सूर्योदय

क, कक्कन्यग्हझ्ज्मिम्क्ंःतुज.क् शब्द दो शब्दों — सूर्य और उदय की सन्धि से बना है। इसका अर्थ है — सूर्य का उदय होना या निकलना।

अहोरात्रम

यह हिन्दू समय मापन इकाई है। यह इकाई मध्यम श्रेणी की है। एक 'अहोरात्रम्एक दिन और रातका समय | एक सूर्योदयसे अपर सूर्योदय पूर्वका समय अहोरात्र है | अहश्च रात्रश्च अहोरात्र इसप्रकार द्वन्द समास से बना शब्द है| वैदिक ग्रन्थौं मे तिथिके जगह प्रयुक्त शब्द अहोरात्र है|

उपनाम

नाम के साथ प्रयोग हुआ दूसरा शब्द जो नाम कि जाति या किसी विशेषता को व्यक्त करता है उपनाम (Surname / सरनेम) कहलाता है। जैसे महात्मा गाँधी, सचिन तेंदुलकर, भगत सिंह आदि में दूसरा शब्द गाँधी, तेंदुलकर, सिंह उपनाम हैं।

विश्व के प्रमुख भौगोलिक उपनाम

सात पहाड़ियों का नगर रोम

पोप का शहर रोम

रक्त वर्ण महिला रोम

प्राचीन विश्व की सामग्री रोम

गगनचुंबी इमारतों का नगर न्यूयॉर्क

sugar bowl of the world क्यूबा

land of kangaroo आस्ट्रेलिया

land of midnight sun नार्वे

नील नदी की देन मिश्र

पवन चक्कियों की भूमि नीदरलैंड

सूर्योदय का देश जापान

ऋतुपर्ण

ऋतुपर्ण अयोध्या के एक पुराकालीन राजा थे। इसके पिता का नाम सर्वकाम था। यह अक्षविद्या में अत्यंत निपुण थे। जुए में राज्य हार जाने के उपंरात अपने अज्ञातवासकाल में नल 'बाहुक' नाम से इसी के पास सारथि के रूप में रहा था। इसने नल को अपनी अक्षविद्या दी तथा नल ने भी अपनी अश्वविद्या इसे दी।

नलवियुक्ती दमयंती को जब अपने चर पर्णाद द्वारा पता चला कि नल ऋतुपर्ण के सारथि के रूप में रह रहा है तो उसने ऋतुपर्ण का संदेशा भेजा, नल का कुछ भी पता न लगने के कारण मैं अपना दूसरा स्वयंवर कल सूर्योदय के समय कर रही हूँ, अत: आप समय रहते कुंडनिपुर पधारें। नल ने अपनी अश्वविद्या के बल से ऋतुपर्ण को ठीक समय पर कुंडनिपुर पहुँचा दिया तथा वहाँ नल और दमयंती का मिलन हुआ।

बौधायन श्रौत्रसूत्र (२०,१२) के अनुसार ऋतुपर्ण भंगाश्विन का पुत्र तथा शफाल के राजा थे। वायु, ब्रह्म तथा हरिवंश इत्यादि पुराणों में ऋतुपर्ण को अयुतायुपुत्र बताया गया है।

कन्याकुमारी

कन्या कुमारी तमिलनाडु प्रान्त के सुदूर दक्षिण तट पर बसा एक शहर है। यह हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर का संगम स्थल है, जहां भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरते हैं। भारत के सबसे दक्षिण छोर पर बसा कन्याकुमारी वर्षो से कला, संस्कृति, सभ्यता का प्रतीक रहा है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र के विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा बेहद आकर्षक लगता हैं। समुद्र बीच पर फैले रंग बिरंगी रेत इसकी सुंदरता में चार चांद लगा देता है।

चौघड़िया

चौघडिया पंचांग हिन्दू वैदिक कैलेण्डर का एक रूप या अंग होता है। इसमें प्रतिदिन के लिये दिन, नक्षत्र, तिथि, योग एवं करण दिये होते हैं। इनके लिये प्रत्येक नगर या स्थान के लिये वहां के सूर्योदय एवं सूर्यास्त से संबंधित स्वतः सुधार होता है। यदि कभी किसी कार्य के लिए कोई मुहूर्त नहीं निकल रहा हो एवं कार्य को शीघ्रता से आरंभ करना हो या किसी यात्रा पर आवश्यक रूप से जाना हो तो उसके लिए चौघड़िया मुहूर्त देखने का विधान है। ज्योतिष के अनुसार चौघअड़िया मुहूर्त देखकर वह कार्य या यात्रा करना उत्तम होता है।एक तिथि के लिये दिवस और रात्रि के आठ-आठ भाग का एक चौघड़िया निश्चित है। इस प्रकार से 12 घंटे का दिन और 12 घंटे की रात मानें तो प्रत्येक में 90 मिनट यानि 1.30 घण्टे का एक चौघड़िया होता है जो सूर्योदय से प्रारंभ होता है। इस प्रकार सातों वारों के चौघड़िए अलग-अलग होते हैं। सामान्य रूप से अच्छे चौघड़िए शुभ, चंचल, अमृत और लाभ के माने जाते हैं तथा बुरे चौघड़िये उद्वेग, रोग और काल के माने जाते हैं।

