भूगोलीय निर्देशांक प्रणाली

भूगोलीय निर्देशांक प्रणाली (अंग्रेज़ी:जियोग्राफिक कोआर्डिनेट सिस्टम) एक प्रकार की निर्देशांक प्रणाली होती है, जिसके द्वारा पृथ्वी पर किसी भी स्थान की स्थिति तीन (३) निर्देशांकों के माध्यम से निश्चित की जा सकती है। ये गोलाकार निर्देशांक प्रणाली द्वारा दिये जाते हैं।

पृथ्वी पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं है, बल्कि एक अनियमित आकार की है, जो लगभग एक इलिप्सॉएड आकार बनाती है। इसके लिये इस प्रकार की निर्देशांक प्रणाली बनाना, जो पृथ्वी पर उपस्थित प्रत्येक बिन्दु के लिये अंकों के अद्वितीय मेल से बनने वाला स्पष्ट निर्देशांक प्रस्तुत करे, अपने आप में एक प्रकार की चुनौती था।

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पृथ्वी के मानचित्र पर अक्षांश (क्षैतिज) व (देशांतर रेखाएं (लम्बवत), एकर्ट षष्टम प्रोजेक्शन; वृहत संस्करण (पीडीएफ़, ३.१२MB)

अक्षांश और देशांतर

Geographic coordinates sphere
अक्षांश फ़ाई (φ) एवं देशान्तर लैम्ब्डा (λ)

अक्षांश (अंग्रेज़ी:लैटिट्यूड, Lat., φ, या फ़ाई) पृथ्वी की सतह पर एक बिन्दु से भूमध्यीय समतल तक बना कोण होता है, जिसे ग्लोब के केन्द्र पर नापा जाता है। समान अक्षांश बिन्दुओं को जोड़ने वाली रेखाओं को अक्षांश रेखाएं कहते हैं। अक्षांश की रेखाएं इस प्रक्षेप में क्षैतिज एवं सीधी प्रतीत होती हैं, परंतु वे भिन्न अर्धव्यासों वाली और वृत्तीय होती हैं। एक अक्षांश पर स्थित सभी स्थान एकसाथ जुड़कर अक्षांश का वृत्त बनाते हैं। ये सभी वृत्त भूमध्य रेखा के समानांतर होते हैं। इनमें भौगोलिक उत्तरी ध्रुव ९०° उत्तर कोण पर रहता है; व भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव ९०° दक्षिण कोण पर। शून्य अंश (0°) अक्षांश रेखा को भूमध्य रेखा कहते हैं। ये ग्लोब को उत्तरी व दक्षिणी, दो गोलार्धों में बांटती है।

देशांतर (अंग्रेज़ी:लॉन्गीट्यूड, Long., λ, या लैम्ब्डा) दोनों भूगोलीय ध्रुवों के बीच खींची हुई काल्पनिक मध्याह्न रेखाओं का सन्दर्भ देशांतर रेखा से पूर्व या पश्चिम में बना कोण होता है और जो मध्याह्न रेखा जिस बिंदु या स्थान से गुजरती है उसका कोणीय मान उस स्थान का देशांतर होता है। सभी देशांतर रेखाएं अर्ध-वृत्ताकार होती हैं। ये समांनांतर नहीं होती हैं व उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों पर अभिसरित होकर मिल जाती हैं।

अंश : कोण का मापन

कोण को लिखने के कई फ़ॉर्मैट्स होते हैं, सभी समान अक्षांश, देशांतर के क्रम में लिखे जाते हैं।

  • DMS डिगरी:मिनट:सेकंड (४९°३०'००"उ, १२३°३०'००"प.)
  • DM डिगरी:दशमलव मिनट (४९°३०.०', -१२३°३०.०'), (४९d३०.०m,-१२३d३०.०')
  • DD दशमलव डिगरी (४९.५०००,-१२३.५०००), प्रायः ४-६ दशमलव अंकों सहित।

