डेविड रिकार्डो

डेविड रिकार्डो ( 18 अप्रैल 1772 - 11 सितंबर 1823 ) एक ब्रिटिश राजनीतिक अर्थशास्त्री थे। डेविड रिकार्डो एक प्रभावशाली शास्त्रीय अर्थशास्त्री थे। उन्होंने एक दलाल और वित्तीय बाजार सट्टेबाज के रूप में अपने पेशेवर जीवन शुरू किया। उन्होंने काफी निजी भाग्य प्राप्त की, बड़े पैमाने पर वित्तीय बाजार की अटकलों से और, सेवानिवृत्त होने पर ब्रिटेन की संसद में उन्होने एक सीट खरीदा। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम चार सालो मे अपना संसदीय सीट रखा। शायद उनकी सबसे महत्वपूर्ण विरासत है उन्की तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत जो यह बताता है कि एक राष्ट्र को केवल उन्ही उद्योगों में ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहां वह सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी है और अन्य देशों के साथ व्यापार करे वे उत्पादों को प्राप्त करने के लिए जो उन्के राष्ट्र मे उत्पादन नहीं कर रहे। संक्षेप में, रिकार्डो ने देशों द्वारा चरम उद्योग विशेषज्ञता के विचार को बढ़ावा दिया। इस सोच में रिकार्डो ने एक राष्ट्रीय उद्योग नीति के अस्तित्व को मान लिया था जिसका उद्देश्य था दूसरो की हानि के लिए कुछ उद्योगों को बढ़ावा देने का। कई विद्वानों, जेसे Joan Robinson और Piero Sraffa, ने रिकार्डो के तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत को चुनौती दी है लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुक्त व्यापार के पक्ष के तर्क मे आधारशिला बनी हुई है।

डेविड रिकार्डो
चिरसम्मत अर्थशास्त्र
David Ricardo(1)
जन्म 19 अप्रैल 1772
मृत्यु 11 सितम्बर 1823 (उम्र 51)
राष्ट्रीयता ब्रिटिश
प्रभाव एडम स्मिथ · जेरेमी बेन्थम
प्रभावित किया रिकार्डीय समाजवादी · जॉन स्टुअर्ट मिल · कार्ल मार्क्स · पिएरो स्ट्राफा · रॉबर्ट जे. बैरो
योगदान रिकार्डीय समतुल्यता, मान का श्रम सिद्धान्त, तुलनात्मक लाभप्रदता, ह्रासमान प्रतिफल का नियम, आर्थिक भाटक[1]
Portrait of David Ricardo by Thomas Phillips
डेविड रिकार्डो

व्यक्तिगत जीवन

रिकार्डो लंदन, इंग्लैंड में पैदा हुआ था। वेह पुर्तगाली मूल के एक यहूदी परिवार के 17 बच्चों में से तीसरे बच्चे थे। उनके पिता, इब्राहीम रिकार्डो, एक सफल शेयर दलाल थे। उन्होंने 14 साल की उम्र में अपने पिता के साथ काम करना शुरू किया। 21 साल की उम्र में रिकार्डो, एक क्वेकर, प्रिसिला ऐनी विल्किनसन के साथ भाग गई, और अपने पिता की इच्छा के विरुद्ध है, वह एक ईसाई एकजुट बन गइ। इस धार्मिक फर्क के कारण उनकी अपने परिवार से मनमुटाव हुई और वह स्वतंत्रता की स्थिति को अपनाने के लिए मजबूर हो गइ।

अपने पिता से उसका मनमुटाव के बाद वह Lubbocks और Forster, एक प्रख्यात बैंकिंग घर के समर्थन के साथ एक दलाल के रूप में एक सफल व्यवसाय शुरू कर दिया।

मौत और विरासत

अवकाश ग्रहण करने के दस साल बाद और संसद में प्रवेश करने के चार साल बाद, रिकार्डो का कान के संक्रमण से मृत्यु हो गई। यह कान का संक्रमण, मस्तिष्क में फैल गया और सेप्टिसीमिया प्रेरित किया। वह 51 वर्ष के थे।

उनके आठ बच्चे थे, जिन्मे से तीन बेटे थे।

रिकार्डो हारदेनहुइश में सेंट निकोलस के क़ब्रिस्तान में एक अलंकृत कब्र में दफन है। उसकी कब्र पर शिलालेख पढ़ता है: "हॉलैंड में पैदा हुए एक यहूदी, वह पेहले मुक्त व्यापारियों में से एक थे और अपने दिन में एक प्रसिद्ध कट्टरपंथी थे।" उनकी मृत्यु के समय उनका धन £600,000 होने का अनुमान था।

विचार

रिकार्डो को 1799 में एडम स्मिथ की 'राष्ट्रों का धन' पढ़ने के बाद अर्थशास्त्र में दिलचस्पी बन गए। उन्होंने 37 के उम्र में अपनी पहली अर्थशास्त्र लेख लिखा था। रिकार्डो के विचार इंग्लैंड में स्वीकार हो गए और आधुनिक पश्चिमी दुनिया में रूढ़िवादी आर्थिक विचारे बन गए हैं जहां सरकार आर्थिक विकास में एक निर्धारण भूमिका निभाती है।

तुलनात्मक लाभ

1500 और 1750 के बीच अधिक अर्थशास्त्रिया वणिकवाद की वकालत करते थे जो अन्य देशों के साथ एक व्यापार अधिशेष चलाकर बुलियन पाने के उद्देश्य के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के विचार को बढ़ावा देती थी। रिकार्डो ने इस विचार को चुनौती दी कि व्यापार का उद्देश्य सोना या चांदी जमा करने के लिए मात्र था। रिकार्डो उद्योग विशेषज्ञता और मुक्त व्यापार के पक्ष में थे। उन्होंने सरल गणित का उपयोग करते हुए साबित करने का प्रयास किया कि नि: शुल्क अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के साथ संयुक्त उद्योग विशेषज्ञता हमेशा सकारात्मक परिणाम का उत्पादन करता है। इस सिद्धांत को पूर्ण लाभ की अवधारणा पर विस्तार किया।

रिकार्डो ने यह तर्क दिया कि व्यापार से आपसी राष्ट्रीय लाभ है भले ही एक देश अपनी व्यापारिक समकक्ष से हर क्षेत्र में ज्यादा अधिक प्रतिस्पर्धी है और एक राष्ट्र को केवल उन उद्योगों पर ध्यान देना चाहिए जहां उनका एक तुलनात्मक लाभ था।रिकार्डो के तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत एक राष्ट्रीय स्तर पर उद्योग और व्यापार नीति के अस्तित्व को मानता है। यह अनुमान नहीं करता कि व्यापार निर्णय व्यवहार्यता या लाभ के आधार पर उद्यमियों द्वारा स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए।

रिकार्डो ने एक साधारण संख्यात्मक उदाहरण का उपयोग करते हुए साबित करने का प्रयास किया कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार हमेशा फायदेमंद है। पॉल सैमुएलसन ने रिकार्डो के इंग्लैंड और पुर्तगाल के बीच व्यापार की संख्यात्मक उदाहरण में प्रयुक्त संख्या को "चार जादुई संख्या" का नाम दिया।

चित्र:Comparative-advantage.jpg
तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत

संरक्षणवाद

एडम स्मिथ की तरह, रिकार्डो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं, विशेष रूप से कृषि के लिए, के संरक्षणवाद के एक प्रतिद्वंद्वी थे।

मूल्य सिद्धांत

रिकार्डो का सबसे प्रसिद्ध काम 'राजनीतिक अर्थव्यवस्था और कराधान के सिद्धांत' (1817) है। इस का पहला अध्याय खुलता है मूल्य का श्रम सिद्धांत के एक बयान के साथ।उनके मूल्य का श्रम सिद्धांत के लिए कई मान्यताओं की आवश्यकता है:

1. दोनों क्षेत्रों में एक ही मजदूरी दर और एक ही लाभ की दर है; 2. उत्पादन में नियोजित पूंजी केवल मजदूरी से बना है; 3. उत्पादन की अवधि दोनों वस्तुओं के लिए एक ही है।

रिकार्डो खुद को यह एहसास हुआ कि दूसरा और तीसरा मान्यताये काफी अवास्तविक थे और इसलिए अपने मूल्य के श्रम सिद्धांत मे दो अपवाद भर्ती कराया:

1. उत्पादन अवधि भिन्न हो सकती है; 2. दो उत्पादन प्रक्रियाओं मे यंत्र और उपकरण राजधानी के रूप में और न सिर्फ मजदूरी के रूप मे काम कर सकते हैं, और बहुत अलग अनुपात में।

रिकार्डो ने अपने जीवन के अंत तक अपने मूल्य के सिद्धांत पर काम करना जारी रखा।

उनका प्रभाव और बौद्धिक विरासत

डेविड रिकार्डो के विचारों का अर्थशास्त्र के नए घटनाक्रम पर एक जबरदस्त प्रभाव था। अमेरिकन अर्थशास्त्रियों ने रिकार्डो को एडम स्मिथ के पीछे, पूर्व बीसवीं सदी का दूसरा सबसे प्रभावशाली आर्थिक विचारक का रैंक दिया है। रिकार्डो शास्त्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था के सैद्धांतिक पिता बन गए।

सन्दर्भ

  1. मिलर, रोजर लेरॉय। इकोनॉमिक्स टुडे. पन्द्रहवाँ संस्करण. बोस्टन, एम ए: पियर्सन एजुकेशन. पृष्ठ 559
Ricardo - Opere, 1852 - 5181784
Works, 1852

1. Miller, Roger LeRoy. Economics Today. Fifteenth Edition. Boston, MA: Pearson Education. page 559

2. Sowell, Thomas (2006). On classical economics. New Haven, CT: Yale University Press.

3. http://www.policonomics.com/david-ricardo/

4. Ricardo, David. 1919. Principles of Political Economy and Taxation. G. Bell, p. LIX: "by reason of a religious difference with his father, to adopt a position of independence at a time when he should have been undergoing that academic training"

5. King, John (2013). David Ricardo. Palgrave Macmillan. p. 48.

अर्थशास्त्र

यह पृष्ठ अर्थशास्त्र (इकनॉमिक्स) विषय से सम्बन्धित है। कौटिल्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र ग्रन्थ के लिये यहाँ देखें।

अर्थशास्त्र सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग का अध्ययन किया जाता है। 'अर्थशास्त्र' शब्द संस्कृत शब्दों अर्थ (धन) और शास्त्र की संधि से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - 'धन का अध्ययन'। किसी विषय के संबंध में मनुष्यों के कार्यो के क्रमबद्ध ज्ञान को उस विषय का शास्त्र कहते हैं, इसलिए अर्थशास्त्र में मनुष्यों के अर्थसंबंधी कायों का क्रमबद्ध ज्ञान होना आवश्यक है।

अर्थशास्त्र का प्रयोग यह समझने के लिये भी किया जाता है कि अर्थव्यवस्था किस तरह से कार्य करती है और समाज में विभिन्न वर्गों का आर्थिक सम्बन्ध कैसा है। अर्थशास्त्रीय विवेचना का प्रयोग समाज से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है, जैसे:- अपराध, शिक्षा, परिवार, स्वास्थ्य, कानून, राजनीति, धर्म, सामाजिक संस्थान और युद्ध इत्यदि।प्रो. सैम्यूलसन के अनुसार,

अर्थशास्त्र कला समूह में प्राचीनतम तथा विज्ञान समूह में नवीनतम वस्तुतः सभी सामाजिक विज्ञानों की रानी है।

अर्थशास्त्री

अर्थशास्त्री अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ व्यक्ति को कहते हैं। वे आमतौर पर अर्थशास्त्र में पीएचडी रखते हैं । अर्थशास्त्रियों को कर और अर्थ कानूनों का भी ज्ञान होता है। अक्सर वे एक विश्वविद्यालय या थिंक-टैंक में एक शिक्षक या शोधकर्ता के रूप में काम करते हैं, लेकिन उन्हें किसी वित्तीय संस्थान ( बैंक, बीमा, आदि) या एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ( आईएमएफ, विश्व बैंक, ओईसीडी, बीआईएस, आदि) में भी नियुक्त किया जा सकता है।

आर्थिक अधिशेष

‘आर्थिक अधिशेष’ अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एक बहुत ही सुविधाजनक और व्यावहारिक विषय है। विशेष रूप से, यह कल्याणकारी अर्थशास्त्र की शाखा के अंतर्गत आता है। संसाधनों के एक कुशल आवंटन प्राप्त करने में उसके आवेदन के अलावा, यह डेविड रिकार्डो का 'आर्थिक किराया सिद्धांत' और कार्ल मार्क्स का 'अधिशेष मूल्य सिद्धांत' का अभिन्न अंग है।

आर्थिक शब्दावली

डिबेंचरयह एक ऋण का एक साधन है जिसके माध्यम से सरकार या कंपनियां धन जुटाती हैं।

यह इक्विटी शेयरों से भिन्न होता है। डिबेंचर खरीदने वाला वास्तव में कर्जदाता होता है। डिबेंचर जारी करने वाली कंपनी या संस्थान गिरवी के तौर पर कुछ नहीं रखती, खरीदार उनकी साख और प्रतिष्ठा को देखते हुए डिबेंचर खरीदते हैं। डीबेंचर जारी करने वाली कंपनी या संस्थान कर्जदाताओं (डिबेंचर खरीदने वालों को) निश्चित ब्याज देते हैं।

कंपनियां शेयरधारकों को भले ही लाभांश नहीं दे लेकिन उसे कर्जदाताओं (डिबेंचरधारकों) को ब्याज देना ही होता है। सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला ट्रेजरी बॉन्ड या ट्रेजरी बिल आदि भी जोखिम रहित डिबेंचर ही होते हैं क्योंकि सरकार इस प्रकार के कर्ज चुकाने के लिए कर बढ़ा सकती है या अधिक नोटों का मुद्रण कर सकती है।

ऑफशोर फंड (Offshore Fund)जिस फंड के अंतर्गत म्युचुअल फंड कंपनियां विदेश से धन जुटा कर देश के भीतर विनियोजित करती हैं उसे ऑफशोर फंड कहते हैं।

वेंचर कैपिटल (Venture Capital)नये व्यवसाय की शुरुआत के लिए जुटाई जाने वाली पूंजी को वेंचर कैपिटल या साहस पूंजी या दायित्व पूंजी कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो निवेशकों द्वारा शुरु हो रही छोटी कंपनियों, भविष्य में जिनके विकास की प्रबल संभावना होती है, को उपलब्ध कराई जाने वाली पूंजी को वेंचर कैपिटल कहते हैं। कंपनियां ऐसी पूंजी जुटाने के लिए इक्विटी शेयर जारी करती हैं।

फॉरवर्ड सौदा (Forward Contract)नकदी बाजार (शेयरों के मामले में) या हाजिर बाजार (कमोडिटी के मामले में) में किया जाने वाला सौदा जिसका निपटारा भविष्य की एक निश्चित तारीख को सुपुर्दगी के साथ निपटाया जाता है।

डेरिवेटिव (Derivative)वैसी प्रतिभूति जिसका मूल्य उसके अंतर्गत एक या एक से अधिक परिसंपत्तियों के ऊपर निर्भर करता है या उनसे प्राप्त किया जाता है।

डेरिवेटिव दो या दो से अधिक पक्षों के बीच किया जाने वाला करार है। इसका मूल्य निर्धारण उन परिसंपत्तियों के मूल्यों में होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर किया जाता है। आमतौर पर ऐसी परिसंपत्तियों में स्टॉक, बॉन्ड, जिन्स, मुद्राएं, ब्याज-दर और बाजार सूचकांक शामिल होते हैं।

डेरिवेटिव का इस्तेमाल साधारणत: जोखिमों की हेजिंग के लिए किया जाता है लेकिन इसका प्रयोग सट्टेबाजी के उद्देश्य से भी किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर एक यूरोपियन निवेशक अमेरिकन कंपनी के शेयरों की खरीदारी अमेरिकन एक्सचेंज से (डॉलर का इस्तेमाल करते हुए) करता है।

