने सूक्ष्मदर्शी में कॉर्क की कोशिकाओं को देखा।१६७६ - एंटन वॉन ल्युवेनहुक (Anton van Leeuwenhoek) ने प्रोटोजोवा एवं कोशिकाओं को देखा और उन्हें 'एनिमलक्युल' (animalcules) नाम दिया।१७७१ - जोजफ प्रिस्टले (Joseph Priestley) ने यह खोज की कि पौधे कार्बन डाई आक्साइड को आक्सीजन में बदलते है।१८०१ -- जीन बैपटिस्ट डी लैमार्क ने अकशेरुक प्राणियों का विस्तृत वर्गीकरण की शुरुआत की।१८२८ - फ्रेडरिक वुहलर (Friedrich Woehler) ने यूरिया का संश्लेषण किया। यह किसी कार्बनिक यौगिक का प्रथम संश्लेषण था।१८५६ - लुई पास्चर (Louis Pasteur) ने बताया कि किण्वन (fermentation) के पीछे सूक्ष्म जीवों (microorganisms) का हाथ है।१८५८ - डार्विन (Charles R. Darwin) तथा अल्फ्रेड वैलेस ने स्वतंत्र रूप से प्राकृतिक चयन का सिद्धान्त दिया।१८६५ - ग्रेगर मेंडल (Gregor Mendel) ने मटर के पौधों में किये संकरण (crossbreeding) के प्रयोगों को प्रकाशित किया।१९१७ - जगदीश चन्द्र बसु ने पौधों की वृद्धि को नापने वाला यंत्र (क्रेस्कोग्राफ) बनाया।१९५३ - जेम्स वाटसन (James Watson) तथा फ्रांसिस क्रिक (Francis Crick) ने डीएनए का 'डबल हेलिक्स मॉडल' प्रस्तुत किया।१९५३ - स्टैन्ले मिलर (Stanley Miller) ने प्रदर्शित किया कि जल, मिथेन, अमोनिया एवं हाइड्रोजन वाले एक बर्तन में प्रकाश डालने से अमिनो अम्ल का निर्माण किया जा सकता है।१९६० - रॉर्बर्ट वुडवर्ड (Robert Woodward) ने पर्णहरित का सम्श्लेषण किया१९६७ - जॉन गर्डन (John Gurden) नाभिकीय ट्रांसप्लांटेशन का उपयोग करके मेढ़क का क्लोन बनाया जो कशेरूकधारियों का पहला क्लोन था।

डूक लंगूर

डूक लंगूर (douc langur) या सिर्फ़ डूक (douc) दक्षिणपूर्व एशिया में मिलने वाला लंगूरकुल का एक पूर्वजगत बंदर वंश है।

थैचड हाउस लॉज

थैचड हाउस लॉज एक ग्रेड-२ सूचित भवन है, जोकि रिचमंड पार्क, लंदन, इंग्लैंड में स्थित है। यह एक एक निजी तौर पर खरीद गया शाही निवास है। वर्ष १९६३ से ही यह राजकुमारी ऐलेक्ज़ैंड्रा का घर रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ड्वाइट डी. आइजनहावर यहाँ रहते था मुख्य भवन में छह रिसेप्शन रूम और छे बेडरूम हैं। यह कुल चार एकर की भूमि में स्थित है। इसके अलावा इस प्रांगण में कई बगीचे, अस्तबल और एक १८वीं सदी का टालिदार समर हाउस है(जिसके कारण इसका नाम पड़ा) और कुछ अन्य भवन हैं।

नवकलेवर

नवकलेवर अधिकांश जगन्नाथ मंदिरों से जुड़ा एक प्राचीन उत्सव है जब भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन की पुरानी मूर्तियों को बदलकर नयी मूर्तियाँ स्थापित की जातीं हैं। नवकलेवर = नव+कलेवर, अर्थात जगन्नाथ, बलभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करते हैं।

परम्परानुसार नवकलेवर का कार्य तब किया जाता है जब आषाढ़ मास अधिकमास होता है। यह प्रायः ८ वर्ष बाद, ११ वर्ष बाद या १९ वर्ष बाद आता है। ये मूर्तियाँ एक विशेष प्रकार की नीम की लकड़ी से बनायीं जाती हैं जिसे 'दारु ब्रह्म' कहते हैं। चैत्र मास से ही इस उत्सव की तैयारियाँ आरम्भ हो जातीं हैं। पिछली बार यह १९९६ में हुआ था। अगला नवकलेवर २०१५ में होना है जिसमें ३० लाख से भी अधिक श्रद्धालुओं के दर्शन करने की आशा है।

