विचारधारा

विचारधारा, सामाजिक राजनीतिक दर्शन में राजनीतिक, कानूनी, नैतिक, सौंदर्यात्मक, धार्मिक तथा दार्शनिक विचार चिंतन और सिद्धांत प्रतिपादन की व्यवस्थित प्राविधिक प्रक्रिया है। विचारधारा का सामान्य आशय राजनीतिक सिद्धांत रूप में किसी समाज या समूह में प्रचलित उन विचारों का समुच्चय है जिनके आधार पर वह किसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संगठन विशेष को उचित या अनुचित ठहराता है।[1] विचारधारा के आलोचक बहुधा इसे एक ऐसे विश्वास के विषय के रूप में व्यवहृत करते हैं जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। तर्क दिया जाता है कि किसी विचारधारा विशेष के अनुयायी उसे अपने आप में सत्य मानकर उसका अनुसरण करते हैं, उसके सत्यापन की आवश्यकता नहीं समझी जाती। वस्तुतः प्रत्येक विचारधारा के समर्थक उसकी पुष्टि के लिए किंचित सिद्धांत और तर्क अवश्य प्रस्तुत करते हैं और दूसरे के मन में उसके प्रति आस्था और विश्वास पैदा करने का प्रयत्न करते हैं।[2]

साम्यवाद में विचारधारा

साम्यवाद में विचारधारा को अधिरचना का अंग माना जाता है, जहाँ वह आर्थिक संबंधों को प्रतिबिंबित करती है। साम्यवादी चिंतनधारा की मान्यता है कि अधिकतर विचार, विशेषकर समाज के संगठन से संबंधित विचार, वर्ग विचार होते हैं। वे वास्तव में उस वर्ग के विचार होते हैं जिसका उस काल में समाज पर प्रभुत्व होता है। इन विचारों को वह वर्ग बाकी समाज पर थोपे रखता है क्योंकि यह वर्ग प्रचार के सारे साधनों का स्वामी होता है।[3] विरोधी वर्गों वाले समाज में विचारधारात्मक संघर्ष वर्ग हितों के संघर्ष के अनुरूप होता है, क्योंकि विचारधारा यथार्थ का सच्चा या झूठा प्रतिबिंब भी हो सकता है और वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक भी हो सकता है। प्रतिक्रियावादी वर्गों के हित झूठी विचारधारा को पोषित करते हैं। प्रगतिशील, क्रांतिकारी वर्गों के हित विज्ञानसम्मत चिंतनधारा का निर्माण करने में सहायक होते हैं।[4] साम्यवादी मान्यतानुसार विचारधारा का विकास अंततोगत्वा अर्थव्यवस्था से निर्धारित होता है, परन्तु साथ ही उसमें कुछ सापेक्ष स्वतंत्रता भी होती है। इसकी अभिव्यक्ति विशेष रूप से विचारधारा की अंतर्वस्तु का सीधे आर्थिक स्पष्टीकरण करने की असम्भवनीयता में और साथ ही आर्थिक तथा विचारधारात्मक विकास की कुछ असमतलता में होती है। इन सबके अलावा विचारधारा की सापेक्ष स्वतंत्रता की अधिकतर अभिव्यक्ति विचारधारात्मक विकास के आंतरिक नियमों की संक्रिया में और साथ ही उन विचारधारात्मक क्षेत्रों में होती है, जो आर्थिक आधार से बहुत दूर स्थित होते हैं। विचारधारा की सापेक्ष स्वतंत्रता का कारण यह है कि विचारधारात्मक विकासक्रम विभिन्न आर्थिकेतर कारकों के प्रभावान्तर्गत रहता है। ये कारक हैं : (१) विचारधारा के विकास में आंतरिक अनुक्रमिक संबंध, (२) विचारधारा विशेष के निरूपकों की निजी भूमिका तथा (३) विचारधारा के विभिन्न रूपों का पारस्परिक प्रभाव, आदि।[5]

