१७३९

१७३९ ग्रेगोरी कैलंडर का एक साधारण वर्ष है।

घटनाएँ

अक्टूबर-दिसम्बर

अज्ञात तारीख़ की घटनाएँ

नादिरशाह का भारत पर आक्रर्मण। वह दिल्ली को लूटकर तथा मयूर सिहासन भी इरान लेता गया।

जन्म

अक्टूबर-दिसम्बर

निधन

अखौरी सिन्हा

अखौरी सिन्हा मिन्नेसोता विश्वविद्यालय (University of Minnesota) के अनुवांशिकी, कोशिका जीवविज्ञान तथा विकास विभाग में कार्यरत एक प्रोफेसर हैं। उन्होंने पशु-पक्षियों पर काफी शोधकार्य किया है। अंटार्कटिका की एक पर्वत चोटी का नाम इनके नाम पर रखा गया है।सिन्हा जी बिहार के बक्सर के मूल निवासी हैं। उनके पूर्वज १७३९ में नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमण के समय बक्सर (बिहार) चले गए थे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. (१९५४) और पटना विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. (१९५६) की है। आज भी सर्दी से बचने के लिए फरवरी में अपने गाँव चूडामनपुर आते हैं।

अरनाला का किला

अर्नाला का किला महाराष्ट्र की राजधानी के निकट वसई गाँव में है। यह दुर्ग जल के बीच एक द्वीप पर बना होने के कारण इसे जलदुर्ग या जन्जीरे-अर्नाला भी कहा जाता है। यह मुम्बई से ४८ किमी दूरी पर ख्य अर्नाला से ८ कि॰मी॰ दूरी पर स्थित है। इस किले पर १७३९ में पेशवा बाजीराव के भाई चीमाजी ने अधिकार कर लिया था। वैसे इस किले पर अधिकार के अलावा उस युद्ध में मराठाओं ने अपनी सेना के एक बड़े भाग की हानि सही थी। १८०२ ई॰ में पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ब्रिटिश सेना से द्वितीय वसई सन्धि कर ली और तदोपरान्त अर्नाला का किला अंग्रेजो के अधिकार में आ गया।

यह किला सामरिक दृष्टि से काफ़ी महत्त्वपूर्ण था। यहां से गुजरात के सुल्तान ,पुर्तगाली ,अंग्रेज और मराठाओं ने शासन किया है। अरनाला का किला तीनो ओर से समुद्र से घिरा हुआ है |

अवध के नवाब

भारत के अवध के १८वीं तथा १९वीं सदी में शासकों को अवध के नवाब कहते हैं। अवध के नवाब, इरान के निशापुर के कारागोयुन्लु वंश के थे। नवाब सआदत खान प्रथम नवाब थे।

ईरान

ईरान (جمهوری اسلامی ايران, जम्हूरीए इस्लामीए ईरान) जंबुद्वीप (एशिया) के दक्षिण-पश्चिम खंड में स्थित देश है। इसे सन १९३५ तक फारस नाम से भी जाना जाता है। इसकी राजधानी तेहरान है और यह देश उत्तर-पूर्व में तुर्कमेनिस्तान, उत्तर में कैस्पियन सागर और अज़रबैजान, दक्षिण में फारस की खाड़ी, पश्चिम में इराक (कुर्दिस्तान क्षेत्र) और तुर्की, पूर्व में अफ़ग़ानिस्तान तथा पाकिस्तान से घिरा है। यहां का प्रमुख धर्म इस्लाम है तथा यह क्षेत्र शिया बहुल है।

प्राचीन काल में यह बड़े साम्राज्यों की भूमि रह चुका है। ईरान को १९७९ में इस्लामिक गणराज्य घोषित किया गया था। यहाँ के प्रमुख शहर तेहरान, इस्फ़हान, तबरेज़, मशहद इत्यादि हैं। राजधानी तेहरान में देश की १५ प्रतिशत जनता वास करती है। ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्यतः तेल और प्राकृतिक गैस निर्यात पर निर्भर है। फ़ारसी यहाँ की मुख्य भाषा है।

ईरान में फारसी, अजरबैजान, कुर्द (क़ुर्दिस्तान) और लूर सबसे महत्वपूर्ण जातीय समूह हैं