जियोडेसिक ऊंचाई

पृथ्वी के ऊपर, अंदर या ऊंचाई पर स्थित किसी स्थ्लाकृतिक फ़ीचर कॊ पूर्णतया बताने हेतु, इसके केन्द्र य सतह से उस बिन्दु की लम्बवत ऊंचाई भी बतानी होगी। इसकी सतह में अनियमितता व ऊबड़-खाबड़ प्राकृतिक स्वभाव के कारण ये ऊंचाई उस बिन्दु के नीचे बेहतर स्पष्टता से परिभाषित लम्बवत डैटम जैसे समुद्र-सतह के सन्दर्भ में बतायी जाती है। प्रत्येक देश ने अपने स्वयं के डैटम निश्चित किये हुए हैं, उदाहरणतया यूनाइटेड किंगडम का सन्दर्भ बिन्दु न्यूलिन है। पृथ्वी के केन्द्र से दूरी बहुत गहरे बिन्दुओं एवं अंतरिक्ष की स्थितियों को बताने के लिये प्रयोग की जाती है।[1]

कार्टेज़ियन निर्देशांक

गोलीय निर्देशांक द्वारा बताया गया प्रत्येक बिन्दु अब कार्तीय निर्देशांक पद्धति द्वारा x y z भी व्यक्त किया जा सकता है। ये मानचित्रों पर किसी स्थान की स्थिति को अंकित करने हेतु अति-प्रयोगनीय तरीका तो नहीं है, किन्तु ये दूरियां नापने एवं अन्य गणितीय प्रकार्य संपन्न करने हेतु प्रयोग किया जाता है। इसका उद्गम प्रायः गोले का केन्द्र ही होता है, जो लगभग पृथ्वी के केन्द्र के निकट ही होता है।

अक्षांश और रेखांश को रैखिक इकाईयों जैसे व्यक्त करना

सागर सतह पर एक गोलीय सतह पर, एल अक्षांशीय सेकंड बराबर ३०.८२ मीटर और एक रेखांशीय मिनट १८४९ मीटर होता है। एक अक्षांशीय डिगरी ११०.९ किलोमीटर के बराबर होती है। रेखांशों के वृत्त भूगोलीय ध्रुवों पर मिलते हैं। इनकी पूर्व-पश्चिम की चौड़ाई अक्षांश पर निर्भर करती है। भूमध्य रेखा के निकट सागर सतह पर एक रेखांशीय सेकंड बराबर ३०.९२ मीटर, एव रेखांशीय मिनट बराबर १८५५ मीटर, तथा एक रेखांशीय डिगरी १११.३ किलोमीटर के बराबर होती है। ३०° पर एक रेखांशीय सेकंड २६.७६ मीटर, ग्रीनविच में (५१° २८' ३८" उ.) is १९.२२ मीटर, एवं ६०° पर ये १६.४२ मीटर होता है।

अक्षांश पर एक रेखांशीय डिगरी की चौड़ाई इस सूत्र द्वारा मिलती है (चौड़ाई प्रति मिनट एवं सेकंड प्राप्त करने हेतु, इसे ६० एवं ३६०० से क्रमशः भाग दें):

जहां पृथ्वी की औसत मेरिडिओनल त्रिज्या लगभग 6,367,449 m के बराबर होती है। औसत त्रिज्या मान के प्रयोग के कारण, ये सूत्र एकदम सटीक नहीं है। अक्षांश पर रेखांशीय डिगरी का बेहतर सन्निकटन प्राप्त करने हेतु इसे प्रयोग करें:

जहां पृथ्वी की भूमध्यीय एवं ध्रुवीय त्रिज्याएं क्रमशः ६,३७८,१३७ मी., ६,३५६,७५२.३ मी., के बराबर हैं।

कुछ अक्षांशों पर लंबाई का मान (कि॰मी॰ में)
अक्षांश शहर डिगरी मिनट सेकंड ±०.०००१°
६०° सेंट पीटर्सबर्ग ५५.६५ कि॰मी॰ ०.९२७ कि॰मी॰ १५.४२मी. ५.५६मी.
५१° २८' ३८" N ग्रीनविच ६९.२९ कि॰मी॰ १.१५५ कि॰मी॰ १९.२४मी. ६.९३मी.
४५° बोर्डियॉक्स ७८.७ कि॰मी॰ १.३१ कि॰मी॰ २१.८६मी. ७.८७मी.
३०° न्यू ओर्लियंस ९६.३९ कि॰मी॰ १.६१ कि॰मी॰ २६.७७मी. ९.६३मी.
०° क्वीटो १११.३ कि॰मी॰ १.८५५ कि॰मी॰ ३०.९२मी. ११.१३मी.