जापान

जापान, एशिया महाद्वीप में स्थित देश है। जापान चार बड़े और अनेक छोटे द्वीपों का एक समूह है। ये द्वीप एशिया के पूर्व समुद्रतट, यानि प्रशांत महासागर में स्थित हैं। इसके निकटतम पड़ोसी चीन, कोरिया तथा रूस हैं। जापान में वहाँ का मूल निवासियों की जनसंख्या ९८.५% है। बाकी 0.5% कोरियाई, 0.4 % चाइनीज़ तथा 0.6% अन्य लोग है। जापानी अपने देश को निप्पॉन कहते हैं, जिसका मतलब सूर्योदय है। जापान की राजधानी टोक्यो है और उसके अन्य बड़े महानगर योकोहामा, ओसाका और क्योटो हैं। बौद्ध धर्म देश का प्रमुख धर्म है और जापान की जनसंख्या में 96% बौद्ध अनुयायी है। यहाँ की राजभाषा जापानी है।

तिथियाँ

हिन्दू काल गणना के अनुसार मास में ३० तिथियाँ होतीं हैं, जो दो पक्षों में बंटीं होती हैं। चन्द्र मास एक अमावस्या के अन्त से शुरु होकर दूसरे अमा वस्या के अन्त तक रहता है। अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र का भौगांश बराबर होता है। इन दोनों ग्रहों के भोंगाश में अन्तर का बढना ही तिथि को जन्म देता है। तिथि की गणना निम्न प्रकार से की जाती है।

तिथि = चन्द्र का भोगांश - सूर्य का भोगांश / (Divide) 12.

शुक्ल पक्ष में १-१४ और पूर्णिमा

कृष्ण पक्ष में १-१४ और अमावस्यावैदिक लोग वेदांग ज्योतिषके आधार पर तिथिको अखण्ड मानते है। क्षीण चन्द्रकला जब बढने लगता है तब अहोरात्रात्मक तिथि मानते है। जिस दिन चन्द्रकला क्षीण होता उस दिन अमावास्या माना जाता है। उसके के दूसरे दिन शुक्लप्रतिपदा होती है। एक सूर्योदय से अपर सूर्योदय तक का समय जिसे वेदाें में अहोरात्र कहा गया है उसी को एक तिथि माना जाता है। प्रतिपदातिथिको १, इसी क्रमसे २,३, ४,५,६,७,८,९,१०,११,१२, १३, १४ और १५ से पूर्णिमा जाना जाता है। इसी तरह पूर्णिमा के दूसरे दिन कृष्णपक्ष का प्रारम्भ होता है और उसको कृष्णप्रतिपदा (१)माना जाता है इसी क्रम से २,३,४,५,६,७,८,९,१०,११,१२, १३,१४ इसी दिन चन्द्रकला क्षीण हो तो कृष्णचतुर्दशी टुटा हुआ मानकर उसी दिन अमावास्या मानकर दर्शश्राद्ध किया जाता है और १५वें दिन चन्द्रकला क्षीण हो तो विना तिथि टुटा हुआ पक्ष समाप्त होता है। नेपाल में वेदांग ज्योतिष के आधार पर "वैदिक तिथिपत्रम्" (वैदिक पंचांग) व्यवहारमे लाया गया है। सूर्य सिद्धान्त के आधार के पंचांगाें के तिथियां दिन में किसी भी समय आरम्भ हो सकती हैं और इनकी अवधि उन्नीस से छब्बीस घण्टे तक हो सकती है।

ये १-१५ तक तिथियों को निम्न नाम से कहते हैं:-

हमारे पर्व-त्योहार हिन्दी तिथियों के अनुसार ही होते हैं, इसके पीछे एक विशेष कारण है। पर्व-त्योहारों में किसी विशेष देवता की पूजा की जाती है। अतः स्वाभाविक है कि वे जिस तिथि के अधिपति हों, उसी तिथि में उनकी पूजा हो। यही कारण है कि उस विशेष तिथि को ही उस विशिष्ट देवता की पूजा की जाए। तिथियों के स्वामी संबंधी वर्णन निम्न है :