गोहद का किला

गोहद का क़िला मध्य प्रदेश के भिंड ज़िले के गोहद तहसील में स्थित एक दुर्ग या किला है। यह ऐतिहासिक स्थल राज्य के पर्यटन आकर्षणों में से एक है। इस किले का निर्माण जाट राजा महासिंह ने १६वीं शताब्दी में करवाया था। वर्तमान में गोहद दुर्ग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है, किंतु इसके अन्दर स्थित एक महल की इमारत में अनेक सरकारी कार्यालय हैं। इस महल में की गई शानदार नक्काशियाँ आकर्षक हैं। यहां का कछरी महल ईरानी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

डोंगरी दुर्ग

डोंगरी किला (जिसे डोंगरी पहाड़ी का किला या स्थानीय इर्मित्रि किला भी कहते हैं) मुम्बई के डोंगरी क्षेत्र में स्थित एक दुर्ग है। यह किला डोंगरी इलाके में बसा हुआ है। १७३९ में यह किला मराठा शासन के अधीन हुआ था और तब से स्थानीय लोग और एक स्थानीय गिरजाघर इसका अनुरक्षण करते है। बार इस दुर्ग की मरम्मत भी हुई है। प्रतिवर्ष अक्तूबर माह में लेडी फातिमा का उत्सव आयोजित होता है जिस पर एक बड़ा भोज भी होता है। बड़ी दूर-दूर से प्रार्थना करने लोग आते है। यहां से चारों ओर का खुला विहंगम दृश्य दिखाई देता है जिसके पश्चिम में अरब सागर, उत्तर में वसई किला, पूर्व में बोरीवली राष्ट्रीय उद्यान, और दक्षिण में एस्सेल वर्ल्ड और वॉटर किंगडम दिखाई देते हैं।

नेवाज (रीतिग्रंथकार कवि)

नेवाज, महाराज छत्रसाल के समकालीन एक हिंदी कवि थे। इनका जन्म, ठाकुर शिवसिंह के कथनानुसार, संवत्‌ १७३९ में हुआ था। इनका लिखा हुआ केवल शकुंतला नाटक देखने में आया है। कुछ फुटकर छंद भी इधर उधर पुस्तकों में बिखरे दिख पड़ते है। कहते हैं कि महाराज छत्रसाल के राजाश्रय में, भगवत कवि के स्थानपर, इनकी नियुक्त हुई थी। ये बड़े रसिक कवि थे।

इस नाम के दो कवि और हुए हैं। एक तो विलग्राम के निवासी थे, दूसरे गाजीपुर में भगवंत राय खींची के आश्रित थे।

बल्लभगढ़

बल्लभगढ़ (Ballabhgarh) भारत के हरियाणा राज्य के दक्षिण-पूर्वी भाग के फ़रीदाबाद ज़िले में एक शहर और तहसील का नाम है। दिल्ली से लगभग ३० किमी दूर स्थित यह शहर भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (ऍन सी आर) का हिस्सा है। बल्लभगढ़ में एक जाट रियासत थी जिसकी स्थापना सन् १७३९ में बलराम सिंह ने की थी। यहाँ पर प्रसद्ध नाहर सिंह महल भी खड़ा है और इसका निर्माण भी बलराम सिंह ने ही करवाया था। गुड़गांव, फरीदाबाद और बहादुरगढ़ के बाद मेट्रो कनेक्टिविटी पाने के लिए हरियाणा में बल्लभगढ़ चौथा शहर है।बल्लभगढ़ का राष्ट्रीय संग्रामों में एक विशेष स्थान रहा है। जब महाराजा सूरजमल के पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली पर चढाई की तो उन्हे लाल किले के दरवाजे को तोडने में परेशानी हुई दरवाजे पर लगी बडी बडी कीलों से दरवाजा तोडने के लिए लगाए गए हाथियों के माथे लहु लुहान हो गए थे तब महाराजा जवाहर सिंह के मामा राजा बलराम सिंह ने स्वयं को हाथियों के माथे पर बांधने के लिए कहा जिससे लाल किले के दरवाजे तो टूट गए पर राजा बलराम सिंह शहीद हो गए परंतु उन्ही की वजह से महाराजा जवाहर सिंह ने दिल्ली फतह की। उनके मित्र सूरज मल (भरतपुर राज्य के नरेश) ने उनके पुत्रों को फिर बल्लभगढ़ की गद्दी दिलवाई। बाद में जब अफ़ग़ानिस्तान से अहमद शाह अब्दाली ने हमला किया तो बल्लभगढ़ ने उसका सख़्त विरोध किया, लेकिन ३ मार्च १७५७ को हराया गया। और भी आगे चलकर बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह (१८२३-१८५८) ने १८५७ की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और उसके लिए ब्रिटिश सरकार ने उन्हें विद्रोह कुचलने के बाद सन् १८५८ में फांसी दी।