सन्दर्भ

  1. ए गाइड टू को-ऑर्डिनेट सिस्टम्स इन ग्रेट ब्रिटेन, संस्क.१.७ अक्तू, २००७ डी००६५९, अभिगमन तिथि:१४ मार्च, २००८

बाहरी कड़ियाँ

आर्डिनेंस सर्वेक्षण राष्ट्रीय ग्रिड

आर्डिनेंस सर्वेक्षण नेशनल ग्रिड संदर्भ प्रणाली (अंग्रेज़ी: Ordnance Survey National Grid reference system) भूगोल ग्रिड संदर्भ प्रणाली है जिसका उपयोग ग्रेट ब्रिटेन में किया जाता है। यह अक्षांश और रेखांश के प्रयोग से भिन्न होता है।

गोलीय निर्देशांक पद्धति

गोलीय निर्देशांक पद्धति (अंग्रेजी: spherical coordinate system) तीन आयामों (डायमेंशनों) वाले दिक् (स्पेस) में प्रयोग होने वाली ऐसी निर्देशांक पद्धति होती है जिसमें उस दिक् में मौजूद किसी भी बिंदु का स्थान तीन अंकों से निर्धारित हो जाता है:

मूल केंद्र से उस बिंदु की 'त्रिज्या दूरी' (radial distance) - इसके लिए अक्सर 'r' या 'ρ' का चिह्न प्रयोग होता है

शिरोबिंदु (ज़ेनिथ) की दिशा से उसका 'ध्रुवीय कोण' (polar angle) - इसके लिए अक्सर 'θ' का चिह्न प्रयोग होता है

मूल समतल से उसका 'दिगंश कोण' (azimuth angle) - इसके लिए अक्सर 'φ' का चिह्न प्रयोग होता हैज़ाहिर है कि ऐसी पद्धति में पहले से ही किसी मूल केंद्र, शिरोबिंदु दिशा और मूल समतल का चुनाव कर लेना आवश्यक है। इस चुनाव के बाद हर बिंदु का स्थान इन तीनों अंकों - (r, θ, φ) - के आधार पर बतलाया जा सकता है। कभी-कभी 'ध्रुवीय कोण' के स्थान पर 'उत्कर्ष या ऊँचाई कोण' (elevation angle) का प्रयोग होता है जो मूल समतल से ऊँचाई मापता है।

द्वि-विम समष्टि

द्वि-विम समष्टि भौतिक ब्रह्माण्ड के समतलीय प्रक्षेप का ज्यामीतिय प्रतिमान है जिसमें हम रहते हैं। दो विमाओं को सामान्यतः लम्बाई और चौड़ाई कहते हैं। दोनों दिशाएँ एक ही समतल में स्थित होती हैं।

भौतिक विज्ञान और गणित में n-विमिय समष्टि में किसी बिन्दु की स्थिति को व्यक्त करने के लिए एक n वास्तविक संख्याओं के अनुक्रम प्रयुक्त किया जाता है। जहाँ n = 2, होने पर प्राप्त स्थिति को द्वि-विम समष्टि अथवा २डी कहा जाता है और इसे यूक्लिडिय समष्टि दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है।

भौतिक विज्ञान में द्वि-विम समष्टि अंतरिक्ष के समतलीय निरूपण को कहा जाता है जिसमे हम निवास करते हैं और इसे द्विविम समष्टि कहा जाता है।