शेयर अपने पास रखते हुए उसे विनिमय दर का जोखिम बना रहता है। इस जोखिम की हेजिंग के लिए वह निवेशक विशेष विनिमय दर के मुताबिक डॉलर को यूरो में परिवर्तित करना चाहेगा। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मुद्रा की वायदा खरीद सकता है ताकि जब कभी वह अपना शेयर बेचे और मुद्रा को यूरो में परिवर्तित करे तो उसे विनिमय दर संबंधी हानि नहीं हो।

ओपेन एन्डेड फण्ड (Open Ended Fund)सतत खुली योजनाएंम्युचुअल फंडों की वैसी योजनाएं जिनकी कोई लॉक इन अवधि (वह पूर्व-निर्धारित अवधि जिससे पहले निवेश किए गए पैसों की निकासी की अनुमति नहीं होती है) नहीं होती है। इनके यूनिटों की खरीद-बिक्री तत्कालीन शुध्द परिसंपत्ति मूल्य (एनएवी) पर कभी भी की जा सकती है।

प्रतिभूतियां (Securities)प्रतिभूतियां लिखित प्रमाणपत्र होती हैं जो ऋण लेने के बदले दी जाती है। इनमें जारी करने के शर्र्तों एवं मूल्यों का उल्लेख होता है तथा इनका क्रय-विक्रय भी किया जाता है। सरकार द्वारा जारी किया जाने वाला बॉन्ड, तरजीही शेयर, ऋण पत्र आदि प्रतिभूतियों की श्रेणी में आते हैं। प्रतिभूति शब्द का इस्तेमाल व्यापक तौर पर किया जाता है।

शेयर विभाजन (Stock Split)कोई कंपनी अपने महंगे शेयर को छोटे निवेशकों के लिए वहनीय बनाने और उसे आकर्षक बनाने के लिए शेयरों का विभाजन करती है। अगर कोई कंपनी अपने शेयरों का विभाजन 2:1 में करती है तो उसका मतलब होता है कि शेयरों की संख्या दोगुनी कर दी गई है और उसका मूल्य आधा कर दिया गया है।

मुद्रा का विनिमय मूल्य (Exchange Value of Money)

जब देश की प्रचलित मुद्रा का मूल्य किसी विदेशी मुद्रा के साथ निर्धारित किया जाता है ताकि मुद्रा की अदला-बदली की जा सके तो इस मूल्य को मुद्रा का विनिमय मूल्य कहा जाता है। वह मूल्य दोनों देशों की मुद्राओं की आंतरिक क्रय शक्ति पर निर्भर करता है।

मुद्रास्फीति (Inflation)

मुद्रास्फीति वह स्थिति है जिसमें मुद्रा का आंतरिक मूल्य गिरता है और वस्तुओं के मूल्य बढ़ते हैं। यानी मुद्रा तथा साख की पूर्ति और उसका प्रसार अधिक हो जाता है। इसे मुद्रा प्रसार या मुद्रा का फैलाव भी कहा जाता है।

मुदा अवमूल्यन (Money Devaluation)

यह कार्य सरकार द्वारा किया जाता है। इस क्रिया से मुद्रा का केवल बाह्य मूल्य कम होता है। जब देशी मुद्रा की विनिमय दर विदेशी मुद्रा के अनुपात में अपेक्षाकृत कम कर दी जाती है, तो इस स्थिति को मुद्रा का अवमूल्यन कहा जाता है।

रेंगती हुई मुद्रास्फीति (Creeping Inflation)

मुद्रास्फीति का यह नर्म रूप है। यदि अर्थव्यवस्था में मूल्यों में अत्यंत धीमी गति से वृद्धि होती है तो इसे रेंगती हुई स्फीति कहते हैं। अर्थशास्त्री इस श्रेणी में एक फीसदी से तीन फीसदी तक सालाना की वृद्धि को रखते हैं। यह स्फीति अर्थव्यवस्था को जड़ता से बचाती है।

रिकॉर्ड तारीख (Record List)

बोनस शेयर, राइट शेयर या लाभांश आदि घोषित करने के लिए कंपनी एक ऐसी तारीख की घोषणा करती है जिस तारीख से रजिस्टर बंद हो जाएंगे। इस घोषित तारीख तक कंपनी के रजिस्टर में अंकित प्रतिभूति धारक ही वास्तव में धारक माने जाते हैं। इस तारीख को ही रेकॉर्ड तारीख माना जाता है।

रिफंड ऑर्डर (Refun Order)

यदि किसी शेयर आवेदन पत्र पर शेयर आवंटन की कार्यवाही नहीं होती तो कंपनी को आवेदन पत्र के साथ संपूर्ण रकम वापस करनी होती है। रकम वापसी के लिए कंपनी जो प्रपत्र भेजती है उसे रिफंड ऑर्डर कहा जाता है। रिफंड ऑर्डर चेक, ड्राफ्ट या बैंकर चेक के रूप में होता है तथा जारीकर्ता बैंक की स्थानीय शाखा में सामान्यत: सममूल्य पर भुनाए जाते हैं।

लाभांश (Dividend)

विभाजन योग्य लाभों का वह हिस्सा जो शेयरधारकों के बीच वितरित किया जाता है, लाभांश कहा जाता है। यह करयुक्त और करमुक्त दोनों हो सकता है। यह शेयरधारकों की आय है।

लाभांश दर (Dividend Rate)

कंपनी के एक शेयर पर दी जाने वाली लाभांश की राशि को यदि शेयर के अंकित मूल्य के साथ व्यक्त किया जाए तो इसे लाभांश दर कहा जाता है। इसे अमूमन फीसदी में व्यक्त किया जाता है।

लाभांश प्रतिभूतियां (Dividend Securities)

जिन प्रतिभूतियों पर प्रतिफल के रूप में निवेशक को लाभांश मिलता है, उन्हें लाभांश वाली प्रतिभूतियां कहा जाता है। जैसे समता शेयर, पूर्वाधिकारी शेयर।

शून्य ब्याज ऋणपत्र (Zero Rated Deventure)इस श्रेणी के डिबेंचरों या बॉन्डों पर सीधे ब्याज नहीं दिया जाता, बल्कि इन्हें जारी करते वक्त कटौती मूल्य पर बेचा जाता है और परिपक्व होने पर पूर्ण मूल्य पर शोधित किया जाता है। जारी करने के लिए निर्धारित कटौती मूल्य के अंतर को ही ब्याज मान लिया जाता है।