भारत में यूरोपीय आगमन

भारत के सामुद्रिक रास्तों की खोज 15वीं सदी के अन्त में हुई जिसके बाद यूरोपीयों का भारत आना आरंभ हुआ। यद्यपि यूरोपीय लोग भारत के अलावा भी बहुत स्थानों पर अपने उपनिवेश बनाने में सफल हुए पर इनमें से कइयों का मुख्य आकर्षण भारत ही था। सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक यूरोपीय कई एशियाई स्थानों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके थे और अठारहवीं सदी के उत्तरार्ध में वे कई जगहों पर अधिकार भी कर लिए थे। किन्तु उन्नासवीं सदी में जाकर ही अंग्रेजों का भारत पर एकाधिकार हो पाया था।

भारत की समृद्धि को देखकर पश्चिमी देशों में भारत के साथ व्यापार करने की इच्छा पहले से थी। यूरोपीय नाविकों द्वारा सामुद्रिक मार्गों का पता लगाना इन्हीं लालसाओं का परिणाम था। तेरहवीं सदी के आसपास मुसलमानों का अधिपत्य भूमध्य सागर और उसके पूरब के क्षेत्रों पर हो गया था और इस कारण यूरोपी देशों को भारतीय माल की आपूर्ति ठप्प पड़ गई। उस पर भी इटली के वेनिस नगर में चुंगी देना उनको रास नहीं आता था। कोलंबस भारत का पता लगाने अमरीका पहुँच गया और सन् 1487-88 में पेडरा द कोविल्हम नाम का एक पुर्तगाली नाविक पहली बार भारत के तट पर मालाबार पहुँचा। भारत पहुचने वालों में पुर्तगाली सबसे पहले थे इसके बाद डच आए और डचों ने पुर्तगालियों से कई लड़ाईयाँ लड़ीं। भारत के अलावा श्रीलंका में भी डचों ने पुर्तगालियों को खडेड़ दिया। पर डचों का मुख्य आकर्षण भारत न होकर दक्षिण पूर्व एशिया के देश थे। अतः उन्हें अंग्रेजों ने पराजित किया जो मुख्यतः भारत से अधिकार करना चाहते थे। आरंभ में तो इन यूरोपीय देशों का मुख्य काम व्यापार ही था पर भारत की राजनैतिक स्थिति को देखकर उन्होंने यहाँ साम्राज्यवादी और औपनिवेशिक नीतियाँ अपनानी आरंभ की।

मढ़ दुर्ग

मढ़ किला (जिसे वर्सोवा किले के नाम से भी जाना जाता) महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई के उत्तरी भाग में मढ़ द्वीप पर स्थित एक छोटा सा किला है। यह पुर्तगाली लोगों के अधीन भारत में द्वारा बनाया गया था। १७३९ के फरवरी माह में उनका मराठों से युद्ध हुआ, जिसमें वे यह किला हार गये एवं इस पर मराठों का अधिकार हो गया। कालान्तर में १७७४ में अंग्रेजों ने सालसेट द्वीप, ठाणा किला और करंजा के द्वीप किले के साथ साथ वर्सोवा किले पर अपना आधिपत्य जमा लिया।इसका निर्माण १७वीं शताब्दी में पुर्तगालियों द्वारा एक पहरे की मीनार के रूप में करवाया गया था। यह समुद्र तट के एक सामरिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण हुआ करता था और मार्वे क्रीक पर नजर रखा करता था। इसके बाहरी भाग अभी भी जैसे के तैसे बने खड़े दिखाई देते हैं, जबकि अन्दरूनी भाग आंतरिक रूप से जीर्ण-शीर्ण हो चले हैं।