बुर्जुआ वर्ग की विचारधारा

बीसवीं शताब्दी के छठे और सातवें दशक में बुर्जुआ दार्शनिकों के बीच यथार्थ के प्रति विज्ञानसम्मत दृष्टिकोण और विचारधारा के बेमेल होने संबंधी विचार व्यापक रूप से प्रचलित हुए। बुर्जुआ विचारधारा को आत्मिक प्रत्यय की भाँति मानते हैं जो केवल समूह या दल विशेष के हितों को व्यक्त करती है। इसी कारण वे विज्ञान और विचारधारा के अंतरों को निरपेक्ष बनाने, उन्हें एक-दूसरे के मुकाबले में रखने के इच्छुक होते हैं। बुर्जुआ दर्शन और विज्ञान का तथाकथित "निर्विचारधाराकरण" करने का प्रयत्न करते हैं। आठवें दशक में बुर्जुआ विचारधारा निरूपकों ने इस ध्येय की सिद्धि में साम्यवाद के मुकाबले अपनी नयी विचारधारा को प्रस्तुत करते हुए "पुनर्विचारधाराकरण" की बात करना प्रारंभ कर दिया।[6]

इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-५७९ ISBN: ५-0१000९0७-२
  2. राजनीति सिद्धांत की रूपरेखा, ओम प्रकाश गाबा, मयूर पेपरबैक्स, २०१०, पृष्ठ-२५, ISBN:८१-७१९८-०९२-९
  3. मार्क्सवाद क्या है?, एमिल बर्न्स, राहुल फाउण्डेशन, लखनऊ, २00६, पृष्ठ- १४, ISBN:८१-८७७२८-४७-७
  4. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-५७९ ISBN: ५-0१000९0७-२
  5. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-५८0 ISBN: ५-0१000९0७-२
  6. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-५८0 ISBN: ५-0१000९0७-२

बाहरी कड़ियाँ

अद्वैत वेदान्त

अद्वैत वेदान्त वेदान्त की एक शाखा है।

अहं ब्रह्मास्मि

अद्वैत वेदांत यह भारत मेँ उपज हुई कई विचारधाराओं में से एक है। जिसके आदि शंकराचार्य पुरस्कर्ता थे। भारत में परब्रह्म के स्वरुप के बारे में कई विचारधाराएं हैं। जिसमें द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, केवलाद्वैत, द्वैताद्वैत ऐसी कई विचारधाराएँ हैं। जिस आचार्य ने जिस रूप में (ब्रह्म) को देखा उसका वर्णन किया। इतनी विचारधाराएँ होने पर भी सभी यह मानते है कि भगवान ही इस सृष्टी का नियंता है। अद्वैत विचारधारा के संस्थापक शंकराचार्य है उसे शांकराद्वैत भी कहा जाता है। शंकराचार्य मानते हैं कि संसार में ब्रह्म ही सत्य है, बाकी सब मिथ्या है। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र में "अहं ब्रह्मास्मि" ऐसा कहकर अद्वैत सिद्धांत बताया है।

अद्वैत सिद्धांत चराचर सृष्टी में भी व्याप्त है। जब पैर में काँटा चुभता है तब आखों से पानी आता है और हाथ काँटा निकालने के लिए जाता है ये अद्वैत का एक उत्तम उदाहरण है।

आम आदमी पार्टी

आम आदमी पार्टी, संक्षेप में आप, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल एवं अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से जुड़े बहुत से सहयोगियों द्वारा गठित एक भारतीय राजनीतिक दल है। इसके गठन की आधिकारिक घोषणा २६ नवम्बर २०१२ को भारतीय संविधान अधिनियम की ६३ वीं वर्षगाँठ के अवसर पर जंतर मंतर, दिल्ली में की गयी थी।

सन् २०११ में इंडिया अगेंस्ट करपशन नामक संगठन ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुए जन लोकपाल आंदोलन के दौरान भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा जनहित की उपेक्षा के खिलाफ़ आवाज़ उठाई। अन्ना भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल आंदोलन को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, जबकि अरविन्द केजरीवाल और उनके सहयोगियों की यह राय थी कि पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा जाये। इसी उद्देश्य के तहत पार्टी पहली बार दिसम्बर २०१३ में दिल्ली विधानसभा चुनाव में झाड़ू चुनाव चिन्ह के साथ चुनावी मैदान में उतरी।

पार्टी ने चुनाव में २८ सीटों पर जीत दर्ज की और कांग्रेस के समर्थन से दिल्ली में सरकार बनायी। अरविन्द केजरीवाल ने २८ दिसम्बर २०१३ को दिल्ली के ७वें मुख्य मन्त्री पद की शपथ ली। ४९ दिनों के बाद १४ फ़रवरी २०१४ को विधान सभा द्वारा जन लोकपाल विधेयक प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को समर्थन न मिल पाने के कारण अरविंद केजरीवाल की सरकार ने त्यागपत्र दे दिया।

उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति

उडुपी राजगोपालाचार्य अनंतमूर्ति (२१ दिसम्बर १९३२ - २२ अगस्त २०१४) समकालीन कन्नड़ साहित्यकार, आलोचक और शिक्षाविद् हैं। इन्हें कन्नड़ साहित्य के नव्या आंदोलन का प्रणेता माना जाता है। इनकी सबसे प्रसिद्ध रचना संस्कार है। ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले आठ कन्नड़ साहित्यकारों में वे छठे हैं। उन्होंने महात्मा गांधी विश्वविद्यालय तिरुअनन्तपुरम् और केंद्रीय विश्वविद्यालय गुलबर्गा के कुलपति के रूप में भी काम किया था। साहित्य एवं शिक्षा]] के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सन १९९८ में [[भारत सरकार द्वारा इन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। २०१३ के मैन बुकर पुरस्कार पाने वाले उम्मीदवारों की अंतिम सूची में इन्हें भी चुना गया था। २२ अगस्त २०१४ को ८१ वर्ष की अवस्था में बंगलूर (कर्नाटक) में इनका निधन हो गया।

उत्तराखण्ड क्रान्ति दल

उत्तराखण्ड क्रान्ति दल (उक्राद) उत्तराखण्ड का एक क्षेत्रीय राजनैतिक दल है। यह राष्ट्रीय दलों जो क्षेत्र की राजनीति पर हावी हैं, के विपरीत स्वयं को उत्तराखण्ड के एकमात्र क्षेत्रीय दल के रूप में प्रस्तुत करता है।

गंगेश उपाध्याय

गंगेश उपाध्याय भारत के १३वी शती के गणितज्ञ एवं नव्य-न्याय दर्शन परम्परा के प्रणेता प्रख्यात नैयायिक थे। उन्होंने वाचस्पति मिश्र (९०० - ९८०) की विचारधारा को बढ़ाया।

धर्म

धर्म का अर्थ होता है, धारण, अर्थात जिसे धारण किया जा सके, धर्म ,कर्म प्रधान है। गुणों को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है। धर्म को गुण भी कह सकते हैं। यहाँ उल्लेखनीय है कि धर्म शब्द में गुण का अर्थ केवल मानव से संबंधित नहीं है। पदार्थ के लिए भी धर्म शब्द प्रयुक्त होता है, यथा पानी का धर्म है बहना, अग्नि का धर्म है प्रकाश, उष्मा देना और संपर्क में आने वाली वस्तु को जलाना। व्यापकता के दृष्टिकोण से धर्म को गुण कहना सजीव, निर्जीव दोनों के अर्थ में नितांत ही उपयुक्त है। धर्म सार्वभौमिक होता है। पदार्थ हो या मानव पूरी पृथ्वी के किसी भी कोने में बैठे मानव या पदार्थ का धर्म एक ही होता है। उसके देश, रंग रूप की कोई बाधा नहीं है। धर्म सार्वकालिक होता है यानी कि प्रत्येक काल में युग में धर्म का स्वरूप वही रहता है। धर्म कभी बदलता नहीं है। उदाहरण के लिए पानी, अग्नि आदि पदार्थ का धर्म सृष्टि निर्माण से आज पर्यन्त समान है। धर्म और सम्प्रदाय में मूलभूत अंतर है। धर्म का अर्थ जब गुण और जीवन में धारण करने योग्य होता है तो वह प्रत्येक मानव के लिए समान होना चाहिए। जब पदार्थ का धर्म सार्वभौमिक है तो मानव जाति के लिए भी तो इसकी सार्वभौमिकता होनी चाहिए। अतः मानव के सन्दर्भ में धर्म की बात करें तो वह केवल मानव धर्म है।

वैदिक काल में "धर्म" शब्द एक प्रमुख विचार प्रतीत नहीं होता है। यह ऋग्वेद के 1,000 भजनों में एक सौ गुना से भी कम दिखाई देता है जो कि 3,000 साल से अधिक पुराना है। 2,300 साल पहले सम्राट अशोक ने अपने कार्यकाल में इस शब्द का इस्तेमाल करने के बाद, "धर्म" शब्द प्रमुखता प्राप्त की थी। पांच सौ वर्षों के बाद, ग्रंथों का समूह सामूहिक रूप से धर्म-शास्त्रों के रूप में जाना जाता था, जहां धर्म सामाजिक दायित्वों के साथ समान था, जो व्यवसाय (वर्णा धर्म), जीवन स्तर (आश्रम धर्म), व्यक्तित्व (सेवा धर्म) पर आधारित थे। , राजात्व (राज धर्म), स्री धर्म और मोक्ष धर्म।

हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, जैन या बौद्ध आदि धर्म न होकर सम्प्रदाय या समुदाय मात्र हैं। “सम्प्रदाय” एक परम्परा के मानने वालों का समूह है। ऐसा माना जाता है कि धर्म इंसान को अच्छाई के मार्ग पर लेकर जाता है।

( पालि : धम्म ) भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। 'धर्म' शब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई समतुल्य शब्द का पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि।

सभी संप्रदायों में प्रकाश तक पहुचने के भिन्न स्थिति है ।

पूर्वी संंप्रदायों में देवता महात्मा के सर के पीछे है प्रकाश वलय है ==

हिन्दू त्रिदेव के सर के पीछे प्रकाश वलय ।

जैन में तीर्थंकर के पीछे प्रकाश वलय ।

बौध्द में बुध्द में।

सिख में गुरूनानक में।

झेन में चांद के रूप में।

शिन्तो में सूर्य देवी कामी है ।

ताओ कन्यफूजियस में भी महात्माओ के पीछे है ।

जबकी पश्चात् संंप्रदायों में भिन्न है ।

यहूदी में आग का दिया या फिर तारा है ।

क्रिश्चियन में पवित्र आत्मा के रूप में और मरीयम यशु गाॅड फादर के सर के पीछे है ।

मुस्लिम में ईद का चांद और तारा है ।

पारसी में आग के दिया या फिर महात्मा के सर के पीछे है ।

अर्थात जो प्रकाश की कल्पना होती है ध्यान में वही मनुष्य को स्वयं के चेतना अनुसार परमात्मा या महात्मा दिखाई देते है ।

यही प्रकाश ही परम् सत्य आधार है इसे वेदों में ब्रह्म कहा गया है जिसको जाने की कोशिश में माया वश वहां परमात्मा नजर आता है।

विज्ञान के सिध्दान्त का बिंग बैंग का शुरूवाती प्रकाश बिन्दु है जिसे विश्व की उत्पत्ति हुई है ।

ह्रदय के भीतर ही प्राचीन धर्म सभ्यता व साम्राज्य के दुनिया के घटनाऐ होते है ।

धर्मो की उत्पत्ति =

पूर्वी धर्म

हिन्दू संप्रदाय ब्रह्म जिसके स्वरूप ब्रह्मा विष्णु और महेश है उनकी उत्पत्ति के बाद सतयुग त्रेतायुग द्वापर युग व कलयुग समय है । लगभग 50 लाख वर्ष पहले ।

जैन संप्रदाय ऋषभनाथ के विचारधारा से हुई तीर्थंकर जो ब्राम्हा के मानस पुत्र के वंशज और राम के पूर्वज है ये भी 50 लाख वर्ष पूर्व।

बौद्ध संप्रदाय बुद्ध के विचारधारा चार हजार वर्ष पूर्व ।

झेन संप्रदाय बोधीधर्मा के विचारधारा तीन चार हजार वर्ष पूर्व

सिख संप्रदाय गुरूनानक के विचारधारा आठ सौ वर्ष पूर्व ।

हिन्दू संप्रदाय के ही जन्में महात्मा ऋषभनाथ बुद्ध बोधिधर्मा व गुरूनानक है ।

ताओ संप्रदाय लाओत्सू के विचारधारा तीन हजार वर्ष पूर्व।

शिन्तो संप्रदाय कोई समय नहीं है और ये पीढी दार पीढ़ी विचारधारा है ।

कन्फ्यूशी संप्रदाय कन्यफूशियस के विचारधारा है चार हजार वर्ष पूर्व।

विज्ञान के सिध्दान्त वैज्ञानिकों के सिध्दान्त है जो भौतिक तत्वों का विश्लेषण पर आधारित है ।

पश्चिमी संप्रदाय ====

इन संप्रदायों की स्थापना किसी दूसरे के मान्यता का विरोध कर स्थापित किया गया है स्वयं के विचार को ।

यहूदी संप्रदाय मूसा ने मिस्र के फेरूओ के विचारों का विरोध कर एक नया संप्रदाय बनाया पांच छैः हजार वर्ष पूर्व।

क्रिश्चियन संप्रदाय यशु ने शायद रोमन विचारधारा का विरोध किया और नया बनाया ढाई हजार वर्ष पहले ।

मुस्लिम संप्रदाय मोहम्मद ने कई संस्कृति के विचारधारा का विरोध कर नया संप्रदाय लगभग चौदह सौ वर्ष पहले ।