इसके पूर्व नवकलेवर १७३३, १७४४, १७५२, १७७१, १७९०, १८०९, १८२८, १८३६, १८५५, १८७४, १८९३, १९१२, १९३१, १९५०, १९६९, १९७७ और १९९६ में हुआ था।

प्रदेश संख्या १

प्रदेश संख्या १ नेपाल के सात प्रदेशों में से एक है। २० सितम्बर २०१५ को लागू हुए संविधान में नए सात प्रदेशों का प्रावधान है। इस प्रदेश का नामांकन प्रदेश संसद (विधान परिषद) द्वारा किया जाएगा। इसकी राजधानी कहाँ होगी यह भी प्रदेश संसद द्वारा निर्धारित किया जाएगा।

इस प्रदेश के पूर्व में भारत का सिक्किम राज्य है तथा साथ में पश्चिम बंगाल का उत्तरी हिस्सा दार्जीलिंग सटा हुआ है। उत्तर में हिमालय के उस पार तिब्बत स्थित है रही तो दक्षिण में भारत का बिहार स्थित है।

२५,९०५ वर्ग किमी के क्षेत्रफल में ४४ निर्वाचन क्षेत्र फैले हुए हैं। १०,४३८ किमी२ का क्षेत्रफल पर्वतों से घिरा हुआ है, १०,७४९ किमी२ का क्षेत्रफल पहाड़ी है और पूर्वी तराई का फैलाव ४,७१८ किमी२ में है।

निपआ. (निर्वाचन परिसीमन आयोग) के रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश संख्या १ में एफपीटीपी (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट निर्वाचन) पद्धति के तहत २८ संसदीय सीट और ५६ प्रादेशिक सीट होंगे।२०११ के जनगणना के अनुसार, इस राज्य में लगभग ४५ लाख लोग रहते हैं, जिसका जनसंख्या घनत्व १७५.६ प्रति वर्ग किलमीटर है।

बिहार का आधुनिक इतिहास

आधुनिक बिहार का संक्रमण काल १७०७ ई. से प्रारम्भ होता है। १७०७ ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजकुमार अजीम-ए-शान बिहार का बादशाह बना। जब फर्रुखशियर १७१२-१९ ई. तक दिल्ली का बादशाह बना तब इस अवधि में बिहार में चार गवर्नर बने। १७३२ ई. में बिहार का नवाब नाजिम को बनाया गया।

महादजी शिंदे

महादजी शिंदे (या, महादजी सिंधिया ; १७३० -- १७९४) मराठा साम्राज्य के एक शासक थे जिन्होंने ग्वालियर पर शासन किया। वे सरदार राणोजी राव शिंदे के पाँचवे तथा अन्तिम पुत्र थे।