असंगठित क्षेत्र के उद्यम (informal sector enterprises) : 10 से कम श्रमिकों की संख्या वाले निजी क्षेत्र के उद्योग।अदृश्य मदें (Invisible items) : पर्यटन, जहाजरानी, वायु परिवहन, बीमा बैंकिंग, वित्तीय सेवाएं, सरकारी अनुदान, ब्याज, लाभ एवं लाभांश आदि चालू खाते की मदें जो सामान्यत: वस्तु के रूप में दिखाई नहीं देती है।अनारक्षण (Dereservation) : किसी व्यक्ति या उद्योग समूह को उन वस्तुओं के उत्पादन की छूट देना जो पहले किसी व्यक्ति या उद्योग समूह के लिए आरक्षित हो।अवमूल्यन (Devaluation) : मुद्रा की विनिमय दर में गिरावट आना जिसके कारण विदेशी मुद्राओं की इकाइयों के रूप में आंतरिक मुद्रा की कीमत कम हो जाती है जिससे निर्यात सस्ते व आयात महंगे हो जाते हैं।अवसर लागत (Opportunity cost) : यह किसी कार्य मूल्य मान के संदर्भ में परिभाषित की जाती है और अस्वीकार किए गए विकल्प के मूल्य के समान होती है।आस्कमिक दिहाड़ी मजदूरी (Casual wages Labourer) : वैसे दैनिक मजदूर जो किसी उपक्रमों या खेतों में दैनिक मजदूरी के लिए काम करते हैं।अपेक्षित मुद्रास्फीति (Anticipated inflation) : व्यवसायिक इकाइयों, श्रमिक संघ के पदाधिकारियों तथा उपभोक्ता द्वारा भविष्य में घटित होने वाली मुद्रास्फीति की दर अपेक्षित मुद्रा स्थिति कहलाती है।अनुषंगी हितलाभ (fringe benefit) : किसी नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारियों को दी जानेवाली वे सुविधा जो निर्धारित वेतन के अलावा प्रदान की जाती है।अवस्फीति (Deflation) : किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादित वस्तुओं की पूर्ति मुद्रा की पूर्ति से अधिक होती है, तो वस्तु की कीमत में गिरावट आती है, इससे मुद्रा का वास्तविक मूल बढ़ जाता है, परंतु इस दशा में कीमतों में गिरावट होने से वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट होती है और कम उत्पादन होने से रोजगार में भी गिरावट आने लगती है।अल्पाधिकार (Oligopoly) : बाजार में फर्मों की संख्या इतनी कम होती है कि उनके बीच निर्णय संबंधी पारस्परिक निर्भरता बनी रहती है और यह निकट स्थानापन्न वस्तुओं का उत्पादन करती हैं, जिससे बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है।अनिवासी रुपया खाता (Non resident rupee account) : इसमें अनिवासी भारतीय द्वारा वाणिज्य बैंकों में भारतीय रुपए में खाता खोला जाता है तथा इन खातों के मूलधन एवं व्याज को बिना किसी करके जमाकर्ता को उसके देश में उसकी मुद्रा में वापस कर दिया जाता है।अग्रामी दर (Forward rate) : मुद्रा विनिमय की इस प्रक्रिया में कोई मुद्रा अग्रवर्ती बाजार में भविष्य में हस्तांतरण के लिए जिस दर पर खरीदी या बेची जाती है।अनुदान (Subsidy) : सरकार द्वारा किसी उद्योग या व्यापार को किया गया वह भुगतान जिससे निर्यातक उद्योग को प्रोत्साहन प्राप्त हो या उत्पादित वस्तु की घरेलू बाजार में कीमत ना बढ़े इससे उद्योग व उपभोक्ता दोनों को लाभ पहुंचता है।अति इष्ट राष्ट्र (Most Favored Nation) : किसी देश द्वारा किसी अन्य देश को आयात निर्यात के संबंध में शुल्क में रियायत तथा अन्य सुविधा प्रदान करना।अनौपचारिक क्षेत्र (Informal sector) : छोटे-मोटे श्रम प्रधान स्वरोजगार में लगे हुए लोगों द्वारा अर्थव्यवस्था में अप्रत्यक्ष योगदान देने वाला क्षेत्र।अनुपार्जित आय (Unearned income) : चालू वर्ष में प्राप्त व्यक्ति आय जिसका चालू वर्ष से कोई संबंध नहीं होता है।अमूर्त संपत्तियां (Intangible assets) : वैसे संपत्तियां जिनका मूल्य स्वामित्व के अधिकार से जुड़ा होता है जैसे पेंटेड, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क आदि।अधिकृत पूंजी (Authorized capital) : किसी कंपनी द्वारा शेयर जारी करने के संबंध में पूंजी की अधिकतम सीमा यह अधिकृत पूंजी के बराबर या उससे कम हो सकती है लेकिन उससे अधिक नहीं।अनुसूचित व्यापारिक बैंक (Scheduled commercial bank) : कुछ विशेष शर्तों के अधीन रिजर्व बैंक की दूसरी अनुसूची में शामिल वाणिज्य बैंक।अग्रणी बैंक (lead bank) : इस व्यवस्था की शुरुआत 1969 में की गई थी ,इसके तहत प्रत्येक जिले में किसी एक वाणिज्य बैंक को विशिष्ट कार्यक्रमों के संचालन विकास कार्य के लिए ऋण प्रदान करने वित्तीय संस्थाओं के बीच समन्वय का कार्य सौंपा जाता है।आंतरिक अर्थव्यवस्था का एकीकरण (Integration of Domestic economy) : वैसी सरकारी नीति का निर्माण करना, जिसने अन्य देशों के साथ स्वतंत्र व्यापार और निवेश में वृद्धि हो सके तथा देश की व्यवस्था विश्व के संबंध में निर्भरता एवं एकता के साथ जुड़ सके।आयात प्रतिस्थापन (Import substitution) : सरकार द्वारा आयात को नियंत्रित करने के लिए आयात शुल्क में वृद्धि तथा अन्य उपाय किए जाते हैं, जिस पर विदेशों से प्राप्त वस्तुओं का स्थान स्वदेश निर्मित वस्तुएं ले सकें।आयात शुल्क बाधाएं (Import duty barriers) : सरकार द्वारा आयात पर लगाए गए कर।आर्बिट्रेज़ (Arbitrage) : मुद्रा बाजार में किसी मुद्रा को कम मूल्य पर खरीदा जाए और उसे तुरंत दूसरे बाजार में अधिक कीमत पर बेच दिया जाए।अतिरेक बजट (Surplus budget) : ऐसा बजट जिसमें सरकार द्वारा प्राप्त आय उसकी व्यय से अधिक होती है।आनुपातिक कर (Proportionate tax) : एक निश्चित दर से लिया जाने वाला कर जिसकी दर में कराधान घटने व बढ़ने पर कोई परिवर्तन नहीं होता है।आर्थिक समृद्धि (Economic prosperity) : किसी देश की अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता एवं राष्ट्रीय आय में वृद्धि।आकस्मिक निधि (Contingency fund) : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 257 के अनुसार संसद द्वारा गठित एक निधि राष्ट्रपति की अनुमति से इसका उपयोग आकस्मिक घटनाओं के लिए होता है।ऑपरेशन ट्विस्ट (Operation Twist) : अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा शुरू की गई ऐसी योजना जिसके तहत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए दीर्घकालिक ब्याज दरों में कमी करना।ऑफर डॉक्यूमेंट (Offer document) : किसी कंपनी के पंजीकरण अधिकारी तथा स्टॉक एक्सचेंज के पास जमा वैसी विवरण पुस्तिका जिसमें पब्लिक इश्यू के लिए जारी करने वाली सभी सूचना उपलब्ध होती हैं।ऑडिट अकाउंट (Audit account) : स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध प्रत्येक कंपनी द्वारा अपना वार्षिक ऑडिट अकाउंट जारी किया जाता है इससे निवेशक निवेश से जुड़ी सभी सूचनाएं प्राप्त कर सकता है।आर्थिक नियोजन (Economic planning) : आर्थिक संसाधनों का मूल्यांकन करना तथा योजनाबद्ध ढंग से आर्थिक विकास का लक्ष्य निर्धारित करना आर्थिक नियोजन कहलाता है।इलेक्ट्रॉनिक क्लीयरिंग सिस्टम (Electronic clearing system) : इसके तहत बैंकों द्वारा बिना पेपर चेक करते किसी व्यक्ति अथवा संस्था को धन आंतरिक किया जाता है।ई गवर्नेंस (E-governance) : सभी सरकारी मंत्रालय एवं विभाग उनको कंप्यूटर आधारित नेटवर्क से जोड़ना, जिससे इन विभागों में गतिशीलता आपसी समन्वय तथा पारदर्शिता लाई जा सके।ई-कॉमर्स (E-commerce) : व्यापार और वाणिज्य क्षेत्र में लेनदेन की प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग ई-कॉमर्स कहलाता है।ई-चौपाल (E-chaupal) : गांव में इंटरनेट के माध्यम से किसानों को कृषि की जानकारी बाजार की मांग विपणन एवं कृषि संबंधी नई जानकारी उपलब्ध कराता है, ई -चौपाल केंद्र की स्थापना सरकार निजी कंपनियों औद्योगिक प्रतिष्ठानों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा की जा रही है।इकाई बैंकिंग (Unit banking) : अमेरिका में लोकप्रिय वैसी बैंकिंग प्रणाली जो सीमित क्षेत्र अपनी कुछ शाखा अथवा एक ही शाखा के माध्यम से अपने कार्यों का संचालन करती है।उत्पादकता (Productivity) : श्रम या पूंजी की दक्षता में वृद्धि से उनकी उत्पादकता में भी वृद्धि होती है, यह शब्द परिश्रम के आगात की उत्पादकता के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।उपभोग समुच्चय (Consumption Basket) : किसी परिवार द्वारा उपयुक्त वस्तुओं सेवाओं का समूह जिसका प्रयोग जनता के उपभोग के स्वरूप का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है, भारत में राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन उपभोग समुच्चय में 19 वस्तुएं सम्मिलित है; जैसे अनाज, दाल और दूध से बनी चीजें, खाद्य तेल, सब्जियां वस्त्रादि।उद्यम (Enterprise) : वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन एवं वितरण करने वाला व्यक्ति या समूह के स्वामित्व वाला उपक्रम।ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (Bureau of energy efficiency) : यह अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने तथा विद्युत अपव्यय को रोकने के लिए उपाय करने वाली एक सरकारी संस्था है।उपहार कर (Gift tax) : वह प्रत्यक्ष कर जो किसी व्यक्ति संस्था द्वारा किसी व्यक्ति या संस्था को भाग देने पर उपहार प्राप्त करता को अदा करना होता है।उत्पादन फलन (Production function) : किसी वस्तु का उत्पादन उत्पादन के साधनों पूंजी श्रम तकनीक भूमि उद्यमी के प्रयोग का परिणाम होता है और इन साधनों की मात्रा के बीच जो तकनीकी फलनात्मक संबंध होता है उसे उत्पादन फलन कहते हैं।एकाधिकारी तथा प्रतिबंध कार्य व्यापार अधिनियम (Monopolies and Restrictive Trade Practices Act) (1969) : इस अधिनियम को व्यापारियों के एकाधिकार तथा अन्य जनहित बाधक व्यवहारिक प्रविष्टियों का नियमन करने के लिए लागू किया गया था।एंजिल वक्र (Angel curve) : जर्मनी के सांख्यिकी विद्वान एंजेल द्वारा आय तथा उपभोग के बीच संबंध को दर्शाने के लिए एक वक्र का निर्माण किया गया था, इस वक्र के अनुसार जैसे-जैसे आय में वृद्धि होती है वैसे व्यक्ति भोजन पर होने वाले व्यय प्रतिशत में कमी आती है।एमोर्टाइजेशन (Amortization) : इसके तहत किसी ऋण के निर्धारित ब्याज का पूर्ण भुगतान किया जाता है।एम्बार्गो (Embargo) : कोई देश है या कुछ देश मिलकर किसी विशेष देश के साथ कुछ किसी वस्तु अथवा संपूर्ण व्यापार बंद कर देने की स्थिति तथा उपदेश के जहाजों को अपनी सीमा में प्रवेश करने पर रोक लगाना।एंबर बॉक्स (Amber box) : किसी देश द्वारा अपने किसानों को कृषि के क्षेत्र में प्रति बिजली उर्वरक कीटनाशक आदि प्रदान करना जिससे व्यापार में विसंगति उत्पन्न होती है।एकाधिकार (Monopoly) : वैसी स्थिति जब किसी वस्तु का बाजार में कोई विकल्प ना हो।एडवांस डिक्लाइन (Advance decline) : किसी का खास अवधि के दौरान मूल्यवृद्धि वाले शेयर एवं मूल्य हास प्रदर्शन प्रदर्शित करने वाले शेयर की संख्या का अनुपात।अंश (Equities) : किसी कंपनी की चुकता पूंजी के समान मूल्यधारी अंश।कर प्रतिकर (Cascading Effect) : एक प्रकार का दोहरा कर है जो किसी वस्तु के किसी कर के कारण बढ़े हुए कुल मूल्य पर लगाया जाता है।व्यावसायिक कृषि (Occupational agriculture) : बाजार के लिए कृषि उत्पादन करना न कि व्यक्तिगत उपयोग के लिए।कृषि बैंक (Agricultural bank) : कृषि कार्य के लिए वित्त व्यवस्था करने वाला बैंक।काला धन (Black money) : सही या गलत तरीके से अर्जित किया हुआ वह धन जिसका लेखांकन नहीं हुआ होता था जिस पर कर नहीं दिया गया हो।कॉल मनी (Call money) : कोई कंपनी शेयर जारी करते समय शेयर आवेदनकर्ता से शेयर मूल्य का भाग आवेदन पत्र के साथ ही प्राप्त कर लेती है और शेष राशि शेयरधारक से एक निश्चित तिथि तक कई किस्तों में लेती है।कार्बन कर (Carbon tax) : इसके तहत उन ऊर्जा स्रोतों पर कर लगाया जाता है, यह वायुमंडल कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जित कर वैश्विक तापन को बढ़ावा देते हैं।कार्बन गहन समृद्धि (Carbon intensive Growth) : यह अर्थव्यवस्था की आर्थिक समृद्धि के लिए उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा के बीच आनुपातिक संबंध को व्यक्त करता है।कार्टेल (Cartel) : एक समान वस्तुओं का उत्पादन करने वाली दो फार्मो के बीच मूल्य बढ़ा कर अधिक मुनाफा कमाने के लिए किया गया समझौता है।कर्ब ट्रेंडिंग (Kerb trending) : स्टॉक एक्सचेंज मार्केट के बाहर प्रतिभूतियों की अवैध खरीद-फरोख्त।* क्रेता बाजार (Buyer’s market) : वह स्थिति जब बाजार में मांग की तुलना में पूर्ति अधिक होती है। इससे क्रेता लाभ की स्थिति में होते हैं।कौण्ट्रेरियन शेयर (Contrarian share) : बाजार के रूख के विपरीत दिशा में कार्य करने वाला शेयर।कागजी सोना (Paper gold) : अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा वर्ष १९६९ में अंतरराष्ट्रीय तरलता में वृद्धि के लिए अपने सदस्य देशों की जमा परिसंपत्तियों की माप के आधार पर आनुपातिक रूप से भारांश का वितरण जो मात्र खातों में लिखी गई मात्र होती है।क्लोजिंग स्टॉक (Closing stock) : वर्ष के अंत में विक्रय से बच जाने वाला माल।काला बाजार (Black market) : जमाखोरी द्वारा बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करना, जिससे मूल्य बढ़ा कर अधिक लाभ कमाया जा सके।गैर शुल्क बाधाएं (Non tariff barriers) : सरकार द्वारा आयात शुल्क से अलग लगाया गया आयात प्रतिबंध।गिनी गुणांक (Gini coefficient) : यह आय में पाई जाने वाली असमानताओं को कोटि की माप करता है। इसका मान 0 और 1 के बीच होता है।ग्रेशम का नियम (Law of Graysam) : इस नियम के अनुसार, किसी अर्थव्यवस्था में यदि एक साथ अच्छी और बुरी मुद्रा प्रचलन में हो तो बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है।गुणात्मक माल (Qualitative service) : शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं जो अर्थव्यवस्था को दक्षता के उच्चतम स्थान प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती है। घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit financing) : सरकार का व्यय राजस्व से अधिक होना तथा घाटे की पूर्ति के लिए मुद्रा छापना।चौथी दुनिया (Fourth world) : अफ्रीका एवं एशिया के वे देश जहां नगण्य औद्योगिक उत्पादन, आधारभूत संरचना की कमी, आय एवं शिक्षा का स्तर निम्न है। ये देश विदेशी सहायता एवं ऋण पर हमेशा निर्भर रहते हैं।चेक कलेक्शन (Cheque collection) : इसके तहत चेक को शहर के बाहर किसी अन्य स्थान पर भुगतान के लिए भेजा जाता है। बैंक इसके लिए ग्राहक से डाक व्यय एवं कमीशन लेती हैं।जोखिम पूंजी (Venture capital) : ऐसे छोटे एवं नए संस्थान में पूंजी निवेश करना जहां अधिक जोखिम होता है।टोबिन टैक्स (Tobin Tax) : अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स टौबिन ने पर्याप्त संसाधन सजन के लिए 1978 ईस्वी में विदेशी मुद्रा के समस्त लेन-देन पर कर लगाने का सुझाव दिया था।टैक्स हेवंस (Tax havens) : वह देश जहां विदेशी निवेशकों से बहुत कम दर पर आय कर और निगम कर वसूला जाता है, जिसका उद्देश्य विदेशी पूंजी को आकर्षित करना होता है।टपकन सिद्धांत (Trickle Down Theory) : वह सिद्धांत जिसके तहत उच्च आर्थिक विकास लाभ ऊपर से छनकर समाज में निचले पायदान पर बैठे लोगों तक भी पहुंच सके।नियति संवर्धन (Export promotion) : वैसी नीति अपनाना जिससे निर्यात संबंधी बाधाओं को दूर किया जा सके।निम्न संतुलन फंदा (Low Level of Equilibrium Trap) : ऐसी अर्थव्यवस्था जहां प्रति व्यक्ति आय अत्यंत ही कम तथा जनसंख्या की वृद्धि दर उच्च होती है इसलिए यह देश हमेशा कम आय स्तर पर संतुलन की स्थिति में रहते हैं।निवेशक की सीमांत उत्पादकता (Marginal Efficiency of capital) : प्रतिफल की वह प्रत्याशित दर है, जो किसी पूंजी परिसंपत्ति पर दिए गए निर्देशों से ब्याज की दर को छोड़कर सभी लागतें पूरी करने के बाद प्राप्त होती है।नेट बैंकिंग (Net Banking) : इंटरनेट एवं कंप्यूटर की सहायता से घर बैठे बैंकिंग कार्य करना।नकद साख खाता (Cash credit account) : इसमें खाताधारी को बैंक निश्चित मात्रा तक ऋण प्रदान करती है।परिणात्मक प्रतिबंध (Quantitative restrictions) : आंतरिक उद्योगो के संरक्षण और भुगतान शेष के घाटे को कम करने के लिए देश में आयात होने वाली वस्तुओं की मात्रा नियत करना।प्रतिष्ठान (Establishment) : ऐसे उद्यम जिनमें वर्ष की अधिकांश अवधि में पारिश्रमिक पाने वाला श्रमिक अवश्य कार्य करता है।पूंजी उत्पाद अनुपात (Capital output ratio) : एक इकाई उत्पादन के लिए पूंजी की आवश्यकता मात्रा लगानी पड़ती है, जिसे पूंजी उत्पाद अनुपात कहते हैं।प्रतिकारी शुल्क (counter vailing duty) : जब कोई देश निर्यात बढ़ाने के लिए अपने निर्यातकों को अनुदान प्रदान करता है तो दूसरा देश अपने बचाव के लिए उन वस्तुओं पर विद्यमान आयात करों में वृद्धि कर दे तो उसे प्रतिकारी शुल्क कहते हैं।प्रधान ब्याज दर (Prime Lending rate) : बैंक अपने सर्वश्रेष्ठ ग्राहकों को जिस न्यूनतम दर पर ऋण देती है उसे प्रधान ब्याज दर कहते हैं।पूर्ति का नियम (Law of Supply) : इस नियम के अनुसार कीमत तथा पूर्ति में प्रत्यक्ष संबंध होता है अर्थात कीमतों में वृद्धि उत्पादकों को वस्तुओं की पूर्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है तथा कीमत में कमी वस्तुओं की पूर्ति में कमी करने के लिए बाध्य करती है।प्रारंभिक जमा (Primary deposit) : जमा कर्ता द्वारा जमा की जाने वाली वास्तविक मुद्रा के रूप में बैंक में जमा राशि।पावक खाता चेक (Account Payee) : यह किसी चेक के बाई ओर ऊपर कोने में account pay only लिखा होता है तो उसे चेक का भुगतान केवल उसी व्यक्ति या संस्था के खाते में जमा करके हो सकता है।बहुराष्ट्रीय निगम (Multinational Corporation) : जिस कंपनी के कार्य का विस्तार एक से अधिक देश में होता था। जिसका उत्पादन एवं सेवा सुविधाएं उस देश के बाहर भी संपन्न होता है।ब्रिज लोन (Bridge loan) : कंपनीयों द्वारा अंतरिम अवधि के लिए बैंकों से लिया जाने वाला ऋण।बैलेंस शीट (Balance sheet) : किसी व्यापारिक संस्थान का वह लिखा पत्र जिसमें किसी निश्चित तिथि को उसके समस्त आस्तियों व देनदारियों को दिखाया गया है।बॉण्ड अथवा डिबेंचर (Bond or debenture) : केंद्र सरकार राज्य सरकार अथवा किसी संस्थान द्वारा ऋण लेकर जारी किया जाने वाला ऋण पत्र जिस पर संबंधित संस्थान धारक को निश्चित दर पर ब्याज भी प्रदान करती है।धारक बॉण्ड (Bearer bond) : वह ऋण पत्र जिसकी परिपक्वता अवधि पर कोई भी भुगतान प्राप्त कर सकता है।भागीदारी नोट्स (Participatory notes) : विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा उन निवेशकों को निर्गत किए जाते हैं, जो भारतीय पूंजी बाजार में निवेश करना चाहते हैं, किंतु अपना रजिस्ट्रेशन सेवी के पास नहीं करना चाहते।म्यूच्यूअल फंड (Mutual fund) : यह शेयर बाजार में निवेश की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक मध्यस्थ संस्था छोटे निवेशकों की बचतों को अपने अनुभव तथा कुशलता के विभिन्न शेयरों में निवेश करती है, जिससे उनके बाजार जोखिम में कमी होती है तथा निवेश पर उच्च प्रतिफल प्राप्त होता है।मध्य पतन व्यापार (Entrepot Trade) : लंदन तथा सिंगापुर जैसे पतन जो आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का आयात करके उन्हें उसे पुनः दूसरे देशों को पुननिर्यात कर देते हैं।मार्जिन फंडिंग (Margin funding) : शेयर ब्रोकर द्वारा निवेशकों से खरीदे गए शेयर के एवज में स्टॉक एक्सचेंज से वसूली गई राशि।मूर्त संपत्तियां (Tangible assets) : भूमि-भवन मशीन इत्यादि ऐसी संपत्ति जिसे देखा और छुआ जा सके।मोरेटोरियम (Moratorium) : कानून द्वारा ऋणों के भुगतान को टालने की अवधि।मृत्यु कर (Death duty) : उत्तराधिकारी को अपने मृत अभिभावक से प्राप्त संपत्ति के स्थानांतरण के एवज में जो पाया जाने वाला प्रत्यक्ष कर।माइक्रो क्रेडिट (Micro credit) : वह छोटी सी कर्ज राशि जो गरीब लोगों को अपनी आजीविका चलाने हेतु छोटे-मोटे कारोबार शुरू करने के लिए दिया जाता है।माँग जमा (Demand deposit) : इसके अंतर्गत बैंकों में चालू खाते तथा बचत खाते में जमा राशियों को रखा जाता है, जिसे खाताधारक जब चाहे तब निकाल सकता है।मुक्त बंदरगाह (Free port) : आयात निर्यात के लिए सीमा शुल्क तथा अन्य प्रकार के व्यापारिक नियंत्रण से मुक्त बंदरगाह।मर्चेंट बैंकिंग (Merchant banking) : औद्योगिक तथा व्यापारिक संस्थाओं को बैंकिंग सुविधा के अलावा परामर्श आदि सुविधा उपलब्ध कराना।