पारसी संप्रदाय के जरथुष्ट्री ने भी किसी सभ्यता का विरोध कर बनाया था ।

अगर ध्यान दिया जाऐ तो पश्चिमी संप्रदाय में पहले प्राचीन सभ्यताएं रहती थी जिसकी मान्यता कुछ और ही थी वे धर्म नहीं थे जैसे मिस्र रोमन बेबीलोन सुमेरू इन्ही में कही सिन्धुघाटी सभ्यता भी है इन सबका अस्तित्व खत्म हुआ तो यहूदी इसाई मुस्लिम और पारसी संप्रदाय आये ।

और ये संप्रदाय जा फैले वहां माया सभ्यता इंका सभ्यता आदि का अंत हो गया ।

पूर्वी संप्रदाय के बाद साम्राज्य आए विक्रमादित्य मौर्य चंगेज खान चोला चीन व मंगोल आदि के साम्राज्य है ।

इन साम्राज्य नीति के कारण विश्व का आज वर्तमान का इतिहास है ।

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) (उर्दू: پاکستان تحريک انصاف, "न्याय आंदोलन के लिए पाकिस्तान आंदोलन") पाकिस्तान की एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल है, जिसे इमरान ख़ान द्वारा 1996 में स्थापित किया गया था। पीटीआई पाकिस्तान की सबसे तेजी से उभरती राजनीतिक पार्टी है, और उसने एक त्रि-पार्टी प्रणाली बनाई है, जिसमें यह वामपंथी पीपुल्स पार्टी और रूढ़िवादी पीएमएल-एन दोनों का विरोध करती है।

पार्टी का उद्देश्य कल्याणकारी राज्य बनाना है, जहाँ राज्य नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए ज़िम्मेदार हो। यह विचारों की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत आयकर को खत्म करने और पाकिस्तान में धार्मिक भेदभाव को खत्म करने को बढ़ावा देती है।

1996 में इसकी स्थापना के तुरंत बाद, पार्टी को शुरुआती कम सफलता मिली थी। खान ने पाकिस्तानी आम चुनाव, 2002 में अपनी पहली सीट जीती। पार्टी ने 2008 के चुनाव का बहिष्कार किया, लेकिन 2013 में इसे 7.5 मिलियन से ज्यादा वोट मिले, जिससे वोटों की संख्या में तीसरा और सीटों की संख्या में तीसरा स्थान हासिल हुआ। यद्यपि यह राष्ट्रीय स्तर पर सरकार का विरोध करती रही है, लेकिन पार्टी खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय सरकार को नियंत्रित करती रही, जो जातीय पश्तूनों के बीच अपने समेकित समर्थन का प्रतिबिंब है।

पार्टी खुद को एक 'विरोधी स्थिति' आंदोलन 'समतावादी इस्लामी लोकतंत्र की वकालत करती है। यह मुख्यधारा की पाकिस्तानी राजनीति की एकमात्र गैर-पारिवारिक पार्टी होने का दावा करती है। पाकिस्तान और विदेशों में 10 मिलियन से अधिक सदस्यों के साथ, यह सदस्यता के मामलें में पाकिस्तान की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है। 2013 के चुनाव परिणामों के मुताबिक, पीटीआई नेशनल असेंबली में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी थी, और खैबर पख्तुनख्वा की शासी पार्टी के रूप में उभरी थी।

2018 के आम चुनाव में यह एक सशक्त पार्टी बन कर उभरी है। पुराने शासी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-एन पर लगे संगीन भ्रष्टाचार के आरोपों और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के कमजोर नेतृत्व के चलते ख़ान, प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार और पाकिस्तान जनता के चहेते बन कर उभरे हैं। कहा जाता है कि उन पर पाकिस्तानी सेना का भी हाथ है। २७ जुलाई २०१८ को आये प्रारंभिक परिणामों में पार्टी को ११५ सीटें मिली हैं।

भारतीय जनता पार्टी

भारतीय जनता पार्टी (संक्षेप में, भाजपा) भारत का प्रमुख राजनीतिक दल है। २०१६ के अनुसार [update] भारतीय संसद और राज्य विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व के मामले में यह भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और प्राथमिक सदस्यता के मामले में यह दुनिया का सबसे बड़ा दल है।

महादेव गोविंद रानडे

न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे (१८ जनवरी १८४२ – १६ जनवरी १९०१) एक ब्रिटिश काल के भारतीय न्यायाधीश, लेखक एवं समाज-सुधारक थे।