शिंदे (अथवा सिंधिया) वंश के संस्थापक राणोजी शिंदे के पुत्रों में केवल महादजी पानीपत के तृतीय युद्ध से जीवित बच सके। तदनंतर, सात वर्ष उसके उत्तराधिकार संघर्ष में बीते (१७६१-६८)। स्वाधिकार स्थापन के पश्चात् महादजी का अभूतपूर्व उत्कर्ष आरंभ हुआ (१७६८)। पेशवा के शक्तिसंवर्धन के साथ, उसने अपनी शक्ति भी सुदृढ़ की। पेशवा की ओर से दिल्ली पर अधिकार स्थापित कर (१० फरवरी, १७७१), उसने शाह आलम को मुगल सिंहासन पर बैठाया (६ जनवरी, १७७२)। इस प्रकार, पानीपत में खोये, उत्तरी भारत पर मराठा प्रभुत्व का उसने पुनर्लाभ किया। माधवराव की मृत्यु से उत्पन्न अव्यवस्था तथा उससे उत्पन्न आंग्ल-मराठा युद्ध में उसने रघुनाथराव (राघोबा) तथा अंग्रेजों के विरुद्ध नाना फड़नवीस और शिशु पेशवा का पक्ष ग्रहण किया। तालेगाँव में अंग्रेजों की पराजय (जनवरी, १७७९) से वह महाराष्ट्र संघ का सर्वप्रमुख सदस्य मान्य उसने अकेले दम पर अंग्रेजों को मध्य भारत मे अकेले दम पर अंग्रेजों को पराजित किया मध्य भारत में अंतत:, उसी की मध्यस्थता से मराठों और अंग्रेजों में सालबाई की संधि संभव हो सकी (१७८२)। इससे उसकी महत्ता और प्रभुत्व में बड़ी अभिवृद्धि हुई। युद्ध की समाप्ति पर महादजी पुन: उत्तर की ओर अभिमुख हुआ। ग्वालियर अधिकृत कर (१७८३), उसने गोहद के राणा को पराजित किया (१७८४)। फ्रेंच सैनिक डिबोयन (de boigne) की सहायता से उसने अपनी सेना सुशिक्षित एवं सशक्त की।फ्रेंच सैनिक बिना आईडी बोइंग (Benoit De Boigne) ने उसकी सेना को फ्रांसीसी तरीके से सुरक्षित किया और यूरोपीय सेना से लड़ने के लिए तैयार किया और उनकी सेना में कई सारे फ्रेंड सिपाही भी भर्ती किए गए उनकी सेना बहुत ही मजबूत थी और उसे ना को यूरोपीय स्तर से प्रशिक्षित करते थे उन्होंने आगरा आदि स्थानों पर सैनिकों के अभ्यास हेतु कई सारे कैंप भी खुलवाए।घ मुगल सम्राट् ने उसे वकील-ए-मुतलक की पदवी से पुरस्कृत किया; तथा मुगल राज्य संचालन का उत्तरदायित्व उसे सौंपा। महादजी ने अनेक विद्रोहों का दमन कर मुगल राज्य में व्यवस्था स्थापित की। किंतु जयपुर के सैनिक अभियान की असफलता के कारण उसकी स्थिति संकटापन्न हो गई (१७८७), तथापि इस्माइल बेग की पराजय से (जून, १७८८) उसने अपनी सत्ता पुन:स्थापित कर ली। दानवी आततायी गुलाम कादिर को दिल्ली से खदेड़, नेत्रविहीन मुगल सम्राट् को उसने पुन: सिंहासनासीन किया (अक्टूबर, १७८९)। १७९१ के अंत तक उसने राजपूतों को भी नत कर दिया। अब नर्मदा से सतलज तक पूरा उत्तरी भारत उसके आधिपत्य में था। अपनी सफलता के चरमोत्कर्ष में, १२ वर्षों बाद, वह महाराष्ट्र लौटा। दो वर्ष पूना में रहकर (१७९२-९४) उसने महाराष्ट्र संघ को पुन: संगठित करने का सतत किंतु विफल प्रयत्न किया। लाखेरी में तुकोजी होल्कर की पूर्ण पराजय (जून १७९३) उसकी अंतिम विजय थी, यद्यपि पारस्परिक विभेद से दु:खित महादजी ने उसे विजय दिवस संबोधित करने की अपेक्षा शोक दिवस ही की संज्ञा दी। १२ फरवरी, १७९४ को उसकी मृत्यु हुई।

कुशाग्रबुद्धि महादजी व्यक्तिगत जीवन में सरल, तथा स्वभाव से सहिष्णु, धैर्यशील और उदार था। उसमें नेतृत्व शक्ति और सैनिक प्रतिभा तो थी ही, राजनीतिज्ञता भी असाधारण थी। उसके महान् कार्य, विषम परिस्थितियों तथा आंतरिक वैमनस्य - नाना फड़निस के द्वेषी स्वभाव और तुकोजी होल्कर के शत्रुतापूर्ण व्यवहार - के बावजूद केवल स्वावलंबन के बल पर संपन्न हुए। किंतु इन सब के ऊपर थी उसकी स्वार्थरहित उदात्त दृष्टि, जिसे, महाराष्ट्र के दुर्भाग्य से, सहयोग की अपेक्षा सदैव गत्यवरोध ही प्राप्त हुआ।एक इतिहासकार कीनी के अनुसार महादजी सिंधिया 18 वीं सदी में भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे महानतम सेनापति था और महानतम सरदार जी उन्हीं के दम पर मराठा साम्राज्य पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा साम्राज्य का पुनरुत्थान कर सका उनके सहयोग के बिना मराठा साम्राज्य के पुनरुत्थान संभव ही नहीं था।