मनसा राम

आधुनिक बनारस राज्य की स्थापना श्री मनसा राम ने की थी। ये एक भूमिहार ब्राह्मण थे | इनका गोत्र गौतम था। कहा जाता की करीब १००० साल पहले इनके पूर्वजों को किसी साधू ने भविष्यवाणी की थी की इनके वंशज भविष्य में काशी क्षेत्र के राजा होंगे। इनका पैतृक परिवार निवास बनारस के समीप गंगापुर नाम के स्थान में बताया जाता है।

श्री मनसा राम ने १७ वीं शताब्दी में बनारस के नाज़िम ( एक मंडल के सूबेदार तरह का ओहदा) रुस्तम अली खान के मातहत कार्य करना शुरू किया । अपने बहादुरी भरे कार्यों से और कई लड़ाइयां लड़के वो कसवार के जमींदार बन गए । ये उन्ही के पूर्वजों की जमीन थी जो मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बहुत पहले छीन ली थी । उनके कार्यों और प्रतिभा से प्रभावित हो कर अवध के नवाब सआदत खान ने अपनी मृत्यु से एक साल पहले उन्हें १७३६ में रुस्तम अली खान का उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

इसके कुछ समय पश्चात उस समय के तत्कालीन मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला ने उन्हें बनारस , कौनपुर, ग़ाज़ीपुर और चुनार की सरकारों का राजा और नाज़िम घोषित किया। उन्हें कासवार के राजा बहादुर की उपाधि भी प्रदान की।

मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला सन १७३७ में मराठा पेशवा बाजी राव से हार चुका था और १७३९ में नादिर शाह ने भी उसे बुरी तरह से हराया था। ऐसे ऐसी स्थिति में बादशाह को योग्य सूबेदारों और सहयोगियों की आवश्यकता थी। सम्भवतः मनसराम कोई काबिलियत को इसी वजह से तेजी से वरीयता दी गयी ।

श्री मनसा राम सन १७३७ से १७४० तक काशी राज्य के नरेश रहे। मनसा राम काशी नरेश राजा बलवंत सिंह के पिता थे|

मलूकदास

मलूकदास ( सं. १६३१ की वैशाख बदी ५ - सं. १७३९ वैशाख बदी १४) एक सन्त कवि थे।

उनका जन्म, सं. १६३१ की वैशाख बदी ५ को, कड़ा (जि इलाहाबाद) के कक्कड़ खत्री सुंदरदास के घर हुआ था। इनका पूर्वनाम 'मल्लु' था और इनके तीन भाइयों के नाम क्रमश: हरिश्चंद्र, शृंगार तथा रामचंद्र थे। इनकी 'परिचई' के लेखक तथा इनके भांजे एवं शिष्य मथुरादास के अनुसार इनके पितामह जहरमल थे और इनके प्रपितामह का नाम वेणीराम था। उनका कहना है कि मल्लू अपने बचपन से ही अत्यंत उदार एवं कोमल हृदय के थे तथा इनमें भक्तों के लक्षण पाए जाने लगे थे। यह बात इनके माता पिता पसंद नहीं करते थे और जीविकोपार्जन की ओर प्रवृत्त करने के उद्देश्य से, उन्होंने इन्हें केवल बेचने का काम सौंपा था परंतु इसमें उन्हें सफलता नहीं मिल सकी और बहुधा मंगतों को दिए जानेवाले कंबल आदि का हाल सुनकर उन्हें और भी क्लेश होने लगा। बालक मल्लू को दी गई किसी शिक्षा का विवरण हमें उपलब्ध नहीं है और ऐसा अनुमान किया जाता है कि ये अधिक शिक्षित न रहे होंगे। कहते हैं, इनके प्रथम गुरु कोई पुरुषोत्तम थे जो देवनाथ के पुत्र थे और पीछे इन्होंने मुरारिस्वामी से दीक्षा ग्रहण की जिनके विषय में इन्होंने स्वयं भी कहा है, मुझे मुरारि जी सतगुरु मिल गए जिन्होंने मेरे ऊपर विश्वास की छाप लगा दी, (सुखसागर पृo १९२)।