मार्क्सवाद

कार्लमार्क्स की साम्यवादी विचारधारा ही मार्क्सवादी विचारधारा कहलायी।ये एक वैज्ञानिक समाजवादी विचारक थे।ये यथार्थ पर आधारित समाजवादी विचारक के रूप में जाने जाते हैं।सामाजिक राजनीतिक दर्शन में मार्क्सवाद (Marxism) उत्पादन के साधनों पर सामाजिक स्वामित्व द्वारा वर्गविहीन समाज की स्थापना के संकल्प की साम्यवादी विचारधारा है। मूलतः मार्क्सवाद उन आर्थिक राजनीतिक और आर्थिक सिद्धांतो का समुच्चय है जिन्हें उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स और व्लादिमीर लेनिन तथा साथी विचारकों ने समाजवाद के वैज्ञानिक आधार की पुष्टि के लिए प्रस्तुत किया।

रिपब्लिकन पार्टी

रिपब्लिकन पार्टी (जिसे "ग्रैंड ऑल्ड पार्टी" के नाम से भी जाना जाता है तथा जिससे प्रचिलित परिवर्णी शब्द GOP (जीओपी) से भी इसे जाना जाता है) संयुक्त राज्य अमरीका की दो सबसे बड़ी राजनीति पार्टीयों में से एक है, दूसरी डेमोक्रैटिक पार्टी है। 1854 में दासत्व-विरोधी कार्यकर्ताओं द्वारा स्थापित की गई रिपब्लिकन पार्टी ने देश की राजनीति पर 1860 से 1932 तक की ज्यादातर अवधि में अपना वर्चस्व रखा था। अमेरिका के 44 में से 18 राष्ट्रपति रिपब्लिकन पार्टी से बने हैं। सबसे नवीनतम समय में रिपब्लिकन पार्टी से बने राष्ट्रपति जॉर्ज वॉकर बुश थे, जिनका कार्यकाल 2001 से 2009 तक था।

निवर्तमान समय में पार्टी की नीतिज्ञता अमेरिकी रूढ़िवादिता को प्रतिबिंबित करती है। रिपब्लिकन पार्टी की अमेरिकी रूढ़िवादिता पूरी तरह से उदारवाद की राजनीतिक विचारधारा की अस्वीकृति पर आधारित नहीं हैं, चूँकि अमेरिकी रूढ़िवादिता के कई सिद्धांत शास्त्रीय उदारवाद पर ही आधारित हैं। इसके विपरीत रिपब्लिकन पार्टी की रूढ़िवादिता मुख्यतः शास्त्रीय सिद्धान्तों पर आधारित है जो मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रैटिक पार्टी के आधुनिक उदारवाद के विरूद्ध है। डेमोक्रैटिक पार्टी की मुख्य विचारधारा समकालीन समय में अमेरिकी उदारवाद पर आधारित है।

वर्ष 2010 में चुनी गई 112 वी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के पास हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव (प्रतिनिधि सभा) में सीटों का बहुमत है तथा सीनेट (वरिष्ठ सभा) में यह अल्पमत में है। पार्टी के पास देश के कुल 50 राज्यों में से बहुमत में राज्यपाल हैं तथा राज्य विधायिकाओं में भी बहुमत है।

2012 में चुने गई 113 वें कांग्रेस में भी रिपब्लिकन पार्टी के पास हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव (प्रतिनिधि सभा) में सीटों का बहुमत है तथा सीनेट (वरिष्ठ सभा) में यह अल्पमत में है। साथ ही पार्टी के पास देश के कुल 50 राज्यों में से बहुमत में राज्यपाल हैं तथा राज्य विधायिकाओं में भी बहुमत है।

रूस

रूस (रूसी: Росси́йская Федера́ция / रोस्सिज्स्काया फ़ेदेरात्सिया, Росси́я / रोस्सिया) पूर्वी यूरोप और उत्तर एशिया में स्थित एक विशाल आकार वाला देश। कुल १,७०,७५,४०० किमी२ के साथ यह विश्व का सब्से बड़ा देश है। आकार की दृष्टि से यह भारत से पाँच गुणा से भी अधिक है। इतना विशाल देश होने के बाद भी रूस की जनसंख्या विश्व में सातवें स्थान पर है जिसके कारण रूस का जनसंख्या घनत्व विश्व में सब्से कम में से है। रूस की अधिकान्श जनसंख्या इसके यूरोपीय भाग में बसी हुई है। इसकी राजधानी मॉस्को है। रूस की मुख्य और राजभाषा रूसी है।