मास्को

मास्को या मॉस्को (रूसी: Москва́ (मोस्कवा)), रूस की राजधानी एवं यूरोप का सबसे बडा शहर है, मॉस्को का शहरी क्षेत्र दुनिया के सबसे बडे शहरी क्षेत्रों में गिना जाता है। मास्को रूस की राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, वित्तीय एवं शैक्षणिक गतिविधियों का केन्द्र माना जाता है। यह मोस्कवा नदी के तट पर बसा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से यह पुराने सोवियत संघ एवं प्राचीन रूसी साम्राज्य की राजधानी भी रही है। मास्को को दुनिया के अरबपतियों का शहर भी कहा जाता है जहां दुनिया के सबसे ज्यादा अरबपति बसते हैं। २००७ में मास्को को लगातार दूसरी बार दुनिया का सबसे महंगा शहर भी घोषित किया गया था।

मॅसिये वस्तुएँ

मॅसिये वस्तुएँ उन खगोलीय वस्तुओं को कहा जाता है जिन्हें फ़्रांसिसी खगोलशास्त्री शार्ल मॅसिये ने सन् १७७१ में प्रकाशित अपनी सूची में सम्मिलित किया था। शार्ल मॅसिये धूमकेतुओं का अध्ययन करते थे और ऐसी वस्तुओं से परेशान थे जो धूमकेतु नहीं थी लेकिन धूमकेतुओं जैसी लगती थीं। उन्होंने अपने सहायक प्येर मेशैं की सहायता से ऐसी वस्तुओं की सूची बनाई।

राजस्थान की समय रेखा

यह राजस्थान के इतिहास की समय रेखा है।

५००० ई. पू.: वैदिक सभ्यता

३५०० ई. पू. आहड़ सभ्यता

१००० ई.पू.-६०० ई. पू. आर्य सभ्यता

३०० ई. पू. - ६०० ई. जनपद युग

३५० - ६०० गुप्त वंश का हस्तक्षेप

६वीं शताब्दी व ७वीं शताब्दी हूणों के आक्रमण प्रतिहार राजपूत साम्राज्य की स्थापना,हर्षवर्धन का हस्तक्षेप

७२८ बाप्पा रावल द्वारा चितौड़ में मेवाड़ राज्य की स्थापना

९६७ कछवाहा वंश घोलाराय द्वारा आमेर राज्य की स्थापना

१०१८ महमूद गजनवी द्वारा प्रतिहार राज्य पर आक्रमण तथा विजय

१०३१ दिलवाड़ा में विंमल शाह द्वारा आदिनाथ मंदिर का निर्माण

१११३ अजयराज द्वारा अजमेर (अजयमेरु) की स्थापना

११३७ कछवाहा वंश के दुलहराय द्वारा ढूँढ़ार राज्य की स्थापना

११५६ महारावल जैसलसिंह द्वारा जैसलमेर की स्थापना

११९१ मुहम्मद गोरी व पृथ्वीराज चौहान के मध्य तराइन का प्रथम युद्ध - मुहम्मद गोरी की पराजय

११९२ मुहम्मद गोरी व पृथ्वीराज चौहान के मध्य तराइन का द्वितीय युद्ध -- पृथ्वीराज की पराजय

११९५ मुहम्मद गौरी द्वारा बयाना पर आक्रमण

१२१३ मेवाड़ के सिंहासन पर जैत्रसिहं का बैठना

१२३० दिलवाड़ में तेजपाल व वस्तुपाल द्वारा नेमिनाथ मंदिर का निर्माण

१२३४ रावल जैत्रसिंह द्वारा इल्तुतमिश पर विजय

१२३७ रावल जैत्रसिंह द्वारा सुल्तान बलवन पर विजय

१२४२ बूँदी राज्य की हाड़ा राज देशराज द्वारा स्थापना

१२९० हम्मीर द्वारा जलालुद्दीन का आक्रमण विफल करना

१३०१ हम्मीर द्वारा अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण को विफल करना, षड़यन्त्र द्वारा पराजित रणथम्मौर के किले पर ११ जुलाई को तुर्की का आधिकार स्थापित