प्रतिपदा- अग्नयादि देवों का उत्थान पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होता है। अग्नि से संबंधित कुछ और विशेष पर्व प्रतिपदा को ही होते हैं।

द्वितीया- प्रजापति का व्रत प्रजापति द्वितीया इसी तिथि को होता है।

तृतीया- चूँकि गौरी इसकी स्वामिनी है, अतः उनका सबसे महत्वपूर्ण व्रत हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को ही महिलाएँ करती हैं।

चतुर्थी- गणेश या विनायक चतुर्थी सर्वत्र विख्यात है। यह इसलिए चतुर्थी को ही होती है, क्योंकि चतुर्थी के देवता गणेश हैं।

पंचमी- पंचमी के देवता नाग हैं, अतः श्रावण में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की दोनों चतुर्थी को नागों तथा मनसा (नागों की माता) की पूजा होती है।

षष्ठी- स्वामी कार्तिक की पूजा षष्ठी को होती है।

सप्तमी- देश-विदेश में मनाया जाने वाला सर्वप्रिय त्योहार प्रतिहार षष्ठी व्रत (डालाछठ) यद्यपि षष्ठी और स्वामी दोनों दिन मनाया जाता है, किंतु इसकी प्रधान पूजा (और उदयकालीन सूर्यार्घदान) सप्तमी में ही किया जाता है। छठ पर्व के निर्णय में सप्तमी प्रधान होती है और षष्ठी गौण। यहाँ ज्ञातव्य है कि सप्तमी के देवता सूर्य हैं।वस्तुतः सायंकालीन अर्घ्य में हम सूर्य के तेजपुंज (सविता) की आराधना करते हैं, जिन्हें 'छठमाई' के नाम से संबोधित करके उन्हें प्रातःकालीन अर्घ्य ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया जाता है, जिसे ग्रामीण अंचलों में 'न्योतन' कहा जाता है, पुनः प्रातःकालीन सूर्य को 'दीनानाथ' से संबोधित किया जाता है।

दक्षिणी ध्रुव

दक्षिणी ध्रुव पृथ्वी का सबसे दक्षिणी छोर है। इसे अंटार्कटिका के नाम से भी जाना जाता है।

तथ्यानुसार दो मुख्य दक्षिणी ध्रुव हैं, एक स्थिर और दूसरा जो घूमता है।

चुम्बकीय उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव वहाँ होते है जहाँ पर कम्पास संकेत करता है। ये ध्रुव वर्ष प्रतिवर्ष घूमते रहते हैं। केवल कम्पास को देखकर ही लोग यह बता सकते हैं की वे इन ध्रुवों के निकट है। दक्षिणी ध्रुव से सारी दिशाएँ उत्तर में होती हैं, पर ध्रुवों के बिल्कुल निकट कम्पास भरोसेमंद नहीं है।

भौगोलिक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव वे ध्रुव हैं जिनपर पृथ्वी घूमती है, वहीं जिन्हें लोग एक ग्लोब पर देखते हैं कहाँ पर साती उत्तर/दक्षिण की रेखाएँ मिलती है। ये ध्रुव एक ही स्थान पर रहते है और यही वे ध्रुव होते हैं जब हम केवल उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव कहते हैं। लोग कुछ विशेष तारों को देखकर ये बता सकते हैं कि वे इन ध्रुवों पर है। ध्रुवों पर एक तारा समान ऊँचाई पर चक्कर लगाता है और क्षितिज पर कबी भी अस्त नहीं होता।

दक्षिणी ध्रुव पर पड़ने वाला महाद्वीप है अंटार्कटिका। यह बहुत ही ठंडा स्थान है। सर्दियों के दौरान कई सप्ताहों तक यहाँ सूर्योदय नहीं होता। और गर्मियों के दौरान, दिसंबर के अंत से मार्च के अंत तक सूर्यास्त नहीं होता।

स्वयं ध्रुवीय बिन्दु पर भी छः महीने की सर्दियाँ होती हैं और इतने समय तक सूर्योदय नहीं होता। और जब सूर्योदय होता है तो, यह छः महीनों की लंबी गर्मियाँ आरंभ होती हैं, जब कोई व्यक्ति दिन के किसी भी समय खड़े होकर सूरज को क्षितिज के ऊपर घड़ी की उल्टी दिशा में अपने चारो ओर घूमते हुए देख सकता है।

दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचना कठिन है। उत्तरी ध्रुव के विपरीत, जोकि समुद्र और समतल समुद्री बर्फ से ढका होता है, दक्षिणी ध्रुव एक पर्वतीय महाद्वीप पर स्थित है। यह महाद्वीप है अंटार्कटिका। यह बर्फ की मोटी चादर से ढका है और अपने केंद्र पर तो १.५ किमी से भी मोटी बर्फ से। दक्षिणी ध्रुव बहुत ऊँचे स्थान पर है और बहुत वातमय (तूफ़ानी)। यह उन स्थानों से बहुत दूर है जहाँ पर वैज्ञानिकों की बस्तियाँ हैं और यहाँ जाने वाले जहाज़ों को प्रायः बर्फ़ीले समुद्री रास्ते से होकर जाना पड़ता है। तट पर पहुँचने के बाद भी भूमार्ग से यात्रा करने वाले खोजियों को ध्रुव तक पहुँचने के लिए १,६०० किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा करनी पड़ती है। उन्हें तैरते हिमखंडों को पार करके बर्फ़ से ढकी भूमि और फ़िर सीधे खड़े पर्वतीय हिमनदों को जो टूटी, मुड़ी हुई समुद्र में गिरती बर्फ से ढके होते हैं और तेज़ जमाने वाली बर्फीली हवाओं वाले पठार को भी पार करना होता है।

दशमी

हिंदू पंचांग की दसवीं तिथि को दशमी कहते हैं। यह तिथि मास में दो बार आती है। पूर्णिमा के बाद और अमावस्या के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली दशमी को कृष्ण पक्ष की दशमी और अमावस्या के बाद आने वाली दशमी को शुक्ल पक्ष की दशमी कहते हैं।

अक्षर "मी" अंतमे होता है, ऐसी पाँच तिथीयाँ है!{५पंचमी,७सप्तमी,८अष्टमी,९नवमी और १०दशमी} ये पाँचो तिथीयाँ हर महीनेमे दो बार याने, पहलीबार शुक्लपक्ष और दुसरीबार कृष्णपक्षमे आती है।माघ-स्नान अनुभूती मे माघमास शुक्लपक्ष दशमी शुक्रवार को यदी पंचगंगामें से कौनसी भी नदी संगमपर सूर्योदय के पूर्व स्नान करके गुरूदत्तात्रेय की प्रार्थना करने का प्रसाद-फलसे अनन्यसाधारण महत्त्व प्राप्त होता है। यही स्नान शुक्ल-अष्टमी से पौर्णिमा तक करने का प्रसाद अधिक लाभदायी और आयुआरोग्य संपन्न, अष्ट-फल प्राप्त करनेवाला होता है। ..卐 ॐश्रींॐ 卐ॐहृींद्रांहृींॐ卐 यह जप करते स्नान करना है। जगदंब नमोऽस्तुते॥ शुभंकरोती!!कल्याणम्॥

भारतीय मानक समय

भारतीय मानक समय (संक्षेप में आइएसटी) (अंग्रेज़ी: Indian Standard Time इंडियन् स्टैंडर्ड् टाइम्, IST) भारत का समय मंडल है, एक यूटीसी+5:30 समय ऑफ़सेट के साथ में। भारत में दिवालोक बचत समय (डीएसटी) या अन्य कोइ मौसमी समायोग नहीं है, यद्यपि डीएसटी 1962 भारत-चीन युद्ध, 1965 भारत-पाक युद्ध और 1971 भारत-पाक युद्ध में व्यवहार था। सामरिक और विमानन समय में, आइएसटी का E* ("गूंज-सितारा") के साथ में नामित होता है।

मुहूर्त

हिन्दू धर्म में मुहूर्त एक समय मापन इकाई है। वर्तमान हिन्दी भाषा में इस शब्द को किसी कार्य को आरम्भ करने की शुभ घड़ी को कहने लगे हैं।

एक मुहूर्त बराबर होता है दो घड़ी के, या लगभग 48 मिनट के.

अमृत/जीव मुहूर्त और ब्रह्म मुहूर्त बहुत श्रेष्ठ होते हैं ; ब्रह्म मुहूर्त सूर्योदय से पच्चीस नाड़ियां पूर्व, यानि लगभग दो घंटे पूर्व होता है। यह समय योग साधना और ध्यान लगाने के लिये सर्वोत्तम कहा गया है।

मुहूर्तों के नाम

ए ए मैकडोनेल के अनुसार तैत्तिरीय ब्राह्मण में १५ मुहुर्तों के नाम गिनाए गये हैं।

(१) संज्ञानं (२) विज्ञानं (३) प्रज्ञानं (४) जानद् (५) अभिजानत्

(६) संकल्पमानं (७) प्रकल्पमानम् (८) उपकल्पमानम् (९) उपकॢप्तं (१०) कॢप्तम्

(११) श्रेयो (१२) वसीय (१३) आयत् (१४) संभूतं (१५) भूतम् ।चित्रः केतुः प्रभानाभान्त् संभान् ।