रूस के साथ जिन देशों की सीमाएँ मिलती हैं उनके नाम हैं - (वामावर्त) - नार्वे, फ़िनलैण्ड, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, पोलैण्ड, बेलारूस, यूक्रेन, जॉर्जिया, अज़रबैजान, कजाकिस्तान, चीन, मंगोलिया और उत्तर कोरिया।

रूसी साम्राज्य के दिनों से रूस ने विश्व में अपना स्थान एक प्रमुख शक्ति के रूप में किया था। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ विश्व का सबसे बड़ा साम्यवादी देश बना। यहाँ के लेखकों ने साम्यवादी विचारधारा को विश्व भर में फैलाया। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ एक प्रमुख सामरिक और राजनीतिक शक्ति बनकर उभरा। संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ इसकी वर्षों तक प्रतिस्पर्धा चली जिसमें सामरिक, आर्थिक, राजनैतिक और तकनीकी क्षेत्रों में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ थी। १९८० के दशक से यह आर्थिक रूप से क्षीण होता चला गया और १९९१ में इसका विघटन हो गया जिसके फलस्वरूप रूस, सोवियत संघ का सबसे बड़ा राज्य बना।

वर्तमान में रूस अपने सोवियत संघ काल के महाशक्ति पद को पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि रूस अभी भी एक प्रमुख देश है लेकिन यह सोवियत काल के पद से भी बहुत दूर है।

वामपन्थी राजनीति

वामपंथी राजनीति (left-wing politics या leftist politics) राजनीति में उस पक्ष या विचारधारा को कहते हैं जो समाज को बदलकर उसमें अधिक आर्थिक बराबरी लाना चाहते हैं। एक समय ऐसा भी था जब वामपंथ को मानने वालों में सिर्फ बुद्धिजीवी लोग थे, इस विचारधारा में समाज के उन लोगों के लिए सहानुभूति जतलाई जाती है जो किसी भी कारण से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों या शक्तिहीन हों। राजनीति के सन्दर्भ में 'बाएँ' और 'दाएँ' शब्दों का प्रयोग फ़्रान्सीसी क्रान्ति के दौरान शुरू हुआ। फ़्रांस में क्रान्ति से पूर्व की एस्टेट जनरल (Estates General) नामक संसद में सम्राट को हटाकर गणतंत्र लाना चाहने वाले और धर्मनिरपेक्षता चाहने वाले अक्सर बाई तरफ़ बैठते थे। आधुनिक काल में समाजवाद (सोशलिज़म) और साम्यवाद (कम्युनिजम) से सम्बंधित विचारधाराओं को बाईं राजनीति में डाला जाता है।

संस्कृत साहित्य

ऋग्वेदकाल से लेकर आज तक संस्कृत भाषा के माध्यम से सभी प्रकार के वाङ्मय का निर्माण होता आ रहा है। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी के छोर तक किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन अध्यापन अब तक होता चल रहा है। भारतीय संस्कृति और विचारधारा का माध्यम होकर भी यह भाषा अनेक दृष्टियों से धर्मनिरपेक्ष (सेक्यूलर) रही है। इस भाषा में धार्मिक, साहित्यिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक, वैरनविकी (ह्यूमैनिटी) आदि प्राय: समस्त प्रकार के वाङ्मय की रचना हुई।

संस्कृत भाषा का साहित्य अनेक अमूल्य ग्रंथरत्नों का सागर है, इतना समृद्ध साहित्य किसी भी दूसरी प्राचीन भाषा का नहीं है और न ही किसी अन्य भाषा की परम्परा अविच्छिन्न प्रवाह के रूप में इतने दीर्घ काल तक रहने पाई है। अति प्राचीन होने पर भी इस भाषा की सृजन-शक्ति कुण्ठित नहीं हुई, इसका धातुपाठ नित्य नये शब्दों को गढ़ने में समर्थ रहा है।

सम्प्रदाय

एक ही धर्म की अलग अलग परम्परा या विचारधारा मानने वालें वर्गों को सम्प्रदाय कहते है। सम्प्रदाय हिंदू, बौद्ध, ईसाई, जैन, इस्लाम आदी धर्मों में मौजूद है। सम्प्रदाय के अन्तर्गत आराध्य परम्परा चलती है जो गुरु द्वारा प्रतिपादित परम्परा को पुष्ट करती है।