योजक ऋण (Bridge loan) : शेयर जारी करके पूंजी जुटाने में कंपनियों को जो वक्त लगता है, इस अवधि में कंपनी द्वारा अपनी आवश्यकता के लिए बैंकों से लिया गया ऋण।यात्री चेक (Travellers cheque) : वैसा चेक जिसे जारी करते समय एवं भुगतान करते समय दोनों बार आवेदक के हस्ताक्षर कराए जाते हैं, देशभर में संबंधित बैंकों को किसी नहीं खाता से भुगतान की सुविधा के कारण यह यात्रियों में काफी लोकप्रिय है।राशिपातन (Dumping) : किसी वस्तु के अतिरिक्त भंडार को विदेशी बाजार में काफी कम मूल्य पर बेचना अथवा उसे नष्ट कर देना जिससे घरेलू बाजार में मूल्य स्तर को काफी नीचे गिरने से रोका जा सके।लियोन्टीफ पैराडॉक्स (Leontief paradox) : जब विकसित देशों द्वारा पूंजी प्रधान वस्तुओं का आयात किया जाता है तथा श्रम प्रधान वस्तुओं का निर्यात किया जाता है तथा श्रम प्रधान देशों द्वारा श्रम प्रधान वस्तुओं का आयात एवं पूंजी प्रधान वस्तुओं का निर्यात किया जाता है तो इस अवस्था को लियोन्टीफ पैराडॉक्स कहते हैं।वाणिज्य पत्र (Commercial paper) : वह असुरक्षित प्रपत्र जो किसी संस्था द्वारा अपनी अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकता के लिए जारी किया जाता है।वेबरीज वक्र (Website curve) : जो किसी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी के स्तर तथा रोजगार उपलब्धता के संबंध को प्रदर्शित करने के लिए खींचा जाता है।वृद्धिमान पूंजी निर्गत (ICOR) : अनुपात उत्पादन की एक अतिरिक्त इकाई के लिए लगने वाली पूंजी की अतिरिक्त इकाई।विमुद्रीकरण (Demonetization) : सरकार द्वारा एकाएक पुरानी मुद्रा को समाप्त कर नई मुद्रा जारी करना विमुदीकरण कहलाता है, इस सफेद धन वाले तो अपनी मुद्रा बदल सकते हैं, परंतु काले धन वाले इसके लिए साहस नहीं कर पाते परिणाम तरह कालाधन अपने आप ही नष्ट हो जाता है।विक्रेता बाजार (Seller market) : मांग अधिक होने एवं पूर्ति कम होने की स्थिति में व्यापारी द्वारा अधिक लाभ कमाने के लिए मनमानी कीमत बढ़ा देना इससे विक्रेता को फायदा होता है।विनिमय नियंत्रण (Exchange control) : किसी देश द्वारा विदेशी मुद्रा के स्वतंत्र बाजार को नियंत्रित करके अपनी मुद्रा की विनिमय दर को अपने अनुसार नियंत्रित करना।विनिमय पत्र (Exchange letter) : किसी व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर करके किसी अन्य व्यक्ति को आज्ञा देना कि वह एक निश्चित राशि का भुगतान किसी व्यक्ति को करें।व्यक्तिगत प्रतिभूति (Personal security) : किसी व्यक्ति को छोटे-मोटे ऋण प्रदान करने के लिए उस व्यक्ति या तीसरे व्यक्ति के चरित्र संपत्ति तथा क्षमता को प्रतिभूति के रूप में स्वीकार करना।विदेशी मुद्रा अनिवासी खाता (Foreign currency non resident accounts) : अनिवासी भारतीय द्वारा भारतीय बैंक में कुछ चुनी हुई मुद्राओं में खोला जाने वाला खाता विदेशों से अनिवासी भारतीय किसी भी रुप में अपना नकद इस खाते में जमा करा सकते हैं।व्यक्तिगत ऋण (Personal loan) : किश्तों पर वापस किया जाने वाला ऐसा ऋण जो उपभोक्ता को कार, कंप्यूटर आदि उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद के लिए प्रदान किया जाता है।स्विच ऑपरेशन (Switch operation) : इसके अंतर्गत रिजर्व बैंक द्वारा अल्प अवधि के प्रतिभूतियों का क्रय किया जाता है तथा दीर्घ अवधि के प्रतिभूतियों का विक्रय किया जाता है इसका उद्देश्य प्रतिभूतियों की परिपक्वता अवधि को लंबा करना होता है।स्वीट शेयर (Sweet shares) : किसी कंपनी द्वारा अपने कर्मचारी अथवा अन्य व्यक्ति को रियायती दर पर उपलब्ध कराया गया शेयर।साख संकुचन (Credit squeeze) : मुद्रा स्थिति को रोकने के लिए केंद्रीय बैंकों द्वारा कम मात्रा में धन प्रदान करना जिससे बाजार में मुद्रा की मात्रा कम हो सके।स्वर्णमान (Gold standard) : किसी देश की मुद्रा का मूल्य सोने में मापा जाना फिलहाल यह व्यवस्था किसी देश में नहीं है।संयुक्त क्षेत्र (joint sector) : सरकार एवं निजी क्षेत्र के संयुक्त स्वामित्व वाला उद्योग।सॉफ्ट करेंसी (Soft currency) : वैसी मुद्रा जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग की तुलना में पूर्ति अधिक हो।सॉफ्ट लोन (Soft loan) : कम ब्याज एवं लंबी अवधि जैसी आसान शर्तों वाले ऋण।सस्ती मुद्रा (Cheap money) : कम ब्याज दर पर प्राप्त की जाने वाली मुद्रा।सरकारी प्रतिभूतियां (Government securities) : सरकारी प्रतिज्ञापत्र, राष्ट्रीय बचत प्रमाण पत्र तथा राष्ट्रीय बचत योजना आदि सरकारी प्रतिभूतियां हैं।सेमी बोम्बाला (Semi Bomble) : काला धन मुद्रा प्रसार कीमतों में वृद्धि जैसी समस्याओं को सुलझाने के लिए अर्थशास्त्रियों द्वारा तैयार किया गया किया गया प्रपत्र।हवाला (Hawala) : इसके तहत अपने देश में घरेलू मुद्रा में जमा की गई राशि को दूसरे देश में विदेशी मुद्रा में कुछ शुल्क अदा करके प्राप्त किया जा सकता है।हार्ड करेंसी (Hard currency) : विकसित देशों की मुद्राएं जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में पूर्ति की तुलना में मां अधिक होती है।हॉट मनी (Hot money) : शीघ्र पलायन की प्रवृत्ति रखने वाली विदेशी मुद्रा।हीनार्थ प्रबंधन (Deficit finance) : बजट घाटे को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से ऋण लेना अथवा अतिरिक्त पत्र मुद्रा जारी करना अर्थव्यवस्था में लंबी अवधि तक इस नीति को अपनाना उचित नहीं माना जाता है।एर्गोनोमिक्स (Ergonomics) : ये किसी श्रमिक की कार्य क्षमता एवं उसके द्वारा किए जाने वाले वास्तविक कार्य के मध्य संबंध का अध्ययन करता है।स्टैगफ्लेशन (Stagflation) : अर्थव्यवस्था की वह अवस्था जिसमें मुद्रास्फीति के साथ-साथ मंदी एवं बेरोजगारी की स्थिति होती है।रिफ्लेक्शन (Reflection) : आर्थिक मंदी की अवस्था में सरकार द्वारा कुछ ऐसे कदम उठाए जाते हैं, जिससे लोगों की क्रय शक्ति में वृद्धि हो ताकि वस्तुओं की मांग बड़े इसके परिणाम स्वरुप मूल्य स्तर में जो वृद्धि होती है उसे रिफ्लेक्शन कहा जाता है।तरलता जाल (Liquidity trap) : बहुत न्यूज़ ब्याज दरों पर लोग बांडों में निवेश करने की बजाय मुद्रा को लगती रखने का अधिमान देते हैं क्योंकि दोनों को खरीदने का अर्थ होगा निश्चित हानि जिसके कारण इस बिंदु पर मुद्रा की सट्टा मांग अनंत लोच की होती है अर्थव्यवस्था में बिंदु के इस भाग को ही तरलता जाल कहा जाता है।मंदी (Depression) : जब बाजार में वस्तुओं की पूर्ति की तुलना में मांग कम हो जाती है तो कंपनियां अपनी वस्तुओं का उत्पादन कम कर देती है और अपने यहां कर्मचारियों की छटाई करती है परिणाम स्वरुप बेरोजगारी में वृद्धि होती है जिससे लोगों की क्रय शक्ति में कमी आती है जो कुल मांग को हटा देते हैं 1930 की विश्वव्यापी मंदी के दौरान कीन्स ने इसकी व्याख्या की थी। गरीबी रेखा (Poverty line) : आय का वह न्यूनतम स्तर जिसमें जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक वस्तुओं का क्रय किया जा सके उसको गरीबी रेखा के रूप में जाना जाता है। भारत में योजना आयोग ने गरीबी रेखा को परिभाषित करने के लिए न्यूनतम आवश्यकता एवं प्रभावी उपभोग मांग को आधार बनाया, जिसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्र में 2400 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन तथा शहरी क्षेत्र में 200 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन निर्धारित किया गया।जनांकिकी (Demography) : किसी देश की जनसंख्या वृद्धि जनसंख्या का भौगोलिक वितरण जन्म दर मृत्यु दर प्रबंधन शिक्षा स्तर आय स्तर इत्यादि का सांख्यिकी माध्यम से अर्थशास्त्र के अंतर्गत अध्ययन करना ही जनांकिकी कहलाता है।व्यापार चक्र (Trade cycle) : व्यापार चक्र पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का अंग है यह अर्थव्यवस्था के चक्रीय तेज हो तथा मंदियों से संबंधित है व्यापार चक्र में कुल रोजगार उत्पादन तथा कीमत स्तर में तरंग की तरह उतार चढ़ाव आते रहते हैं।बुल तथा बियर (Bull and beer) : शेयर बाजार में भाग लेने वाले ऐसे लोग जो उम्मीद करते हैं कि भविष्य में बाजार मूल्य बढ़ेगा तथा उन्हें लाभ होगा बुल कहलाते हैं तथा वे लोग जो बाजार का मूल्य गिरने की उम्मीद करते हैं वह बियर कहलाते हैं।मांग की लोच (Elasticity of demand) : कीमत में होने वाले आनुपातिक परिवर्तन के कारण मांगी गई वस्तु की मात्रा में हुए आनुपातिक परिवर्तन के अनुपात को ही मांग की कीमत लोच कहते हैं अर्थात कीमत में परिवर्तन से वस्तुओं की मांग में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों की मांग को मांग की लोच कहा जाता है।शून्य आधारित बजट (Zero based budget) : इसका निर्माण पीटर ए पायर ने सन 1959 में किया था इसके अंतर्गत बजट में पहले से शामिल किए जाने वाले प्रत्येक कार्यक्रम की आलोचनात्मक समीक्षा की जाती है और पुन: शून्य से प्रारंभ कर उपयोगिता के आधार पर धन का आवंटन किया जाता है, इस को ‘सूर्यास्त बजट प्रणाली’ भी कहा जाता है।लिंग आधारित बजट (Gender based budget) : इस बजट के माध्यम से सरकार लिंगभेद समाप्त करते हुए महिलाओं तथा शिशुओं के विकास कल्याण सशक्तिकरण से संबंधित योजना एवं कार्यक्रमों के लिए प्रतिवर्ष बजट में एक निर्धारित राशि की व्यवस्था सुनिश्चित करती है।विनिमय विपत्र (Exchange Order) – यह लेनदार द्वारा देनदार पर लिखा गया एक शर्त रहित पत्र आदेश है जो एक निश्चिय समय के पश्चात मांग पर विपत्र में लिखित राशि लेनदार या उसके आदेशित व्यक्ति को देय होता है।पूर्ण प्रतियोगिता बाजार (Total competition market) : बाजार की ऐसी स्थिति जिसमें क्रेताओं तथा विक्रेताओं की संख्या इतनी अधिक हो कि कोई अपने व्यवहार से कीमत को प्रभावित न कर सके तथा इस बाजार में क्रेता एवम विक्रेताओं को बाजार का पूर्ण ज्ञान हो और बाजार में बिकने वाली वस्तु की सभी कार्य पूर्ण रुप से सजातीय हो तो इस स्थिति में प्रत्येक विक्रेता एक ही मूल्य प्राप्त करता है जिसका निर्धारण मांग एवं पूर्ति की शक्तियों द्वारा होता है ऐसे बाजार को पूर्ण प्रतियोगी कहते हैं।पेटेंट (Patent) : किसी शोध के परिणाम स्वरुप जब किसी नई वस्तु, मशीन इत्यादि का आविष्कार होता है तो सरकार इस आविष्कार पर शोधार्थी को पेटेंट प्रदान करती है जिससे शोधकर्ता अपने अधिकार के निषेध उपयोग का अधिकारी हो जाता है।पोर्टफोलियो (Portfolio) : किसी निवेशकर्ता के पास उपलब्ध विभिन्न प्रकार की वित्तीय परिसंपत्तियों का संपूर्ण समूहों पोर्टफोलियो कहलाता है जैसे शेयर पत्र, सरकारी बॉन्ड तथा अन्य वित्तीय परिसंपत्तियां इत्यादि।भागीदारी नोट्स (Partnership notes) : यह नोट विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा उन निवेशकों को निर्गत किए जाते हैं जो भारतीय पूंजी बाजार में निवेश करना चाहते हैं किंतु अपना रजिस्ट्रेशन सेबी के साथ नहीं करना चाहते।जुड़वा घाटा (JOint deficit) : किसी भी अर्थव्यवस्था में बजटीय घाटा और भुगतान संतुलन के चालू खाते के साथ-साथ उपलब्ध होते हैं तो उसे जुड़वा घाटा कहते हैं।IFC कोड : ‘इंडियन फाइनेंसियल सिस्टम कोड’ जो सामान्यतः 11 अंकों का प्रत्येक व्यक्ति के चेक पर छपा होता है इसमें पहले के चार अक्षरों में बैंक का नाम 10 तथा अंतिम 6 अंकों में बैंक ब्रांच से संबंधित विवरण रहता है।NEFT प्रणाली : इंटरनेट के माध्यम से नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड ट्रांसफर के द्वारा एक लाख तक की धनराशि को एक बैंक से उसे तथा अन्य बैंक के खाते में खाताधारक द्वारा स्वयं ही हस्तांतरित किया जा सकता है।RTGS प्रणाली : सामान्यतः एक लाख रुपए से अधिक की धनराशि को खाताधारक द्वारा इंटरनेट के माध्यम से रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट विधि से किसी भी खाता धारक के किसी भी बैंक के खाते में त्वरित रुप में भेजा जाता है।नेट बैंकिंग : यह बैंकिंग की ऐसी प्रणाली है जिसमें आप घर बैठे बैठे इंटरनेट के माध्यम से अपने सभी बैंकिंग कार्यों का संचालन कर सकते हैं इसमें किसी तरह का भुगतान अपने अकाउंट में ऑनलाइन प्राप्त कर सकते हैं तथा दूसरों को भुगतान भी कर सकते हैं जैसे बिजली और मोबाइल का बिल इत्यादि का भुगतान होता है।GNP गेप : सकल राष्ट्रीय उत्पाद जो पूर्ण रोजगार स्तर से संबंधित हो तथा वास्तव में प्राप्त हो तो उन दोनों के अंतर को ही जीएनपी गैप कहते हैं।स्टैग (Stag) : वे लोग जो प्राथमिक बाजार में ही विनियोग करते हैं द्वितीय बाजार में नहीं स्टैग कहलाते हैं।ब्रिज ऋण (Bridge loan) : किसी परियोजना या प्रोजेक्ट की अस्थाई वित्त व्यवस्था को ब्रिज ऋण कहते हैं।प्रबल धक्का सिद्धांत (Strong push theory) : इस सिध्दांत का प्रतिपादन रोजेस्टिन रॉडन ने किया इसके अनुसार अल्पविकसित देशों को गरीबी तथा पिछड़ेपन से बाहर निकालने के लिए यह आवश्यक है की अर्थव्यवस्था में एक बार एक बड़ा निवेश अवश्य किया जाए।न्यूनतम क्रांतिक प्रयास (Minimal revolutionary effort) : न्यूनतम संतुलन प्रयास से बाहर निकालने के लिए लेबिस्टन ने न्यूनतम क्रांतिक प्रयास की अवधारणा दी जिसमें ऐसी अर्थव्यवस्थाओं में एक साथ बहुत अधिक मात्रा में निवेश संतुलित रुप से अनेक क्षेत्रों में किया जाए जिससे क्षेत्र दूसरे क्षेत्र के पूरा क्षेत्र के रूप में विकसित होगा तथा एक क्षेत्र दूसरे क्षेत्र के लिए बाजार का कार्य करेगा इससे अर्थव्यवस्था विकसित होती जाएगी।ब्लूचिप शेयर (Bluechip share) : ऐसी कंपनियों के शेयर होते हैं जिनकी उद्योग जगत में बहुत अधिक ख्याति होती है यह स्थिर होते हैं और इनका बाजार पूंजीकरण बहुत अधिक होता है।मूल्यनुसार कर (Valuable tax) : यह कर किसी वस्तु या सेवा के मूल्य के एक निश्चित भाग के रूप में लगाया जाता है, इस में जिस अनुपात में सेवा के मूल्य में वृद्धि होती है कर में उसी अनुपात में वृद्धि होती है।प्रगामी कर (Progressive tax) : क्रमबद्ध कर व्यवस्था जिसमें अधिक आय श्रेणी वाले उचित दर पर कर अदा करते हैं अर्थात आय में वृद्धि के साथ साथ कर में भी समानुपातिक वृद्धि होती रहती है।कठोर मुद्रा (Hard money) : किसी भी देश की वह मुद्रा जो स्वर्ण या अन्य किसी देश की मुद्रा में आसानी से परिवर्तनीय है हार्ड करेंसी कहलाती है।पूरक वस्तु (Complementary Goods) – यह भी वस्तुएं है जिनका आपस में संबंध इस प्रकार होता है कि वह एक वस्तु की कीमत में वृद्धि से दूसरी की मांग में कमी होती है तथा पहली वस्तु की कीमत में कमी से दूसरी वस्तु की मांग में वृद्धि होती है अर्थात एक वस्तु की मांग में वृद्धि दूसरी वस्तु की मांग में वृद्धि लाती है तो कमी दूसरी वस्तु की मांग में कमी लाती है उदाहरण स्वरूप पेन और स्याही डबल रोटी और मक्खन इत्यादि।गिफिन वस्तु (Giffin Goods) : ऐसी वस्तु की सर्वप्रथम पहचान रॉबर्ट गिफेन ने की इसमें ऋणात्मक आय प्रभाव धनात्मक प्रतिस्थापन प्रभाव से अधिक शक्तिशाली होता है जिससे उनकी कीमतें घटने पर इनकी मांग में कमी तथा कीमत में वृद्धि पर मांग में वृद्धि होती है अतः इस प्रकार की वस्तुओं पर मांग का नियम लागू नहीं होता है यह इस नियम के अपवाद है।संरचनात्मक स्फीति (Structural inflation) : पूर्ति की लोच हीनता कीमतों के न घटने की प्रवृत्ति और आएगी व्रतियों के परिणाम स्वरुप संरचनात्मक स्फीति आती है।मुद्रास्फीति (Inflation Pwvey) : अर्थव्यवस्था में जब मुद्रा की पूर्ति बढ़ती है तो वह वस्तुओं की मांग को बढ़ाती है लेकिन संसाधन सीमित एवं पूर्ण रूप से रोजगार युक्त होने के कारण वस्तुओं की पूर्ति मुद्रा की पूर्ति के अनुपात में नहीं बढ़ पाती परिणाम स्वरुप वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती है संक्षेप में मुद्रा स्फीति में मुद्रा का वास्तविक मूल्य कम हो जाता है।खुली स्फीति (Open inflation) : जब खुले बाजार के प्राणों से जिस में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता है वस्तुओं तथा साधनों के बाजार को स्वतंत्र रूप से कार्य करने दिया जाने के परिणाम स्वरुप जो स्फीति आती है उसे खुली स्फीति कहते हैं।सीमांत उपयोगिता ह्रास नियम (Low of Declining Marginal utility) : अन्य बातों के समान रहने पर उपभोक्ता जैसे जैसे किसी वस्तु की इकाइयों में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है, वैसे वैसे उस वस्तु से मिलने वाली कीमत उपयोगिता घटती जाती है।‘से’ का बाजार नियम (Market’s low of say) – सभी उत्पादनों की मात्रा के परिणाम स्वरुप देश के परिचालन में उतनी ही मात्रा में क्रय शक्ति प्रविष्ट हो जाती है फलत: जितना उत्पादन होता है सारा का सारा स्वत: ही बिक जाता है अत: पूर्ति स्वयं अपनी मांग उत्पन्न करती है यही ‘से’ का बाजार नियम है।अवसर लागत (Opportunity cost) : जब कोई व्यक्ति जब किसी एक वस्तु का उत्पादन करने के लिए दूसरी वस्तु का त्याग करता है तो पहली वस्तु की प्रति इकाई उत्पादन के लिए दूसरी वस्तु की त्यागी गयी मात्रा पुरानी वस्तु की अवसर लागत है।मौडवैट (Modvat) – वर्ष 1986 के प्रारंभ में किया गया संशोधित मूल्य संवर्धन पर लगाया गया केंद्रीय उत्पाद वह शुल्क है जिसके फलस्वरूप निजी वस्तुओं का उत्पादक प्रयोग आगतों पर बार-बार उत्पादन कर देने के भार से मुक्त हो जाता है।भुगतान संतुलन (Balance of payment) – किसी देश द्वारा या अन्य देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ होने वाले लेन-देन में आगत : निर्यात का वह लेखा-जोखा जो दो खंडों चालू खाता और पूंजी खाता में विभाजित होता है भुगतान संतुलन की होता है।बफर स्टॉक (Buffer stock) : आपात स्थिति में किसी वस्तु की कमी की पूर्ति के लिए वस्तु का स्टॉक तैयार करना बफर स्टॉक कहता है।कराघात (Impact of tax) : जिस व्यक्ति पर सर्वप्रथम कर लगाया जाता है और जिस पर कर प्रत्यक्ष मौद्रिक भाग पड़ता है तथा सरकार जिससे कर वसूल करती है उसे करघात का कहते हैं।कर अपवंचन (Tax evasion) : छुपाने की वह प्रक्रिया जिसमें कर अदायगी को अवैध रूप से बचा लिया जाता है अर्थात आयकर की चोरी की जाती है तो इसे हम कर अपवंचन कहते हैं तथा इसके माध्यम से संचित किए गए धन को काला धन कहते हैं।प्लास्टिक मनी (plastic money) : विभिन्न संस्थानों वित्तीय संस्थानों एवं कंपनियों द्वारा जारी किए गए क्रेडिट कार्ड डेबिट कार्ड इत्यादि वाले प्रकार के प्लास्टिक कार्ड जिनका प्रयोग मुद्रा के कार्यों के रूप में हो सके प्लास्टिक मनी कहलाती है।गैर निष्पादन कारी परिसंपत्तियां (Non performance assets) : बैंकों द्वारा वितरण ऐसे सभी देय ब्याज जिनका किसी वित्तीय वर्ष में मूलधन का भुगतान 90 दिनों तक रोक लिया जाता है।ले ऑफ (Lay off) : जब किसी वस्तु की मांग में कमी होने से औद्योगिक संस्थान द्वारा उत्पादन कम किए जाने के कारण कर्मचारियों की नौकरी से छटनी की जाती है तो इसे ही ले लॉक कहा जाता है। राजस्व घाटा (Revenue deficit) : कुल राजस्व प्राप्तियों की तुलना में जब कुल राजस्व व्यय अधिक होता है तो इसे राजस्व घाटा कहा जाता है।प्राथमिक घाटा (Primary deficit) : जब राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान को घटा दिया जाता है तो बचे अवशेष को प्राथमिक घाटा कहते हैं प्राथमिक घाटा वर्तमान वर्ष के घाटे की माप करता है इसे शुद्ध राजकीय घाटा भी कहा जाता है।रैचेड प्रभाव (Rechelt effect) : आय में जब वृद्धि होती है तो उपभोग स्तर में तीव्र वृद्धि होती है परंतु जब आय में कमी होती है तो आय में कमी के अनुपात में उपयोग में कमी नहीं होती इसे ड्यूजेनरी की सापेक्ष आय परिकल्पना भी कहा जाता है।लोरेंज वक्र (Lawrense Curve) : इस वक्र द्वारा लोगों के बीच आय विषमता को ज्ञात करते हैं इसे 1992 में मैक्सओ लॉरेंस ने विकसित किया लोरेंज वक्र का प्रतिबिंब उन व्यक्तियों को प्रदर्शित करता है जो एक निश्चित आय के प्रतिशत के नीचे होते हैं।मांग का नियम (law of demand) : अन्य बातों के समान रहने पर वस्तु की कीमत तथा मांग के बीच विपरीत संबंध होते हैं अर्थात वस्तु की कीमत में कमी वस्तु की मांग में वृद्धि करेगी तथा इसके विपरीत कीमत में वृद्धि वस्तु की मांग में कमी करेगी यही मांग का नियम है।सी.आर.आर.(नकद आरक्षण अनुपात) -- सी.आर.आर. वह धन है जो बैंकों को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास गारंटी के रूप में रखना होता है।