ज्योतिष्मंस्-तेजस्वानातपंस्-तपन्न्-अभितपन् ।

रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः ।

दर्शा दृष्टा दर्शता विष्वरूपा सुर्दर्शना ।

आप्य्-आयमाणाप्यायमानाप्याया सु-नृतेरा ।

आपूर्यमाणा पूर्यमाणा पूर्यन्ती पूर्णा पौर्णमासी ।

दाता प्रदाताऽनन्दो मोदः प्रमोदः ॥ १०.१.१ ॥शतपथ ब्राह्मण में एक दिन के पन्द्रहवें भाग (१/१५) को 'मुहूर्त' की संज्ञा दी गयी है।

रात

रात्रि अथवा रात का समय अथवा रात सूर्यास्त और सूर्योदय के मध्य का समय होता है जब सूर्य क्षितिज से नीचे की ओर होता है। इसका अन्य शब्दों में अर्थ उस समयकाल से होता है जब दिन नहीं होता।

राहुकाल

राहुकाल जिसे राहुकालम भी कहा जाता है दिन में एक मुहूर्त (२४ मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है। यह स्थान और तिथि के साथ अलग अलग होता है, अर्थात अलग अलग स्थान के लिए राहुकाल बदलता रहता है। यह अंतर समयक्षेत्र में अंतर के कारण होता है। मान्यता अनुसार किसी भी पवित्र, शुभ या अच्छे कार्य को इस समय आरंभ नहीं करना चाहिए। राहुकाल प्रायः प्रारंभ होने से दो घंटे तक रहता है। पौराणिक कथाओं और वैदिक शास्त्रों के अनुसार इस समय अवधि में शुभ कार्य आरंभ करने से बचना चाहिए।

सीताकांत महापात्र

सीताकांत महापात्र (जन्म : १७ सितम्बर १९३७) उड़िया साहित्यकार हैं। इन्हें 1993 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें सन २००३ में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था।

सीताकान्त की कविता का काव्य संसार यथार्थ और अनुभूति के सोलेन सम्मिश्रम से निर्मित हुआ है। उनकी कविताओं का सांस्कृतिक धरातल उनके अनुभव की उपज है। अतीत के जिस झरोखे से वे गांव की पगडंडी, तालाब, नदी, घर मन्दिर, सूर्योदय, ढलती शाम व मानवीय संबंधों इत्यादि का अवलोकन करते हुए सहजता से अपनी कविता में अभिव्यक्ति करते हैं, वह अनायास ही पाठकों को अपने में बांध लेती हैं।

सूर्योदय नगरपालिका

सूर्योदय नगरपालिका नेपालके मेची अंचलके इलाम जिलाकी एक नगरपालिका है।

सौम

सौम (صوم) और बहुवचन सियाम (صيام) अरबी भाषा के शब्द हैं। उपवास को अरबी में "सौम" कहते हैं। रमज़ान के पवित्र माह में रखे जाने वाले उपवास ही "सौम" हैं। उर्दू और फ़ारसी भाषा में सौम को "रोज़ा" कहते हैं।

इस्लाम के पाँच मूलस्थंबों में से एक सौम है।

हरतालिका व्रत

हरतालिका व्रत को हरतालिका तीज या तीजा भी कहते हैं। यह व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है क्योंकि जहां करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जल व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत तोड़ा जाता है। इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं।

सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी−शंकर का ही पूजन किया जाता है। इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरी−शंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है। रात में भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है।

हिन्दू मापन प्रणाली

पुनर्निर्देशित हिन्दू काल गणना

गणित और मापन के बीच घनिष्ट सम्बन्ध है। इसलिये आश्चर्य नहीं कि भारत में अति प्राचीन काल से दोनो का साथ-साथ विकास हुआ। लगभग सभी प्राचीन भारतीय ने अपने दैनिक-ग्रन्थों में मापन, मापन की इकाइयों एवं मापनयन्त्रों का वर्णन किया है।

संस्कृत कें शुल्ब शब्द का अर्थ नापने की रस्सी या डोरी होता है। अपने नाम के अनुसार शुल्ब सूत्रों में यज्ञ-वेदियों को नापना, उनके लिए स्थान का चुनना तथा उनके निर्माण आदि विषयों का विस्तृत वर्णन है।ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त के २२वें अध्याय का नाम 'यन्त्राध्याय' है।

अन्य भाषाओं में

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