१३०२ रत्नसिंह गुहिलों के सिहासन पर आरुढ़

१३०३ अलाउद्दीन खिलजी द्वारा राणा रत्नसिंह पराजित, पद्मिनी का जौहर, चितौड़ पर खिलजी का अधिकार, चितौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद

१३०८ कान्हडदेव चौहान खिलजी से पराजित, जालौर का खिलजी पर अधिकार

१३२६ राणा हमीर द्वारा चितौड़ पर पुन: अधिकार

१४३३ कुम्भा मेवाड़ के सिंहासन पर आरुढ़

१४४० महाराणा कुम्भा द्वारा चितौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण

१४५६ महाराणा कुम्मा द्वारा मालवा के शासन महमूद खिलजी को परास्त करना, कुम्भा का शम्स खाँ को हराकर नागौर पर कब्जा

१४५७ गुजरात व मालवा का मेवाड़ के विरुद्ध संयुक्त अभियान करना

१४५९ राव जोधा द्वारा जोधपुर की स्थापना

१४६५ राव बीका द्वारा बीकानेर राज्य की स्थापना

१४८८ बीकानेर नगर का निर्माण पूर्ण

१५०९ राणा संग्रामसिंह मेवाड़ के शासक बने

१५१८ महाराणा जगमल सिंह द्वारा बाँसवाड़ राज्य की स्थापना

१५२७ राणा संग्राम सिंह का बयाना पर अधिकार तथा बाबर के हाथों पराजय

१५२८ राणा सांगा का निधन

१५३२ राजा मालदेव द्वारा अपने पिता राव गंगा की हत्या पर मारवाड़ की सत्ता पर कब्जा

१५३८ मालदेव का सिवाना व जालौर पर अधिपत्य

१५४१ राजा मालदेव द्वारा हुमायू को निमंत्रण देना

१५४२ राजा मालदेव का बीकानेर नरेश जैत्रसिंह को परास्त करना, जैत्रसिंह की मृत्यु, हुमायूँ का मारवाड़ सीमा में प्रवेश

१५४४ राजा मालदेव व शेरशह के मध्य जैतारण (सामेल) का युद्ध, मालदेव की पराजय

१५४७ भारमल आमेर का शासक बना

१५५९ राजा उदयसिंह द्वारा उदयपुर नगर की स्थापना

१५६२ राजा मालदेव का निधन, मालदेव का तृतीय पुत्र राव चन्द्रसेन मारवाड़ के सिंहासन पर आरुढ

१५६२ आमेर के राजा भारमल ने अपनी पुत्री का विवाह सांभर से सम्पन्न कराया

१५६४ राव चन्द्रसेन की पराजय, जोधपुर मुगलों के अधीन

१५६९ रणथम्भौर नरेश सुर्जन हाडा की राजा मानसिंह से सन्धि, हाड़ पराजित

१५७२ राणा उदयसिंह की मृत्यु, महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक

१५७२ अकबर द्वारा रामसिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त

१५७३ राजा मानसिंह की महाराणा प्रताप से मुलाकात

१५७४ बीकानेर नरेश कल्याणमल का निधन, रायसिंह का सिंहासनरुढ़ होना।

१५७६ हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप की सेना मुगल सेना से पराजित

१५७८ मुगल सेना द्वारा कुम्भलगढ़ पर अधिकार, प्रताप का छप्पन की पहाड़ियों में प्रवेश। चावड़ को राजधानी बनाना

१५८० अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक अब्दुल रहीम खानखाना को अकबर द्वारा राजस्थान का सूबेदार नियुक्त करना।