अभी तक पाए गए संकेतों के आधार पर कहा जा सकता है कि इनका विवाह संभवत: १२ वर्ष की अवस्था के अनंतर ही हुआ होगा। इनकी पत्नी का नाम ज्ञात नहीं। इनके देशभ्रमण की चर्चा करते समय केवल पुरी, दिल्ली एवं कालपी जैसे स्थानों के ही नाम विशेष रूप से लिए जाते हैं और अनुमान किया जाता है कि यह पर्यटन कार्य भी इन्होंने अधिकतर उस समय किया होगा जब ये वृद्ध हो चले थे तथा जब ये अपने मत का उपदेश भी देने लगे थे। सं. १७३९ की वैशाख बदी १४, बुधवार को संभवत: कड़ा में रहते समय ही, इनका देहांत हो गया। इनके अनंतर इनकी गद्दी पर इनके भतीजे रामसनेही बैठे और उनके पीछे क्रमश: कृष्णसनेही, ठाकुरदास, गोपालदास, कुंजबिहारीदास, एक दूसरे के उत्तराधिकारी होते आए जिसके पश्चात् यह परंपरा आगे नहीं बढ़ सकी।

संत मलूकदास की रचनाओं की संख्या २१ तक बतलाई जाती है और उनमें से 'अलखबानी', 'गुरुप्रताप', 'ज्ञानबोध', 'पुरुषविलास', 'भगत बच्छावली', 'भगत विरुदावली', 'रतनखान', 'रामावतार लीला', 'साखी, 'सुखसागर' तथा 'दसरत्न' विशेष रूप में उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ का सीधा संबंध संतमत के साथ समझा जाता है और अन्य के लिए कहा जाता है कि उनका मुख्य विषय सगुण भक्ति है। इनकी कतिपय चुनी हुई रचनाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि इन्हें परमात्मा के अस्तित्व में प्रबल आस्था थी और ये न केवल उसके सतत नाम स्मरण को विशेष महत्त्व देते थे, अपितु अपने भीतर उसका प्रत्यक्ष अनुभव करते भी जान पड़ते थे। किसी विषम स्थिति के आ पड़ने पर ये घबड़ाना नहीं जानते थे, प्रत्युत विश्वकल्याण की दृष्टि से ये सारा दु:ख अपने ऊपर ले लेना चाहते थे। अपनी आध्यात्मिक वृत्ति एवं हृदय की विशालता के कारण, ये क्रमश: बहुत विख्यात हो चले और इनके उपदेशों का प्रचार उत्तर प्रदेश के प्रयाग, लखनऊ आदि से लेकर पश्चिम की ओर जयपुर, गुजरात, काबुल आदि तक तथा पूरब और उत्तर की ओर पटना एवं नेपाल तक होता गया और प्रसिद्धि है कि इनकी कोई गद्दी श्रीकाकुलम् (आंध्र प्रदेश) तक में पाई जाती है। परंतु इनके अनुयायियों का सर्वप्रमुख केंद्र कड़ा ही समझा जाता है।

राजा हृदय शाह

हृदय शाह (जिसे राजा हरदे शाह या हरदेव शाह भी कहा जाता है), प्राचीन भारत के वर्तमान मध्य प्रदेश राज्य स्थित पन्ना रियासत के प्रथम राजा थे। इन्होंने १७३१ से १७३९ तक शासन किया। ये महाराजा छत्रसाल के ज्येष्ठ पुत्र थे। इन्हें पन्ना रियासत अपने पिता से सन १७३१ ई. में वार्षिक ३९ लाख रुपये के बदले प्राप्त हुई थी। १७३१ में इन्होंने रीवा रियासत को अपने अधीन कर वहां के राजा अवधूत सिंह को रियासत छोड़कर जाने पर विवश कर दिया। अवधूत सिंह ने अवध में प्रतापगढ़ जाकर शरण ली थी। तब हरदे शाह ने वहां विवाह किया व पुत्र रत्न उत्पन्न हुआ।

वसई किला

बसेन दुर्ग (पुर्तगाली : Fortaleza de São Sebastião de Baçaim, मराठी: वसई चा किल्ला), जिसे फोर्ट बसेन या वसई किला भी कहते हैं, महाराष्ट्र के पालघर जिले के वसई गांव में स्थित एक विशाल दुर्ग है। वसाई किला एक राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है।