निहाली भाषा

निहाली भाषा पश्चिम-मध्य भारत के मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र राज्यों के कुछ छोटे भागों में बोली जाने वाली एक भाषा है। यह एक भाषा वियोजक है, यानि विश्व की किसी भी अन्य भाषा से कोई ज्ञात जातीय सम्बन्ध नहीं रखती और अपने भाषा-परिवार की एकमात्र ज्ञात भाषा है। भारत में इसके अलावा केवल जम्मू और कश्मीर की बुरुशस्की भाषा ही दूसरी ज्ञात भाषा वियोजक है। निहाली समुदाय की संख्या लगभग ५,००० है लेकिन सन् १९९१ की जनगणना में इनमें से केवल २,००० ही इस भाषा को बोलने वाले गिने गए थे।निहाली समुदाय ऐतिहासिक रूप से कोरकू समुदाय से सम्बन्धित रहा है और उन्हीं के गाँवों में बसता है। इस कारण से निहाली बोलने वाले बहुत से लोग कोरकू भाषा में भी द्विभाषीय होते हैं। निहाली बोली में बहुत से शब्द आसापास की भाषाओं से लिए गए हैं और साधारण बोलचाल में लगभग ६०-७०% शब्द कोरकू के होते हैं। भाषावैज्ञानिकों के अनुसार मूल निहाली शब्दावली के केवल २५% शब्द ही आज प्रयोग में हैं।

भौगोलिक सूचना तंत्र

भौगोलिक सूचना तंत्र या भौगोलिक सूचना प्रणाली अथवा संक्षेप में जी॰आई॰एस॰, (अंग्रेज़ी Geographic information system (GIS)) कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को भौगोलिक सूचना के साथ एकीकृत कर इनके लिए आंकड़े एकत्रण, प्रबंधन, विश्लेषण, संरक्षण और निरूपण की व्यवस्था करता है।

भूगोलीय निर्देशांक प्रणाली को मुख्यत: तीन तरीकों से देखा जा सकता है।

डेटाबेस : यह डेटाबेस संसार का अनन्य तरीके का डेटाबेस होता है। एक तरह से यह भूज्ञान की सूचना प्रणाली होती है। बुनियादी तौर पर जी॰आई॰एस॰ प्रणाली मुख्यत: संरचनात्मक डाटाबेस पर आधारित होती है, जो कि विश्व के बारे में भौगोलिक सूचकों के आधार पर बताती है।

मानचित्र : यह ऐसे मानचित्रों का समूह होता है जो पृथ्वी की सतह सबंधी बातें विस्तार से बताते है। यह डेटाबेस के लिये इंटरफेस का कार्य भी करते हैं और इनके जरिये स्थानिक पृच्छा (spatial query) की जा सकती है।

प्रतिरूप : यह सूचना परिवर्तन उपकरणों का समूह होता है जिसके माध्यम से वर्तमान डाटाबेस द्वारा नया डाटाबेस बनाया जाता है।

मौलिक समतल (गोलीय निर्देशांक)

किसी गोलीय निर्देशांक प्रणाली में मौलिक समतल (fundamental plane) ऐसा एक काल्पनिक समतल होता है जो उस गोले को दो बराबर के गोलार्धों (हेमिस्फ़ीयरों) में विभाजित कर दे। फिर उस गोले पर स्थित किसी भी बिन्दु का अक्षांश (लैटिट्यूड) उस समतल और गोले के केन्द्र से बिन्दु को जोड़ने वाली रेखा के बीच का कोण होता है।पृथ्वी पर यह समतल भूमध्य रेखा द्वारा निर्धारित करा गया है। यदि पृथ्वी के ज्यामितीय केन्द्र से नई दिल्ली शहर के बीच के क्षेत्र तक एक काल्पनिक रेखा खींची जाये तो उसका इस समतल से बना कोण (ऐंगल) लगभग २८.६१३९° बनेगा और यह समतल से उत्तर में है। इसलिये भूगोलीय निर्देशांक प्रणाली के तहत नई दिल्ली का अक्षांश भी २८.६१३९° उत्तर (28.6139° N) माना जाता है।

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