बैंक दर -- जिस दर पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को उधार देता है बैंक दर कहलाती है।

वैधानिक तरलता अनुपात (एस.एल.आर.) -- किसी आपात देनदारी को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक बैंक अपने प्रतिदिन कारोबार नकद सोना और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के रूप में एक खास रकम रिजर्व बैंक के पास जमा कराते है जिस एस.एल.आर. कहते है।

रेपो रेट -- रेपो दर वह है जिस दर पर बैंकों को कम अवधि के लिए रिजर्व बैंक से कर्ज मिलता है। रेपो रेट कम करने से बैंको को कर्ज मिलना आसान हो जाता है।

लीड बैंक योजना -- जिलों की अर्थव्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से इस योजना का प्रारंभ १९६९ में किया गया। जिसके तहत प्रत्येक जिले में एक लीड बैंक होगा जो कि अन्य बैंकों कि सहायता के साथ साथ कार्यक्रमों के माध्यम से वित्तीय संस्थाओ के बीच समन्वय स्थापित करेगा।

निष्पादन बजट -- कार्यों के परिणामों या निष्पादन को आधार बनाकर निर्मित होने वाला बजट निष्पादन बजट है इसे कार्यपूर्ति बजट भी कहते है।

जीरोबेस बजट -- इस बजट में किसी विभाग या संगठन कि प्रस्तावित व्यय मांग के प्रत्येक मद को शुन्य मानते हुए पुनर्मूल्यांकन किया जाता है. भारत में इसे सर्वप्रथम “काउन्सिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CISR)” में लागू किया गया और 1987-88 से सभी विभागों व मंत्रालयों में लागू हो गया।

आउटकम बजट -- इसके तहत प्रत्येक विभाग/मंत्रालय के भौतिक लक्ष्यों को अल्प अवधि में निरीक्षण एवं मूल्यांकन के लिए रखा जाता है।

जेंडर बजट -- इस बजट के माध्यम से सरकार महिलाओं के कल्याण एवं सशक्तिकरण के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों और योजनाओं के क्रियान्वयन हेतु प्रतिवर्ष एक निश्चित राशि का प्रावधान बजट में करती है।

प्रत्यक्ष कर -- वह कर जिसमे कर स्थापितकर्ता (सरकार) और करदाता के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है। अर्थात जिसके ऊपर कर लगाया जा रहा है सीधे वही व्यक्ति भरता है।

अप्रत्यक्ष कर -- वह कर जिसमे कर स्थापितकर्ता (सरकार) और भुगतानकर्ता के बीच प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं होता है अर्थात जिस व्यक्ति/संस्था पर कर लगाया जाता है उसे किसी अन्य तरीके से प्राप्त किया जाता है।

राजस्व घाटा -- सरकार को प्राप्त कुल राजस्व एवं सरकार द्वारा व्यय किये गए कुल राजस्व का अंतर ही राजस्व घाटा है।

राजकोषीय घाटा -- सरकार के लिए कुल प्राप्त राजस्व, अनुदान और गैर-पूंजीगत प्राप्तियों कि तुलना होने वाले कुल व्यय का अतिरेक है अर्थात आय(प्राप्तियों) के सन्दर्भ में व्यय कितना अधिक है।

बॉण्ड अथवा डिबेंचर -- ऐसे ऋण पत्र होते है जिन्हें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, अथवा कोई संसथान जारी करता है इन ऋण पत्रों पर एक निश्चित अवधि पर निश्चित दर से ब्याज प्राप्त होता है।

प्रतिभूति -- वित्तीय परिसंपत्तियों जैसे शेयर, डिबेंचर, व अन्य ऋण पत्रों के लिए संयुन्क्त रूप से प्रतिभूति शब्द का प्रयोग किया जाता है. बैंकिग में भी ऋणों कि जमानत के सन्दर्भ में प्रतिभूति शब्द का प्रयोग होता है।

रिवर्स रेपो रेट -- बैंकों को रिजर्व बैंक के पास अपना धन जमा करने के उपरांत जिस दर से ब्याज मिलता है वह रिवर्स रेपो रेट है।

एडम स्मिथ

एडम स्मिथ (५जून १७२३ से १७ जुलाई १७९०) एक ब्रिटिश नीतिवेत्ता, दार्शनिक और राजनैतिक अर्थशास्त्री थे। उन्हें अर्थशास्त्र का पितामह भी कहा जाता है।आधुनिक अर्थशास्त्र के निर्माताओं में एडम स्मिथ (जून 5, 1723—जुलाई 17, 1790) का नाम सबसे पहले आता है. उनकी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा(The Wealth of Nations) ने अठारहवीं शताब्दी के इतिहासकारों एवं अर्थशास्त्रियों को बेहद प्रभावित किया है. कार्ल मार्क्स से लेकर डेविड रिकार्डो तक अनेक ख्यातिलब्ध अर्थशास्त्री, समाजविज्ञानी और राजनेता एडम स्मिथ से प्रेरणा लेते रहे हैं. बीसवीं शताब्दी के अर्थशास्त्रियों में, जिन्होंने एडम स्मिथ के विचारों से प्रेरणा ली है, उनमें मार्क्स, एंगेल्स, माल्थस, मिल, केंस(Keynes) तथा फ्राइडमेन(Friedman) के नाम उल्लेखनीय हैं. स्वयं एडम स्मिथ पर अरस्तु, जा॓न ला॓क, हा॓ब्स, मेंडविले, फ्रांसिस हचसन, ह्यूम आदि विद्वानों का प्रभाव था. स्मिथ ने अर्थशास्त्र, राजनीति दर्शन तथा नीतिशास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया. किंतु उसको विशेष मान्यता अर्थशास्त्र के क्षेत्र में ही मिली. आधुनिक बाजारवाद को भी एडम स्मिथ के विचारों को मिली मान्यता के रूप में देखा जा सकता है.

एडम स्मिथ के जन्म की तिथि सुनिश्चित नहीं है. कुछ विद्वान उसका जन्म पांच जून 1723 को तथा कुछ उसी वर्ष की 16 जून को मानते हैं. जो हो उसका जन्म ब्रिटेन के एक गांव किर्काल्दी(Kirkaldy, Fife, United Kingdom) में हुआ था. एडम के पिता कस्टम विभाग में इंचार्ज रह चुके थे. किंतु उनका निधन स्मिथ के जन्म से लगभग छह महीने पहले ही हो चुका था. एडम अपने माता–पिता की संभवतः अकेली संतान था. वह अभी केवल चार ही वर्ष का था कि आघात का सामना करना पड़ा. जिप्सियों के एक संगठन द्वारा एडम का अपहरण कर लिया गया. उस समय उसके चाचा ने उसकी मां की सहायता की. फलस्वरूप एडम को सुरक्षित प्राप्त कर लिया गया. पिता की मृत्यु के पश्चात स्मिथ को उसकी मां ने ग्लासगो विश्वविद्यालय में पढ़ने भेज दिया. उस समय स्मिथ की अवस्था केवल चौदह वर्ष थी. प्रखर बुद्धि होने के कारण उसने स्कूल स्तर की पढ़ाई अच्छे अंकों के साथ पूरी की, जिससे उसको छात्रवृत्ति मिलने लगी. जिससे आगे के अध्ययन के लिए आ॓क्सफोर्ड विश्वविद्यालय जाने का रास्ता खुल गया. वहां उसने प्राचीन यूरोपीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया. उस समय तक यह तय नहीं हो पाया था कि भाषा विज्ञान का वह विद्यार्थी आगे चलकर अर्थशास्त्र के क्षेत्र में न केवल नाम कमाएगा, बल्कि अपनी मौलिक स्थापनाओं के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में युगपरिवर्तनकारी योगदान भी देगा.