बसेन नाम पुर्तगाली शब्द "बासाइ" (Baçaim) का अंग्रेजी संस्करण है, जिसका कनेक्शन उत्तर कोंकण क्षेत्र के वासा कोंकणी आदिवासी लोगों से माना जाता है, जो मुंबई से दक्षिण गुजरात तक फैले हुए हैं। दुर्ग का पूरा पुर्तगाली नाम "फोर्टलेज़ा डे साओ सेबास्टियोन डी बासाइ" (वसई के सेंट सेबेस्टियन का किला) है।

१५वीं शताब्दी में उत्तर कोंकण तट की खोज करने वाले पुर्तगालियों ने खंबत की सल्तनत को किले का निर्माण (पुनर्निर्माण या विस्तार) करते देखा, और इसे जीतने के लिए इस पर आक्रमण किया। बाद में, अधिक व्यवस्थित प्रयासों के बाद, खंबत की सल्तनत ने सेंट मैथ्यू की संधि पर हस्ताक्षर किए, और यह दुर्ग पुर्तगाल को सौंप दिया।

१७३९ में यह दुर्ग मराठों के अधिकार में आया। १७७४ में अंग्रेज़ों ने इस दुर्ग पर कब्ज़ा कर लिया, और फिर १७८३ में सालबाई की संधि के तहत मराठों को वापस किया। १८१८ में अंग्रेज़ों ने पुनः पूरे क्षेत्र पर अधिकार स्थापित कर दिया था। इस दुर्ग ने प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध में भी प्रमुख भूमिका निभाई।

शुजा-उद-दीन मुहम्मद खान

शुजा-उद-दीन मुहम्मद खान बंगाल के नवाब थे।

मुर्शीद क़ुली खान का उत्तराधिकारी उसका दामाद शुजा उद दीन मुहम्मद खान बना ।

१७३३ में मुग़ल बादशाह मो० शाह ने बिहार का कार्यभार भी शुजा उद दीन को सौंप दी ।

१७३९ में शुजा उड़ दीन की म्रत्यु हो गयी ।

सआदत अली खान

अवध के इतिहास में दो सआदत अली खान मिलते हैं, जो अवध के नवाब रह चुके हैं:

बुर्हान अल मुल्क मीर मोहम्मद अमीन मुसावी सआदत अली खान प्रथम (१६८०-१७३९) इसने 1723 में नया राजस्व बंदोबस्त ( रेवेन्यू सेटलमेंट ) किया 1739 में इसके मरने के बाद इसकी जगह इसके भतीजे *सफदरजंग ने ली ।

यामीन उद् दौला नवाब सआदत अली खान द्वितीय (१७५२-१८१४)

सरफराज़ खान

सरफराज़ खान बंगाल के नवाब थे।

१७३९ में शुजा उद दीन की म्रत्यु के बाद इसका चचेरा भाई सरफ़राज खान गद्दी पर बैठा

१७४० में बिहार के नायक सूबेदार अलिवर्दी खान ने विद्रोह कर दिया और हेरिया या गिरिया के युद्ध में सरफ़राज़ खान को पराजित कर उसकी हत्या कर दी और इस तरह अली वर्दी खान बंगाल का नवाब बना ।

१७३९ ईसा पूर्व

१७३९ ईसा पूर्व ईसा मसीह के जन्म से पूर्व के वर्षों को दर्शाता है। ईसा के जन्म को अधार मानकर उसके जन्म से १७३९ ईसा पूर्व या वर्ष पूर्व के वर्ष को इस प्रकार प्रदर्शित किया जाता है। यह जूलियन कलेण्डर पर अधारित एक सामूहिक वर्ष माना जाता है। अधिकांश विश्व में इसी पद्धति के आधार पर पुराने वर्षों की गणना की जाती है। भारत में इसके अलावा कई पंचाग प्रसिद्ध है जैसे विक्रम संवत जो ईसा के जन्म से ५७ या ५८ वर्ष पूर्व शुरु होती है। इसके अलावा शक संवत भी प्रसिद्ध है। शक संवत भारत का प्राचीन संवत है जो ईसा के जन्म के ७८ वर्ष बाद से आरम्भ होता है। शक संवत भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर है।

२४ फ़रवरी

२४ फरवरी ग्रेगोरी कैलंडर के अनुसार वर्ष का ५५वॉ दिन है। वर्ष में अभी और ३१० दिन बाकी है (लीप वर्ष में ३११)।

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