१५८९ आमेर के राजा भारमल की मृत्यु, मानसिंह को सिंहासन मिला

१५९६ राजा किशन सिंह द्वारा किशनगढ़ (अजमेर) की नीवं

१५९७ महाराणा प्रताप की चांवड में मृत्यु

१६०५ सम्राट अकबर ने राजा मानसिंह को ७००० मनसव प्रदान किये।

१६१४ राजा मानसिंह की दक्षिण भारत में मृत्यु

१६१५ राणा अमरसिंह द्वारा मुगलों से सन्धि

१६२१ राजा मिर्जा जयसिंह आमेर का शासक नियुक्त

१६२५ माधोसिंह द्वारा कोटा राज्य की स्थापना

१६६० राजा राजसिंह द्वारा राजसमन्द का निर्माण प्रारम्भ

१६६७ जयसिंह की दक्षिण भारत में मृत्यु

१६९१ राजा राजसिंह द्वारा नाथद्वारा मंदिर का निर्माण

१७२७ सवाई जयसिंह द्वारा जयपुर नगर का स्थापना

१७३३ जयपुर नरेश सवाई जयसिंह का मराठों से पराजित होना

१७७१ कछवाहा वंश के राव प्रतापसिंह ने अलवा राज्य की नींव डाली

१८१८ झाला वंशजों द्वारा झालावाड़ राज्य की स्थापना

१८१८ मेवाड़ के राजपूतों द्वारा ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि

१८३८ माधव सिंह द्वारा झालावाड़ की स्थापना

१८५७ २८ मई को नसीरा बाद में सैनिक विद्रोह

१८८७ राजकीय महाविद्यालय, अजमेर के छात्रों द्वारा कांग्रेस कमिटी का गठन

१९०३ लार्ड कर्जन ने एडवर्ड - सप्तम के राज्यारोहण समारोह में उदयपुर के महाराणा फतेहसिंह को आमंत्रण और महाराणा द्वारा दिल्ली प्रस्थान

१९१८ बिजोलिया किसान आन्दोलन

१९२२ भील आन्दोलन प्रारम्भ

१९३८ मेवाड़, अलवर, भरतपुर, प्रजामंडल गठित, सुभाषचन्द्र बोस की जोधपुर यात्रा

१९४५ ३१ दिसम्बर को अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के अन्तर्गत राजपूताना प्रान्तीय सभा का गठन

१९४७ २७ जून को रियासती विभाग की स्थापना

१९४७ शाहपुरा में गोकुल लाल असावा के नेतृत्व में लोकप्रिय सरकार बनी जो १९४८ में संयुक्त राजस्थान संघ में विलीन हो गई।

रामकृष्ण कुँवर

रामकृष्ण कुँवर गोरखाली सेनाके सरदार थे।

उन्होंने गोरखा राज्यके लिए विभिन्न युद्धमें नेतृत्व किया था। उन्होंने २५ अगस्ट १७६७ के हरिहरपुरगढीके युद्धमें ब्रिटिस सेनाको परास्त किया था। उनके वंशजने नेपालके एक शक्तिशाली राणा वंश स्थापित किया था। उनके नाति काजी बालनरसिंह कुँवर थे जिनके पुत्र जंगबहादुर राणा नेपालके प्रधानमन्त्री एवम् कमाण्डर-इन-चिफ बन गए।

लार गिबन

लार गिबन (Lar gibbon), जो श्वेत-हस्त गिबन (white-handed gibbon) भी कहलाता है, गिबन के हायलोबेटीस वंश की एक जाति है। यह अन्य गिबनों से अधिक जाना जाता है और अक्सर विश्व के चिड़ियाघरों में मिलता है। इसका निवास स्थान युन्नान, पूर्वी बर्मा, थाईलैण्ड, मलय प्रायद्वीप और पश्चिमी सुमात्रा द्वीप है। इनका शरीर काला या भूरा होता है लेकिन हाथ-पाँव सफ़ेद होते हैं और मुखों पर अक्सर श्वेत रंग के बालों का एक चक्र होता है।

वाल्टर स्काट

सर वाल्टर स्काट (Sir Walter Scott, 1st Baronet, FRSE ; १७७१ - १८३२ ई.) अंग्रेजी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासकार, नाटककार तथा कवि थे। स्कॉट अंग्रेजी भाषा के प्रथम साहित्यकार थे जिन्हें अपने जीवनकाल में ही अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो गयी थी।

विद्युत

विद्युत आवेशों के मौजूदगी और बहाव से जुड़े भौतिक परिघटनाओं के समुच्चय को विद्युत (Electricity) कहा जाता है।अर्थात् इसे न तो देखा जा सकता है व न ही छुआ जा सकता है केवल इसके प्रभाव के माध्यम से महसुस किया जा सकता है| विद्युत से जानी-मानी घटनाएं जुड़ी है जैसे कि तडित, स्थैतिक विद्युत, विद्युतचुम्बकीय प्रेरण, तथा विद्युत धारा। इसके अतिरिक्त, विद्युत के द्वारा ही वैद्युतचुम्बकीय तरंगो (जैसे रेडियो तरंग) का सृजन एवं प्राप्ति सम्भव होता है?