सन 1738 में स्मिथ ने सुप्रसिद्ध विद्वान–दार्शनिक फ्रांसिस हचीसन के नेतृत्व में नैतिक दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा पास की. वह फ्रांसिस की मेधा से अत्यंत प्रभावित था तथा उसको एवं उसके अध्यापन में बिताए गए दिनों को, अविस्मरणीय मानता था. अत्यंत मेधावी होने के कारण स्मिथ की प्रतिभा का॓लेज स्तर से ही पहचानी जाने लगी थी. इसलिए अध्ययन पूरा करने के पश्चात युवा स्मिथ जब वापस अपने पैत्रिक नगर ब्रिटेन पहुंचा, तब तक वह अनेक महत्त्वपूर्ण लेक्चर दे चुका था, जिससे उसकी ख्याति फैलने लगी थी. वहीं रहते हुए 1740 में उसने डेविड ह्यूम की चर्चित कृति A Treatise of Human Nature का अध्ययन किया, जिससे वह अत्यंत प्रभावित हुआ. डेविड ह्यूम उसके आदर्श व्यक्तियों में से था. दोनों में गहरी दोस्ती थी. स्वयं ह्यूम रूसो की प्रतिभा से बेहद प्रभावित थे. दोनों की दोस्ती के पीछे एक घटना का उल्लेख मिलता है. जिसके अनुसार ह्यूम ने एक बार रूसो की निजी डायरी उठाकर देखी तो उसमें धर्म, समाज, राजनीति, अर्थशास्त्र आदि को लेकर गंभीर टिप्पणियां की गई थीं. उस घटना के बाद दोनों में गहरी मित्रता हो गई. ह्यूम एडम स्मिथ से लगभग दस वर्ष बड़ा था. डेविड् हयूम के अतिरिक्त एडम स्मिथ के प्रमुख दोस्तों में जा॓न होम, ह्यूज ब्लेयर, लार्ड हैलिस, तथा प्रंसिपल राबर्टसन आदि के नाम नाम उल्लेखनीय हैं.अपनी मेहनत एवं प्रतिभा का पहला प्रसाद उसको जल्दी मिल गया. सन 1751 में स्मिथ को ग्लासगा॓ विश्वविद्यालय में तर्कशास्त्र के प्रवक्ता के पद पर नौकरी मिल गई. उससे अगले ही वर्ष उसको नैतिक दर्शनशास्त्र का विभागाध्यक्ष बना दिया गया. स्मिथ का लेखन और अध्यापन का कार्य सतत रूप से चल रहा था. सन 1759 में उसने अपनी पुस्तक ‘नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ (Theory of Moral Sentiments) पूरी की. यह पुस्तक अपने प्रकाशन के साथ ही चर्चा का विषय बन गई. उसके अंग्रेजी के अलावा जर्मनी और फ्रांसिसी संस्करण हाथों–हाथ बिकने लगे. पुस्तक व्यक्ति और समाज के अंतःसंबंधों एवं नैतिक आचरण के बारे में थी. उस समय तक स्मिथ का रुझान राजनीति दर्शन एवं नीतिशास्त्र तक सीमित था. धीरे–धीरे स्मिथ विश्वविद्यालयों के नीरस और एकरस वातावरण से ऊबने लगा. उसे लगने लगा कि जो वह करना चाहता है वह का॓लेज के वातावरण में रहकर कर पाना संभव नहीं है.

इस बीच उसका रुझान अर्थशास्त्र के प्रति बढ़ा था. विशेषकर राजनीतिक दर्शन पर अध्यापन के दौरान दिए गए लेक्चरर्स में आर्थिक पहलुओं पर भी विचार किया गया था. उसके विचारों को उसी के एक विद्यार्थी ने संकलित किया, जिन्हें आगे चलकर एडविन केनन ने संपादित किया. उन लेखों में ही ‘वैल्थ आ॓फ नेशनस्’ के बीजतत्व सुरक्षित थे. करीब बारह वर्ष अध्यापन के क्षेत्र में बिताने के पश्चात स्मिथ ने का॓लेज की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और जीविकोपार्जन के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगा. इसी दौर में उसने फ्रांस तथा यूरोपीय देशों की यात्राएं कीं तथा समकालीन विद्वानों डेविड ह्यूम, वाल्तेयर, रूसो, फ्रांसिस क्वेसने (François Quesnay), एनी राबर्ट जेकुइस टुरगोट(Anne-Robert-Jacques Turgot) आदि से मिला. इस बीच उसने कई शोध निबंध भी लिखे, जिनके कारण उसकी प्रष्तिठा बढ़ी. कुछ वर्ष पश्चात वह वह किर्काल्दी वापस लौट आया.

अपने पैत्रिक गांव में रहते हुए स्मिथ ने अपनी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक The Wealth of Nations पूरी की, जो राजनीतिविज्ञान और अर्थशास्त्र पर अनूठी पुस्तक है. 1776 में पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही एडम स्मिथ की गणना अपने समय के मूर्धन्य विद्वानों में होने लगी. इस पुस्तक पर दर्शनशास्त्र का प्रभाव है. जो लोग स्मिथ के जीवन से परिचित नहीं हैं, उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि स्मिथ ने इस पुस्तक की रचना एक दर्शनशास्त्र का प्राध्यापक होने के नाते अपने अध्यापन कार्य के संबंध में की थी. उन दिनों विश्वविद्यालयों में इतिहास और दर्शनशास्त्र की पुस्तकें ही अधिक पढ़ाई जाती थीं, उनमें एक विषय विधिवैज्ञानिक अध्ययन भी था. विधिशास्त्र के अध्ययन का सीधा सा तात्पर्य है, स्वाभाविक रूप से न्यायप्रणालियों का विस्तृत अध्ययन. प्रकारांतर में सरकार और फिर राजनीति अर्थव्यवस्था का चिंतन. इस तरह यह साफ है कि अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ ने आर्थिक सिद्धांतों की दार्शनिक विवेचनाएं की हैं. विषय की नवीनता एवं प्रस्तुतीकरण का मौलिक अंदाज उस पुस्तक की मुख्य विशेषताएं हैं.

स्मिथ पढ़ाकू किस्म का इंसान था. उसके पास एक समृद्ध पुस्तकालय था, जिसमें सैंकड़ों दुर्लभ ग्रंथ मौजूद थे. रहने के लिए उसको शांत एवं एकांत वातावरण पसंद था, जहां कोई उसके जीवन में बाधा न डाले. स्मिथ आजीवन कुंवारा ही रहा. जीवन में सुख का अभाव एवं अशांति की मौजूदगी से कार्य आहत न हों, इसलिए उसका कहना था कि समाज का गठन मनुष्यों की उपयोगिता के आधार पर होना चाहिए, जैसे कि व्यापारी समूह गठित किए जाते हैं; ना कि आपसी लगाव या किसी और भावनात्मक आधार पर.

अर्थशास्त्र के क्षेत्र में एडम स्मिथ की ख्याति उसके सुप्रसिद्ध सिद्धांत ‘लेजे फेयर (laissez-faire) के कारण है, जो आगे चलकर उदार आर्थिक नीतियों का प्रवर्तक सिद्धांत बना. लेजे फेयर का अभिप्राय था, ‘कार्य करने की स्वतंत्रता’ अर्थात आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप. आधुनिक औद्योगिक पूंजीवाद के समर्थक और उत्पादन व्यवस्था में क्रांति ला देने वाले इस नारे के वास्तविक उदगम के बारे में सही–सही जानकारी का दावा तो नहीं किया जाता. किंतु इस संबंध में एक बहुप्रचलित कथा है, जिसके अनुसार इस उक्ति का जन्म 1680 में, तत्कालीन प्रभावशाली फ्रांसिसी वित्त मंत्री जीन–बेपटिस्ट कोलबार्ट की अपने ही देश के व्यापरियों के साथ बैठक के दौरान हुआ था. व्यापारियों के दल का नेतृत्व एम. ली. जेंड्री कर रहे थे. व्यापारियों का दल कोलबार्ट के पास अपनी समस्याएं लेकर पहुंचा था. उन दिनों व्यापारीगण एक ओर तो उत्पादन–व्यवस्था में निरंतर बढ़ती स्पर्धा का सामना कर रहे थे, दूसरी ओर सरकारी कानून उन्हें बाध्यकारी लगते थे. उनकी बात सुनने के बाद कोलबार्ट ने किंचित नाराजगी दर्शाते हुए कहा—

‘इसमें सरकार व्यापारियों की भला क्या मदद कर सकती है?’ इसपर ली. जेंड्री ने सादगी–भरे स्वर में तत्काल उत्तर दिया—‘लीजेज–नाउज फेयर [Laissez-nous faire (Leave us be, Let us do)].’ उनका आशय था, ‘आप हमें हमारे हमारे हाल पर छोड़ दें, हमें सिर्फ अपना काम करने दें.’ इस सिद्धांत की लोकप्रियता बढ़ने के साथ–साथ, एडम स्मिथ को एक अर्थशास्त्री के रूप में पहचान मिलती चली गई. उस समय एडम स्मिथ ने नहीं जानता था कि वह ऐसे अर्थशास्त्रीय सिद्धांत का निरूपण कर रहा है, जो एक दिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी सिद्ध होगा.

‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष बाद ही स्मिथ को कस्टम विभाग में आयुक्त की नौकरी मिल गई. उसी साल उसे धक्का लगा जब उसके घनिष्ट मित्र और अपने समय के जानेमाने दार्शनिक डेविड ह्यूम की मृत्यु का समाचार उसको मिला. कस्टम आयुक्त का पद स्मिथ के लिए चुनौती–भरा सिद्ध हुआ. उस पद पर रहते हुए उसे तस्करी की समस्या से निपटना था; जिसे उसने अपने ग्रंथ राष्ट्रों की संपदा में ‘अप्राकृतिक विधान के चेहरे के पीछे सर्वमान्य कर्म’ (Legitimate activity in the face of ‘unnatural’ legislation) के रूप में स्थापित किया था. 1783 में एडिनवर्ग रा॓यल सोसाइटी की स्थापना हुई तो स्मिथ को उसका संस्थापक सदस्य मनोनीत किया गया. अर्थशास्त्र एवं राजनीति के क्षेत्र में स्मिथ की विशेष सेवाओं के लिए उसको ग्ला॓स्ग विश्वविद्यालय का मानद रेक्टर मनोनीत किया गया. वह आजीवन अविवाहित रहा. रात–दिन अध्ययन–अध्यापन में व्यस्त रहने के कारण उसका स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगा था. अंततः 19 जुलाई 1790 को, मात्र सढ़सठ वर्ष की अवस्था में एडिनबर्ग में उसकी मृत्यु हो गई.

वैचारिकी

एडम स्मिथ को आधुनिक अर्थव्यवस्था के निर्माताओं में से माना जाता है. उसके विचारों से प्रेरणा लेकर जहां कार्ल मार्क्स, एंगेल्स, मिल, रिकार्डो जैसे समाजवादी चिंतकों ने अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाया, वहीं अत्याधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीजतत्व भी स्मिथ के विचारों में निहित हैं. स्मिथ का आर्थिक सामाजिक चिंतन उसकी दो पुस्तकों में निहित है. पहली पुस्तक का शीर्षक है— नैतिक अनुभूतियों के सिद्धांत’ जिसमें उसने मानवीय व्यवहार की समीक्षा करने का प्रयास किया है. पुस्तक पर स्मिथ के अध्यापक फ्रांसिस हचसन का प्रभाव है. पुस्तक में नैतिक दर्शन को चार वर्गों—नैतिकता, सदगुण, व्यक्तिगत अधिकार की भावना एवं स्वाधीनता में बांटते हुए उनकी विवेचना की गई है. इस पुस्तक में स्मिथ ने मनुष्य के संपूर्ण नैतिक आचरण को निम्नलिखित दो हिस्सों में वर्गीकृत किया है—

1. नैतिकता की प्रकृति (Nature of morality)

२. नैतिकता का लक्ष्य (Motive of morality)

नैतिकता की प्रकृति में स्मिथ ने संपत्ति, कामनाओं आदि को सम्मिलित किया है. जबकि दूसरे वर्ग में स्मिथ ने मानवीय संवेदनाओं, स्वार्थ, लालसा आदि की समीक्षा की है. स्मिथ की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है—‘राष्ट्रों की संपदा की प्रकृति एवं उसके कारणों की विवेचना’ यह अद्वितीय ग्रंथ पांच खंडों में है. पुस्तक में राजनीतिविज्ञान, अर्थशास्त्र, मानव व्यवहार आदि विविध विषयों पर विचार किया गया है, किंतु उसमें मुख्य रूप से स्मिथ के आर्थिक विचारों का विश्लेषण है. स्मिथ ने मुक्त अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हुए दर्शाया है कि ऐसे दौर में अपने हितों की रक्षा कैसे की जा सकती है, किस तरह तकनीक का अधिकतम लाभ कमाया जा सकता है, किस प्रकार एक कल्याणकारी राज्य को धर्मिकता की कसौटी पर कसा जा सकता है और कैसे व्यावसायिक स्पर्धा से समाज को विकास के रास्ते पर ले जाया जा सकाता है. स्मिथ की विचारधारा इसी का विश्लेषण बड़े वस्तुनिष्ठ ढंग से प्रस्तुत करती है. इस पुस्तक के कारण स्मिथ पर व्यक्तिवादी होने के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन जो विद्वान स्मिथ को निरा व्यक्तिवादी मानते हैं, उन्हें यह तथ्य चौंका सकता है कि उसका अधिकांश कार्य मानवीय नैतिकता को प्रोत्साहित करने वाला तथा जनकल्याण पर केंद्रित है. अपनी दूसरी पुस्तक ‘नैतिक अनुभूतियों का सिद्धांत’ में स्मिथ लिखता है—

‘पूर्णतः स्वार्थी व्यक्ति की संकल्पना भला कैसे की जा सकती है. प्रकृति के निश्चित ही कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो उसको दूसरों के हितों से जोड़कर उनकी खुशियों को उसके लिए अनिवार्य बना देते हैं, जिससे उसे उन्हें सुखी–संपन्न देखने के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होता.’

स्मिथ के अनुसार स्वार्थी और अनिश्चितता का शिकार व्यक्ति सोच सकता है कि प्रकृति के सचमुच कुछ ऐसे नियम हैं जो दूसरे के भाग्य में भी उसके लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं तथा उसके लिए खुशी का कारण बन सकते हैं. जबकि यह उसका सरासर भ्रम ही है. उसको सिवाय ऐसा सोचने के कुछ और हाथ नहीं लग पाता. मानव व्यवहार की एकांगिकता और सीमाओं का उल्लेख करते हुए एक स्थान पर स्मिथ ने लिखा है कि—

‘हमें इस बात का प्रामाणिक अनुभव नहीं है कि दूसरा व्यक्ति क्या सोचता है. ना ही हमें इस बात का कोई ज्ञान है कि वह वास्तव में किन बातों से प्रभावित होता है. सिवाय इसके कि हम स्वयं को उन परिस्थितियों में होने की कल्पना कर कुछ अनुमान लगा सकें. छज्जे पर खडे़ अपने भाई को देखकर हम निश्चिंत भी रह सकते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि उसपर क्या बीत रही है. हमारी अनुभूतियां उसकी स्थिति के बारे में प्रसुप्त बनी रहती हैं. वे हमारे ‘हम’ से परे न तो जाती हैं, न ही जा सकती हैं; अर्थात उसकी वास्तविक स्थिति के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा पाते हैं. न उसकी चेतना में ही वह शक्ति है जो हमें उसकी परेशानी और मनःस्थिति का वास्तविक बोध करा सके, उस समय तक जब तक कि हम स्वयं को उसकी परिस्थितियों में रखकर नहीं सोचते. मगर हमारा अपना सोच केवल हमारा सोच और संकल्पना है, न कि उसका. कल्पना के माध्यम से हम उसकी स्थिति का केवल अनुमान लगाने में कामयाब हो पाते हैं.’