सरिता (पत्रिका)

सरिता दिल्ली प्रेस समूह द्वारा प्रकाशित एक पाक्षिक हिन्दी पत्रिका है। सरिता का पहला संस्करण 1945 में प्रकाशित हुआ था। यह पत्रिका सामाजिक और पारिवारिक पुनर्निर्माण की विचारधारा पर आधारित है।

साम्यवाद

साम्यवाद, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा प्रतिपादित तथा साम्यवादी घोषणापत्र में वर्णित समाजवाद की चरम परिणति है। साम्यवाद, सामाजिक-राजनीतिक दर्शन के अंतर्गत एक ऐसी विचारधारा के रूप में वर्णित है, जिसमें संरचनात्मक स्तर पर एक समतामूलक वर्गविहीन समाज की स्थापना की जाएगी। ऐतिहासिक और आर्थिक वर्चस्व के प्रतिमान ध्वस्त कर उत्पादन के साधनों पर समूचे समाज का स्वामित्व होगा। अधिकार और कर्तव्य में आत्मार्पित सामुदायिक सामंजस्य स्थापित होगा। स्वतंत्रता और समानता के सामाजिक राजनीतिक आदर्श एक दूसरे के पूरक सिद्ध होंगे। न्याय से कोई वंचित नहीं होगा और मानवता एक मात्र जाति होगी। श्रम की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ और तकनीक का स्तर सर्वोच्च होगा। साम्यवाद सिद्धांततः अराजकता का पोषक हैं जहाँ राज्य की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। मूलतः यह विचार समाजवाद की उन्नत अवस्था को अभिव्यक्त करता है। जहाँ समाजवाद में कर्तव्य और अधिकार के वितरण को 'हरेक से अपनी क्षमतानुसार, हरेक को कार्यानुसार' (अंग्रेज़ी: From each according to her/his ability, to each according to her/his work) के सूत्र से नियमित किया जाता है, वहीं साम्यवाद में 'हरेक से क्षमतानुसार, हरेक को आवश्यकतानुसार' (अंग्रेज़ी: From each according to her/his ability, to each according to her/his need) सिद्धांत का लागू किया जाता है। साम्यवाद निजी संपत्ति का पूर्ण प्रतिषेध करता है।

सुमित्रानन्दन पन्त

| चित्र आकार = १५०px

सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० - २८ दिसम्बर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे कवियों का युग कहा जाता है। उनका जन्म कौसानी बागेश्वर में हुआ था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भ्रमर-गुंजन, उषा-किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था। गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, सुगठित शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था।

सूफ़ीवाद

'सूफ़ीवाद या तसव्वुफ़

' (अरबी : الْتَّصَوُّف}; صُوفِيّ} सूफ़ी / सुफ़फ़ी, مُتَصَوِّف मुतसवविफ़),, इस्लाम का एक रहस्यवादी पंथ है। इसके पंथियों को सूफ़ी(सूफ़ी संत) कहते हैं। इनका लक्ष्य अपने पंथ की प्रगति एवं सूफीवाद की सेवा रहा है। सूफ़ी राजाओं से दान-उपहार स्वीकार करते थे और रंगीला जीवन बिताना पसन्द करते थे। इनके कई तरीक़े या घराने हैं जिनमें सोहरावर्दी (सुहरवर्दी), नक्शवंदिया, क़ादरिया, चिष्तिया, कलंदरिया और शुत्तारिया के नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में क़रीब एक हज़ार साल पहले जन्मा। राबिया, अल अदहम, मंसूर हल्लाज जैसे शख़्सियतों को इनका प्रणेता कहा जाता है - ये अपने समकालीनों के आदर्श थे लेकिन इनको अपने जीवनकाल में आम जनता की अवहेलना और तिरस्कार झेलनी पड़ी। सूफ़ियों को पहचान अल ग़ज़ाली के समय (सन् ११००) से ही मिली। बाद में अत्तार, रूमी और हाफ़िज़ जैसे कवि इस श्रेणी में गिने जाते हैं, इन सबों ने शायरी को तसव्वुफ़ का माध्यम बनाया। भारत में इसके पहुंचने की सही-सही समयावधि के बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी में ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती बाक़ायदा सूफ़ीवाद के प्रचार-प्रसार में जुट गए थे।

अन्य भाषाओं में

This page is based on a Wikipedia article written by authors (here).
Text is available under the CC BY-SA 3.0 license; additional terms may apply.
Images, videos and audio are available under their respective licenses.