विद्युत के साथ चुम्बकत्व जुड़ी हुई घटना है। विद्युत आवेश वैद्युतचुम्बकीय क्षेत्र पैदा करते हैं। विद्युत क्षेत्र में रखे विद्युत आवेशों पर बल लगता है।

समस्त विद्युत का आधार इलेक्ट्रॉन हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉन हल्के होने के कारण ही आसानी से स्थानांतरित हो पाते हैं। इलेक्ट्रानों के हस्तानान्तरण के कारण ही कोई वस्तु आवेशित होती है। आवेश की गति की दर विद्युत धारा है। विद्युत के अनेक प्रभाव हैं जैसे चुम्बकीय क्षेत्र, ऊष्मा, रासायनिक प्रभाव आदि।

जब विद्युत और चुम्बकत्व का एक साथ अध्ययन किया जाता है तो इसे विद्युत चुम्बकत्व कहते हैं। मात्र जिसके अनुप्रयोगों पर दुनिया की इकोनामी टिकी हुई है।विद्युत को अनेकों प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है किन्तु सरल शब्दों में कहा जाये तो विद्युत आवेश की उपस्थिति तथा बहाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न उस सामान्य अवस्था को विद्युत कहते हैं जिसमें अनेकों कार्यों को सम्पन्न करने की क्षमता होती है। विद्युत चल अथवा अचल इलेक्ट्रान या प्रोटान से सम्बद्ध एक भौतिक घटना है। किसी चालक में विद्युत आवेशों के बहाव से उत्पन्न उर्जा को विद्युत कहते हैं।

विद्युत-आवेश के प्रवाह अर्थात विद्युत-आवेशित कणों के किसी निश्चित दिशा मे गति करने को 'विद्युत-धारा' कहते हैं ।

सैंड्रिंघम हाउस

सैंड्रिंघम हाउस, नॉर्फ़ोक, इंग्लैंड में, सैंड्रिंघम गाँव के पास स्थित एक मुल्की मकान है। यह संपत्ति कुल २०,००० एकर की ज़मीन पर फैली हुई है, और रानी एलिज़ाबेथ द्वी॰ की निजी संपत्ति है, नाकि अन्य महलों की तरह राजमुकुट की। यह प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर नॉर्फ़ोक कोस्ट इलाके में रॉयल सैंड्रिंघम एस्टेट में स्थित है।

हायलोबेटीस

हायलोबेटीस (Hylobates) गिबन के चार जीववैज्ञानिक वंशों में से एक है। यह नाम यूनानी भाषा से लिया गया है, जिसमें "हुले" (ὕλη) का अर्थ "वन" और "बेतिस" (βάτης) का अर्थ "चलनेवाला" होता है, यानि नाम का अर्थ "वन में चलने वाला" होता है। यह गिबनों का सबसे विस्तृत वंश है और दक्षिणी चीन के युन्नान प्रान्त से लेकर पश्चिम और मध्य जावा में फैला हुआ है। हायलोबेटीस गिबनों के मुखों पर अक्सर श्वेत रंग के बालों का एक चक्र होता है और आनुवांशिक दृष्टि से इनमें ४४ गुणसूत्र (क्रोमोसोम) होत हैं।

१७७१ ईसा पूर्व

१७७१ ईसा पूर्व ईसा मसीह के जन्म से पूर्व के वर्षों को दर्शाता है। ईसा के जन्म को अधार मानकर उसके जन्म से १७७१ ईसा पूर्व या वर्ष पूर्व के वर्ष को इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है। यह जूलियन कलेण्डर पर अधारित एक सामूहिक वर्ष माना जाता है। अधिकांश विश्व में इसी पद्धति के आधार पर पुराने वर्षों की गणना की जाती है। भारत में इसके अलावा कई पंचाग प्रसिद्ध है जैसे विक्रम संवत जो ईसा के जन्म से ५७ या ५८ वर्ष पूर्व शुरु होती है। इसके अलावा शक संवत भी प्रसिद्ध है। शक संवत भारत का प्राचीन संवत है जो ईसा के जन्म के ७८ वर्ष बाद से आरम्भ होता है। शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

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