उपर्युक्त उद्धरण द्वारा स्मिथ ने यथार्थ स्थिति बयान की है. हमारा रोजमर्रा का बहुत–सा व्यवहार केवल अनुमान और कल्पना के सहारे ही संपन्न होता है.

भावुकता एवं नैतिकता के अनपेक्षित दबावों से बचते हुए स्मिथ ने व्यक्तिगत सुख–लाभ का पक्ष भी बिना किसी झिझक के लिया है. उसके अनुसार खुद से प्यार करना, अपनी सुख–सुविधाओं का खयाल रखना तथा उनके लिए आवश्यक प्रयास करना किसी भी दृष्टि से अकल्याणकारी अथवा अनैतिक नहीं है. उसका कहना था कि जीवन बहुत कठिन हो जाएगा यदि हमारी कोमल संवेदनाएं और प्यार, जो हमारी मूल भावना है, हर समय हमारे व्यवहार को नियंत्रित करने लगे, और उसमें दूसरों के कल्याण की कोई कामना ही न हो; या वह अपने अहं की रक्षा को ही सर्वस्व मानने लगे, और दूसरों की उपेक्षा ही उसका धर्म बन जाए. सहानुभूति तथा व्यक्तिगत लाभ एक दूसरे के विरोधी न होकर परस्पर पूरक होते हैं. दूसरों की मदद के सतत अवसर मनुष्य को मिलते ही रहते हैं.

स्मिथ ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में परोपकार और कल्याण की व्याख्या बड़े ही वस्तुनिष्ट ढंग से करता है. स्मिथ के अनुसार अभ्यास की कमी के कारण हमारा मानस एकाएक ऐसी मान्यताओं को स्वीकारने को तैयार नहीं होता, हालांकि हमारा आचरण निरंतर उसी ओर इंगित करता रहता है. हमारे अंतर्मन में मौजूद द्वंद्व हमें निरंतर मथते रहते हैं. एक स्थान पर वह लिखता है कि केवल धर्म अथवा परोपकार के बल पर आवश्यकताओं की पूर्ति असंभव है. उसके लिए व्यक्तिगत हितों की उपस्थिति भी अनिवार्य है. वह लिखता है—

‘हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’

स्मिथ के अनुसार यदि कोई आदमी धनार्जन के लिए परिश्रम करता है तो यह उसका अपने सुख के लिए किया गया कार्य है. लेकिन उसका प्रभाव स्वयं उस तक ही सीमित नहीं रहता. धनार्जन की प्रक्रिया में वह किसी ने किसी प्रकार दूसरों से जुड़ता है. उनका सहयोग लेता है तथा अपने उत्पाद के माध्यम से अपने साथ–साथ अपने समाज की आवश्यकताएं पूरी करता है. स्पर्धा के बीच कुछ कमाने के लिए उसे दूसरों से अलग, कुछ न कुछ उत्पादन करना ही पड़ता है. उत्पादन तथा उत्पादन के लिए प्रयुक्त तकनीक की विशिष्टता का अनुपात ही उसकी सफलता तय करता है. ‘राष्ट्रों की संपदा’ नामक ग्रंथ में स्मिथ लिखता है कि—

‘प्रत्येक उद्यमी निरंतर इस प्रयास में रहता है कि वह अपनी निवेश राशि पर अधिक से अधिक लाभ अर्जित कर सके. यह कार्य वह अपने लिए, केवल अपने भले की कामना के साथ करता है, न कि समाज के कल्याण की खातिर. यह भी सच है कि अपने भले के लिए ही वह अपने व्यवसाय को अधिक से अधिक आगे ले जाने, उत्पादन और रोजगार के अवसरों को ज्यादा से ज्यादा विस्तार देने का प्रयास करता है. किंतु इस प्रक्रिया में देर–सवेर समाज का भी हित–साधन होता है.’

पांच खंडों में लिखी गई पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में स्मिथ किसी राष्ट्र की समृद्धि के कारणों और उनकी प्रकृति को स्पष्ट करने का प्रयास भी किया है. किंतु उसका आग्रह अर्थव्यवस्था पर कम से कम नियंत्रण के प्रति रहा है. स्मिथ के अनुसार समृद्धि का पहला कारण श्रम का अनुकूल विभाजन है. यहां अनुकूलता का आशय किसी भी व्यक्ति की कार्यकुशलता का सदुपयोग करते हुए उसे अधिकतम उत्पादक बनाने से है. इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए स्मिथ का एक उदाहरण बहुत ही चर्चित रहा है—

‘कल्पना करें कि दस कारीगर मिलकर एक दिन में अड़तालीस हजार पिन बना सकते हैं, बशर्ते उनकी उत्पादन प्रक्रिया को अलग–अलग हिस्सों में बांटकर उनमें से हर एक को उत्पादन प्रक्रिया का कोई खास कार्य सौंप दिया जाए. किसी दिन उनमें से एक भी कारीगर यदि अनुपस्थित रहता है तो; उनमें से एक कारीगर दिन–भर में एक पिन बनाने में भी शायद ही कामयाब हो सके. इसलिए कि किसी कारीगर विशेष की कार्यकुशलता उत्पादन प्रक्रिया के किसी एक चरण को पूरा कर पाने की कुशलता है.’

स्मिथ मुक्त व्यापार के पक्ष में था. उसका कहना था कि सरकारों को वे सभी कानून उठा लेने चाहिए जो उत्पादकता के विकास के आड़े आकर उत्पादकों को हताश करने का कार्य करते हैं. उसने परंपरा से चले आ रहे व्यापार–संबंधी कानूनों का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह के कानून उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं. उसने आयात के नाम पर लगाए जाने वाले करों एवं उसका समर्थन करने वाले कानूनों का भी विरोध किया है. अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उसका सिद्धांत ‘लैसे फेयर’ के नाम से जाना जाता है. जिसका अभिप्रायः है—उन्हें स्वेच्छापूर्वक कार्य करने दो (let them do). दूसरे शब्दों में स्मिथ उत्पादन की प्रक्रिया की निर्बाधता के लिए उसकी नियंत्रणमुक्ति चाहता था. वह उत्पादन–क्षेत्र के विस्तार के स्थान पर उत्पादन के विशिष्टीकरण के पक्ष में था, ताकि मशीनी कौशल एवं मानवीय श्रम का अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए. उत्पादन सस्ता हो और वह अधिकतम तक पहुंच सके. उसका कहना था कि—

‘किसी वस्तु को यदि कोई देश हमारे देश में आई उत्पादन लागत से सस्ती देने को तैयार है तो यह हमारा कर्तव्य है कि उसको वहीं से खरीदें. तथा अपने देश के श्रम एवं संसाधनों का नियोजन इस प्रकार करें कि वह अधिकाधिक कारगर हो सकें तथा हम उसका उपयुक्त लाभ उठा सकें.’

स्मिथ का कहना था कि समाज का गठन विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों, अनेक सौदागरों के बीच से होना चाहिए. बगैर किसी पारस्पिरिक लाभ अथवा कामना के होना चाहिए. उत्पादन की इच्छा ही उद्यमिता की मूल प्रेरणाशक्ति है. लेकिन उत्पादन के साथ लाभ की संभावना न हो, यदि कानून मदद करने के बजाय उसके रास्ते में अवरोधक बनकर खड़ा हो जाए, तो उसकी इच्छा मर भी सकती है. उस स्थिति में उस व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का ही नुकसान है. स्मिथ के अनुसार—

‘उपभोग का प्रत्यक्ष संबंध उत्पादन से है. कोई भी व्यक्ति इसलिए उत्पादन करता करता है, क्योंकि वह उत्पादन की इच्छा रखता है. इच्छा पूरी होने पर वह उत्पादन की प्रक्रिया से किनारा कर सकता है अथवा कुछ समय के लिए उत्पादन की प्रक्रिया को स्थगित भी कर सकता है. जिस समय कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकता से अधिक उत्पादन कर लेता है, उस समय अतिरिक्त उत्पादन को लेकर उसकी यही कामना होती है कि उसके द्वारा वह किसी अन्य व्यक्ति से, किसी और वस्तु की फेरबदल कर सके. यदि कोई व्यक्ति कामना तो किसी वस्तु की करता है तथा बनाता कुछ और है, तब उत्पादन को लेकर उसकी यही इच्छा हो सकती है कि वह उसका उन वस्तुओं के साथ विनिमय कर सके, जिनकी वह कामना करता है और उन्हें उससे भी अच्छी प्रकार से प्राप्त कर सके, जैसा वह उन्हें स्वयं बना सकता था.’

स्मिथ ने कार्य–विभाजन को पूर्णतः प्राकृतिक मानते हुआ उसका मुक्त स्वर में समर्थन किया है. यह उसकी वैज्ञानिक दृष्टि एवं दूरदर्शिता को दर्शाता है. उसके विचारों के आधार पर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मुक्त अर्थव्यवस्था को अपनाया. शताब्दियों बाद भी उसके विचारों की प्रासंगिकता यथावत बनी हुई है. औद्योगिक स्पर्धा में बने रहने के लिए चीन और रूस जैसे कट्टर साम्यवादी देश भी मुक्त अर्थव्यवस्था के समर्थक बने हुए हैं. उत्पादन के भिन्न–भिन्न पहलुओं का विश्लेषण करते हुए स्मिथ ने कहा कि उद्योगों की सफलता में मजदूर और कारीगर का योगदान भी कम नहीं होता. वे अपना श्रम–कौशल निवेश करके उत्पादन में सहायक बनते हैं.

स्मिथ का यह भी लिखा है ऐसे स्थान पर जहां उत्पादन की प्रवृत्ति को समझना कठिन हो, वहां पर मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक हो सकती हैं. इसलिए कि लोग, जब तक कि उन्हें अतिरिक्त रूप से कोई लाभ न हो, सीखना पसंद ही नहीं करेंगे. अतिरिक्त मजदूरी अथवा सामान्य से अधिक अर्जन की संभावना उन्हें नई प्रविधि अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं. इस प्रकार स्मिथ ने सहज मानववृत्ति के विशिष्ट लक्षणों की ओर संकेत किया है. इसी प्रकार ऐसे कार्य जहां व्यक्ति को स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल स्थितियों में कार्य करना पड़े अथवा असुरक्षित स्थानों पर चल रहे कारखानों में मजदूरी की दरें सामान्य से अधिक रखनी पड़ेंगी. नहीं तो लोग सुरक्षित और पसंदीदा ठिकानों की ओर मजदूरी के लिए भागते रहेंगे और वैसे कारखानों में प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव बना रहेगा.

स्मिथ ने तथ्यों का प्रत्येक स्थान पर बहुत ही संतुलित तथा तर्कसंगत ढंग से उपयोग किया है. अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रों की संपदा’ में वह स्पष्ट करता है कि कार्य की प्रवृत्ति के अंतर को वेतन के अंतर से संतुलित किया जा सकता है. उसके लेखन की एक विशेषता यह भी है कि वह बात को समझाने के लिए लंबे–लंबे वर्णन के बजाए तथ्यों एवं तर्कों का सहारा लेता है. उत्पादन–व्यवस्था के अंतरराष्ट्रीयकरण को लेकर भी स्मिथ के विचार आधुनिक अर्थचिंतन की कसौटी पर खरे उतरते हैं. इस संबंध में उसका मत था कि—

‘यदि कोई विदेशी मुल्क हमें किसी उपभोक्ता सामग्री को अपेक्षाकृत सस्ता उपलब्ध कराने को तैयार है तो उसे वहीं से मंगवाना उचित होगा. क्योंकि उसी के माध्यम से हमारे देश की कुछ उत्पादक शक्ति ऐसे कार्यों को संपन्न करने के काम आएगी जो कतिपय अधिक महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी हैं. इस व्यवस्था से अंततोगत्वा हमें लाभ ही होगा.’

विश्लेषण के दौरान स्मिथ की स्थापनाएं केवल पिनों की उत्पादन तकनीक के वर्णन अथवा एक कसाई तथा रिक्शाचालक के वेतन के अंतर को दर्शाने मात्र तक सीमित नहीं रहतीं. बल्कि उसके बहाने से वह राष्ट्रों के जटिल राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने का भी काम करता है. अर्थ–संबंधों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय रणनीति बनाने का चलन आजकल आम हो चला है. संपन्न औद्योगिक देश यह कार्य बड़ी कुशलता के साथ करते हैं. मगर उसके बीजतत्व स्मिथ के चिंतन में अठारहवीं शताब्दी से ही मौजूद हैं.

‘राष्ट्रों की संपदा’ शृंखला की चैथी पुस्तक में सन 1776 में स्मिथ ने ब्रिटिश सरकार से साफ–साफ कह दिया था कि उसकी अमेरिकन कालोनियों पर किया जाने व्यय, उनके अपने मूल्य से अधिक है. इसका कारण स्पष्ट करते हुए उसने कहा था कि ब्रिटिश राजशाही बहुत खर्चीली व्यवस्था है. उसने आंकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया था कि राजनीतिक नियंत्रण के स्थान पर एक साफ–सुथरी अर्थनीति, नियंत्रण के लिए अधिक कारगर व्यवस्था हो सकती है. वह आर्थिक मसलों से सरकार को दूर रखने का पक्षधर था. इस मामले में स्मिथ कतिपय आधुनिक अर्थनीतिकारों से कहीं आगे था. लेकिन यदि सबकुछ अर्थिक नीतियों के माध्यम से पूंजीपतियों अथवा उनके सहयोग से बनाई गई व्यवस्था द्वारा ही संपन्न होना है तब सरकार का क्या दायित्व है? अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए वह क्या कर सकती है?

इस संबंध में स्मिथ का एकदम स्पष्ट मत था कि सरकार पेटेंट कानून, कांट्रेक्ट, लाइसेंस एवं का॓पीराइट जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से अपना नियंत्रण बनाए रख सकती है. यही नहीं सरकार सार्वजनिक महत्त्व के कार्यों जैसे कि पुल, सड़क, विश्रामालय आदि बनाने का कार्य अपने नियंत्रण में रखकर जहां राष्ट्र की समृद्धि का लाभ जन–जन पहुंचा सकती है. प्राथमिकता के क्षेत्रों में, ऐसे क्षेत्रों में जहां उद्यमियों की काम करने की रुचि कम हो, विकास की गति बनाए रखकर सरकार अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकती है. पूंजीगत व्यवस्था के समर्थन में स्मिथ के विचार कई स्थान पर व्यावहारिक हैं तो कई बार वे अतिरेक की सीमाओं को पार करते हुए नजर आते हैं. वह सरकार को एक स्वयंभू सत्ता के बजाय एक पूरक व्यवस्था में बदल देने का समर्थक था. जिसका कार्य उत्पादकता में यथासंभव मदद करना है. उसका यह भी विचार था कि नागरिकों को सुविधाओं के उपयोग के अनुपात में निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना चाहिए. लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि स्मिथ सरकारों को अपने नागरिकों के कल्याण की जिम्मेदारी से पूर्णतः मुक्त कर देना चाहता था. उसका मानना था कि—

‘कोई भी समाज उस समय तक सुखी एवं समृद्ध नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसके सदस्यों का अधिकांश, गरीब, दुखी एवं अवसादग्रस्त हो.’

व्यापार और उत्पादन तकनीक के मामले में स्मिथ मुक्त स्पर्धा का समर्थक था. उसका मानना था कि अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में स्पर्धा का आगमन ‘प्राकृतिक नियम’ के अनुरूप होगा. स्मिथ का प्राकृतिक नियम निश्चित रूप से जंगल के उस कानून का ही विस्तार है, जिसमें जीवन की जिजीविषा संघर्ष को अनिवार्य बना देती है. स्मिथ के समय में सहकारिता की अवधारणा का जन्म नहीं हुआ था, समाजवाद का विचार भी लोकचेतना के विकास के गर्भ में ही था. उसने एक ओर तो उत्पादन को स्पर्धा से जोड़कर उसको अधिक से अधिक लाभकारी बनाने पर जोर दिया. दूसरी ओर उत्पादन और नैतिकता को परस्पर संबद्ध कर उत्पादन–व्यवस्था के चेहरे को मानवीय बनाए रखने का रास्ता दिखाया. हालांकि अधिकतम मुनाफे को ही अपना अभीष्ठ मानने वाला पूंजीपति बिना किसी स्वार्थ के नैतिकता का पालन क्यों करे, उसकी ऐसी बाध्यता क्योंकर हो? इस ओर उसने कोई संकेत नहीं किया है. तो भी स्मिथ के विचार अपने समय में सर्वाधिक मौलिक और प्रभावशाली रहे हैं.

स्मिथ ने आग्रहपूर्वक कहा था कि—

‘किसी भी सभ्य समाज में मनुष्य को दूसरों के समर्थन एवं सहयोग की आवश्यकता प्रतिक्षण पड़ती है. जबकि चंद मित्र बनाने के लिए मनुष्य को एक जीवन भी अपर्याप्त रह जाता है. प्राणियों में वयस्कता की ओर बढ़ता हुआ कोई जीव आमतौर पर अकेला और स्वतंत्र रहने का अभ्यस्त हो चुका होता है. दूसरों की मदद करना उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं होता. किंतु मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है. उसको अपने स्वार्थ के लिए हर समय अपने भाइयों एवं सगे–संबंधियों के कल्याण की चिंता लगी रहती है. जाहिर है मनुष्य अपने लिए भी यही अपेक्षा रखता है. क्योंकि उसके लिए केवर्ल शुभकामनाओं से काम चलाना असंभव ही है. वह अपने संबंधों को और भी प्रगाढ़ बनाने का कार्य करेगा, यदि वह उनकी सुख–लालसाओं में अपने लिए स्थान बना सके. वह यह भी जताने का प्रयास करेगा कि यह उनके अपने भी हित में है कि वे उन सभी कार्यों को अच्छी तरह अंजाम दें, जिनकी वह उनसे अपेक्षा रखता है. मनुष्य दूसरों के प्रति जो भी कर्तव्य निष्पादित करता है, वह एक तरह की सौदेबाजी ही है– यानी तुम मुझको वह दो जिसको मैं चाहता हूं, बदले में तुम्हें वह सब मिलेगा जिसकी तुम कामना करते हो. किसी को कुछ देने का यही सिद्धांत है, यही एक रास्ता है, जिससे हमारे सामाजिक संबंध विस्तार पाते हैं और जिनके सहारे यह संसार चलता है. हमारा भोजन किसी कसाई, शराब खींचनेवाले या तंदूरवाले की दयालुता की सौगात नहीं है. यह उनके निहित लाभ के लिए, स्वयं के लिए किए गए कार्य का प्रतिफल है.’

इस प्रकार हम देखते हैं कि एडम स्मिथ के अर्थनीति संबंधी विचार न केवल व्यावहारिक, मौलिक और दूरदर्शितापूर्ण हैं; बल्कि आज भी अपनी प्रासंकगिता को पूर्ववत बनाए हुए हैं. शायद यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि वे पहले की अपेक्षा आज कहीं अधिक प्रासंगिक हैं. उसकी विचारधारा में हमें कहीं भी विचारों के भटकाव अथवा असंमजस के भाव नहीं दिखते. स्मिथ को भी मान्यताओं पर पूरा विश्वास था, यही कारण है कि वह अपने तर्क के समर्थन में अनेक तथ्य जुटा सका. यही कारण है कि आगे आने वाले अर्थशास्त्रियों को जितना प्रभावित स्मिथ ने किया; उस दौर का कोई अन्य अर्थशास्त्री वैसा नहीं कर पाया.

हालांकि अपने विचारों के लिए एडम स्मिथ को लोगों की आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा. कुछ विद्वानों का विचार है कि उसके विचार एंडरर्स चांडिनिअस(Anders Chydenius) की पुस्तक ‘दि नेशनल गेन (The National Gain, 1765) तथा डेविड ह्यूम आदि से प्रभावित हैं. कुछ विद्वानों ने उसपर अराजक पूंजीवाद को बढ़ावा देने के आरोप भी लगाए हैं. मगर किसी भी विद्वान के विचारों का आकलन उसकी समग्रता में करना ही न्यायसंगत होता है. स्मिथ के विचारों का आकलन करने वाले विद्वान अकसर औद्योगिक उत्पादन संबंधी विचारों तक ही सिमटकर रह जाते हैं, वे भूल जाते हैं कि स्मिथ की उत्पादन संबंधी विचारों में सरकार और नागरिकों के कर्तव्य भी सम्मिलित हैं. जो भी हो, उसकी वैचारिक प्रखरता का प्रशंसा उसके तीव्र विरोधियों ने भी की है. दुनिया के अनेक विद्वान, शोधार्थी आज भी उसके आर्थिक सिद्धांतों का विश्लेषण करने में लगे हैं. एक विद्वान के विचारों की प्रासंगिकता यदि शताब्दियों बाद भी बनी रहे तो यह निश्चय ही उसकी महानता का प्रतीक है. जबकि स्मिथ ने तो विद्वानों की पीढ़ियों को न केवल प्रभावित किया, बल्कि अर्थशास्त्रियों की कई पीढ़ियां तैयार भी की हैं.

कंपनी राज

कंपनी राज का अर्थ है ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा भारत पर शासन। यह 1773 में शुरू किया है, जब कंपनी नेकोलकाता में एक राजधानी की स्थापना की है, अपनी पहली गवर्नर जनरल वार्रन हास्टिंग्स नियुक्त किया और संधि का एक परिणाम के रूप में 1764 बक्सर का युद्ध के बाद सीधे प्रशासन, में शामिल हो गया है लिया जाता है। 1765 में, जब बंगाल के नवाब कंपनी से हार गया था, और दीवानी प्रदान की गई थी, या बंगाल और बिहार में राजस्व एकत्रित करने का अधिकार हैशा सन १८५८ से,१८५७ जब तक चला और फलस्वरूप भारत सरकार के अधिनियम १८५८ के भारतीय विद्रोह के बाद, ब्रिटिश सरकार सीधे नए ब्रिटिश राज में भारत के प्रशासन के कार्य ग्रहण किया।

कार्ल मार्क्स

कार्ल मार्क्स (1818 - 1883) जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार, समाजशास्त्री, पत्रकार और वैज्ञानिक समाजवाद के प्रणेता थे। इनका पूरा नाम कार्ल हेनरिख मार्क्स इनका जन्म 5 मई 1818 को त्रेवेस (प्रशा) के एक यहूदी परिवार में हुआ। 1824 में इनके परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। 17 वर्ष की अवस्था में मार्क्स ने कानून का अध्ययन करने के लिए बॉन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। तत्पश्चात्‌ उन्होंने बर्लिन और जेना विश्वविद्यालयों में साहित्य, इतिहास और दर्शन का अध्ययन किया। इसी काल में वह हीगेल के दर्शन से बहुत प्रभावित हुए। 1839-41 में उन्होंने दिमॉक्रितस और एपीक्यूरस के प्राकृतिक दर्शन पर शोध-प्रबंध लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

शिक्षा समाप्त करने के पश्चात्‌ 1842 में मार्क्स उसी वर्ष कोलोन से प्रकाशित 'राइनिशे जीतुंग' पत्र में पहले लेखक और तत्पश्चात्‌ संपादक के रूप में सम्मिलित हुआ किंतु सर्वहारा क्रांति के विचारों के प्रतिपादन और प्रसार करने के कारण 15 महीने बाद ही 1843 में उस पत्र का प्रकाशन बंद करवा दिया गया। मार्क्स पेरिस चला गया, वहाँ उसने 'द्यूस फ्रांजोसिश' जारबूशर पत्र में हीगेल के नैतिक दर्शन पर अनेक लेख लिखे। 1845 में वह फ्रांस से निष्कासित होकर ब्रूसेल्स चला गये और वहीं उसने जर्मनी के मजदूर सगंठन और 'कम्युनिस्ट लीग' के निर्माण में सक्रिय योग दिया। 1847 में एजेंल्स के साथ 'अंतराष्ट्रीय समाजवाद' का प्रथम घोषणापत्र (कम्युनिस्ट मॉनिफेस्टो) प्रकाशित किया

1848 में मार्क्स ने पुन: कोलोन में 'नेवे राइनिशे जीतुंग' का संपादन प्रारंभ किया और उसके माध्यम से जर्मनी को समाजवादी क्रांति का संदेश देना आरंभ किया। 1849 में इसी अपराघ में वह प्रशा से निष्कासित हुआ। वह पेरिस होते हुए लंदन चला गया जीवन पर्यंत वहीं रहा। लंदन में सबसे पहले उसने 'कम्युनिस्ट लीग' की स्थापना का प्रयास किया, किंतु उसमें फूट पड़ गई। अंत में मार्क्स को उसे भंग कर देना पड़ा। उसका 'नेवे राइनिश जीतुंग' भी केवल छह अंको में निकल कर बंद हो गया।

1859 में मार्क्स ने अपने अर्थशास्त्रीय अध्ययन के निष्कर्ष 'जुर क्रिटिक दर पोलिटिशेन एकानामी' नामक पुस्तक में प्रकाशित किये। यह पुस्तक मार्क्स की उस बृहत्तर योजना का एक भाग थी, जो उसने संपुर्ण राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखने के लिए बनाई थी। किंतु कुछ ही दिनो में उसे लगा कि उपलब्ध साम्रगी उसकी योजना में पूर्ण रूपेण सहायक नहीं हो सकती। अत: उसने अपनी योजना में परिवर्तन करके नए सिरे से लिखना आंरभ किया और उसका प्रथम भाग 1867 में दास कैपिटल (द कैपिटल, हिंदी में पूंजी शीर्षक से प्रगति प्रकाशन मास्‍को से चार भागों में) के नाम से प्रकाशित किया। 'द कैपिटल' के शेष भाग मार्क्स की मृत्यु के बाद एंजेल्स ने संपादित करके प्रकाशित किए। 'वर्गसंघर्ष' का सिद्धांत मार्क्स के 'वैज्ञानिक समाजवाद' का मेरूदंड है। इसका विस्तार करते हुए उसने इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या और बेशी मूल्य (सरप्लस वैल्यू) के सिद्धांत की स्थापनाएँ कीं। मार्क्स के सारे आर्थिक और राजनीतिक निष्कर्ष इन्हीं स्थापनाओं पर आधारित हैं।

1864 में लंदन में 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' की स्थापना में मार्क्स ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघ की सभी घोषणाएँ, नीतिश् और कार्यक्रम मार्क्स द्वारा ही तैयार किये जाते थे। कोई एक वर्ष तक संघ का कार्य सुचारू रूप से चलता रहा, किंतु बाकुनिन के अराजकतावादी आंदोलन, फ्रांसीसी जर्मन युद्ध और पेरिस कम्यूनों के चलते 'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो गया। किंतु उसकी प्रवृति और चेतना अनेक देशों में समाजवादी और श्रमिक पार्टियों के अस्तित्व के कारण कायम रही।

'अंतरराष्ट्रीय मजदूर संघ' भंग हो जाने पर मार्क्स ने पुन: लेखनी उठाई। किंतु निरंतर अस्वस्थता के कारण उसके शोधकार्य में अनेक बाधाएँ आईं। मार्च 14, 1883 को मार्क्स के तूफानी जीवन की कहानी समाप्त हो गई। मार्क्स का प्राय: सारा जीवन भयानक आर्थिक संकटों के बीच व्यतीत हुआ। उसकी छह संतानो में तीन कन्याएँ ही जीवित रहीं।

चिरसम्मत अर्थशास्त्र

चिरसम्मत अर्थशास्त्र (क्लासिकल इकनीमिक्स) या चिरसम्मत राजनीतिक अर्थशात्र आर्थिक चिन्तन की वह परम्परा है जिसका विकास मुख्यतः इंग्लैण्ड में १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर १९वीं शताब्दी के मध्यकाल तक हुआ। इसके मुख्य विचारकों में आदम स्मिथ, जे बी से (Jean-Baptiste Say), डेविड रिकार्डो, थॉमस रॉबर्ट माल्थस, तथा जॉन स्टूवर्ट मिल थे। इन अर्थशास्त्रियों ने बाजारवादी अर्थस्त्र का जो आर्थिक सिद्धान्त दिया वह मुख्यतः स्व-नियमित प्रणाली (self-regulating systems) है जो उत्पादन तथा विनिमय के प्राकृतिक नियमों से शासित होता है। आदम स्मिथ ने इसी को 'अदृष्य हाथ' कहा था।

आदम स्मिथ द्वारा १७७६ में रचित द वेल्थ ऑफ नेशन्स को प्रायः चिरसम्मत अर्थशास्त्र का आरम्भ बिन्दु माना जाता है। इस पुस्तक में स्मिथ ने जो बात कही थी उसका सार यही था कि किसी भी देश की समृद्धि का निर्धारण इस बात से नहीं होती कि उस देश के पास कितना स्वर्ण जमा है बल्कि इस बात से होती है कि उस देश की राष्ट्रीय आय कितनी अधिक है।

जेम्स मिल

जेम्स मिल (1773-1836) स्कॉटलैण्ड के इतिहासकार, राजनीतिज्ञ, दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक थे। डेविड रिकार्डो के साथ उन्हें क्लासिकल अर्थशास्त्र का जनक माना जाता है। वे जॉन स्टूवर्ट मिल के पिता थे।

तुलनात्मक सुलाभ

तुलनात्मक सुलाभ (comparative advantage) की संकल्पना के अनुसार, कुछ व्यक्ति, फर्म या राष्ट्र अन्य व्यक्तियों, फर्मों या राष्ट्रों की अपेक्षा कम मूल्य में उत्पादित कर सकते हैं। तुलनात्मक सुलाभ का सिद्धान्त (principle of comparative advantage) अन्तरराष्ट्रीय व्यापार की मूलभूत संकल्पना है जो कहती है कि राष्ट्र उन वस्तुओं के निर्माण और निर्यात में विशिष्टता प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते हैं जिनको वे अन्य की अपेक्षा कम मूल्य पर उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं, तथा उन वस्तुओं का आयात करते हैं जिनका उत्पादन वे दूसरों की अपेक्षा अधिक मूल्य पर ही कर सकते हैं

तुलनात्मक सुलाभ का सिद्धान्त, अंग्रेज अर्थशास्त्री डेविड रिकार्डो (David Ricardo) ने १८१७ में अपनी पुस्तक ' Principles of Political Economy and Taxation' में प्रतिपादित किया था। यह सिद्धान्त आदम स्मिथ के निरपेक्ष मूल्य सुलाभ (absolute cost advantage) सिद्धान्त का विस्तार या संशोधन कहा जा सकता है।

भीमराव आम्बेडकर

भीमराव रामजी आम्बेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956), डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर नाम से लोकप्रिय, भारतीय बहुज्ञ, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, और समाजसुधारक थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों (दलितों) से सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया था। श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन भी किया था। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माता थे।आम्बेडकर विपुल प्रतिभा के छात्र थे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त कीं तथा विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में शोध कार्य भी किये थे। व्यावसायिक जीवन के आरम्भिक भाग में ये अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की तथा बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक बीता। तब आम्बेडकर भारत की स्वतन्त्रता के लिए प्रचार और चर्चाओं में शामिल हो गए और पत्रिकाओं को प्रकाशित करने, राजनीतिक अधिकारों की वकालत करने और दलितों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत और भारत के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। १४ अप्रैल को उनका जन्म दिवस आम्बेडकर जयंती एक तौहार के रूप में भारत समेत दुनिया भर में मनाया जाता है। आम्बेडकर की विरासत में लोकप्रिय संस्कृति में कई स्मारक और चित्रण शामिल हैं।

समष्टि अर्थशास्त्र
व्यष्टि अर्थशास्त्र
उपविषय
मैथॉडोलॉजीस
अर्थशास्त्र का इतिहास
विख्यात
अर्थशास्त्री

अन्य भाषाओं में

This page is based on a Wikipedia article written by authors (here).
Text is available under the CC BY-SA 3.0 license; additional terms may apply.
Images, videos and audio are available under their respective licenses.