भोजपुरी संस्कृति

भोजपुरी संस्कृति के ही भोजपुरिया संस्कृति भी कहल जाला| भोजपुरी के अन्य भाषा से संबंध के बारे में कहल जाला -

मैथिल के बहिन लागे अवधी के भाई |

अंगरेजी के बाप लगे संस्कृत के माई||

प्रकृति के जन्मल बेटी पिए गंगा के पानी |

सहज सुशील बिनम्र दुअर्थी एह भाषा के पहिचानि||

भोजपुरी संस्कृति के इतिहास

भोजपुरी संस्कृति के इतिहास अशोक महान से भी पुरान ह अशोक महान के पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य रहे उनकर राजकाल ईसापूर्व 273 से 232 तक रहे प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती राजा रहले उनका समय में मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश के श्रेणि से ले के दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण आ मैसूर पूर्व में बंगाल से पश्चिम में अफ़गानिस्तान तक पहुँच गईल रहे । एह समय के उ बहुत प्रतापी राजा रहन। बिहार के प्राचीन नाम ’विहार’ रहे , जिसका मतलब मठ होला । यी भारत के पूर्वी भाग में स्थित बा क्षेत्रफल के हिसाब से बिहार भारत का बारहवां सबसे बड़ा और आबादी के मान से तीसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य ह। बंगाल के क्षेत्र में पहुंचने से पहले गंगा नदी एहि राज्य से बहेली जेकरा कारन यी राज्य वनस्पति आ जीव-जन्तु से समृद्ध बा। बिहार के वन क्षेत्र भी विशाल बा जवन कि 6,764 वर्ग किमी के बा यी राज्य भाषाई तौर पर प्रभावकारी बा एहिजा कई भाषा बाडिस जवना में भोजपुरी प्रधान भाषा मानल जाला, बिहार की राजधानी पटना ह, जेकर नाम पहले पाटलीपुत्र रहे । भारत के कुछ महान राजा जैसे समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त मौर्य, विेक्रमादित्य और अशोक के शासन में बिहार शक्ति, संस्कृति और शिक्षा क केन्द्र बन गईल रहे यह समय दुगो महान शिक्षा केन्द्र रहन , विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय। बिहार में आज भी 3,500 साल पुरान इतिहास के गवाही देत कई प्राचीन स्मारक मौजूद बाड़िस

अन्य संस्कृति से भिन्नता

भोजपुरी संस्कृति के अन्य संस्कृति से भिन्न पवित्र आ मानवता के नजदीक होखे के कुछ प्राकृतिक अउर दैविक कारन भी बा संस्कृत भाषा के एक रचना जवना के उत्तरी संस्करण में सिंहासनद्वात्रिंशति तथा "विक्रमचरित के नाम से दक्षिणी संस्करण में उपलब्ध बा एकर संस्कर्ता एक मुनि जी रहन जिनकर नाम क्षेभेन्द्र रहे बंगाल में वररुचि जी के द्वारा प्रस्तुत संस्करण भी एहि के समरुप मानल जाला एकर दक्षिणी रुप ज्यादा लोकप्रिय भइल लोक भाषा में एकर अनुवाद होते रहे अउर पौराणिक कथा नियन भारतीय समाज में मौखिक परम्परा के रुप में रच-बस गइलस यी कथा के रचना "वेतालपञ्चविंशति" या "बेताल पच्चीसी" के बाद भइल लेकिन निश्चित रुप से रचनाकाल के बारे में कुछ नईखे कहल जा सकत। एतना लगभग तय बा कि एकर रचना धारा के राजा भोज के समय में ना भइल होई काहेकि प्रत्येक कथा में राजा भोज के उल्लेख मिलेला यह से एकर रचना काल 11वीं शताब्दी के बाद भइल होई । एकरा के द्वात्रींशत्पुत्तलिका के नाम से भी जानल जाला ।

लोक कथा

एह कथा के भूमिका में भी कथा बा जवन राजा भोज की कथा कहेलिस 32 कथा 32 पुतलि के मुह से कहल बा जवन एक सिंहासन में लागल बाडीस। यी सिंहासन राजा भोज के विचित्र परिस्थिति में मिलल। एक दिन राजा भोज के मालूम भइल कि एक साधारण चरवाहा अपना न्यायप्रियता खाती मसहूर बा , जबकि उ बिल्कुल अनपढ़ बा तथा पुश्तैनी रुप से उनके राज्य के कुम्हार के गायी, भैंस बकरि चरावेला । जब राजा भोज तहक़ीक़ात करवले त पता चला कि उ चरवाहा सब फैसला एगो छोट पहाड़ पर चढ़ के करेला राजा भोज के जिज्ञासा बढ़ गईल तब उ भेष बदल के वोह चरवाहा के पास गईले ओकरा के कठिन समस्या के समाधान करत देख राजा दंग रह गईले वो चरवाहा के नाम चन्द्रभान रहे। राजा के पुछला पर चन्द्रभान एक दिब्य शक्ति के बारे में राजा के बतवलस की उ शक्ति एहि टीला पर हमरा आवेली आ हमरा के उचित न्याय करे में मदत करेली। जब राजा वोह जगह के खोदवावले तब उनका एक सिंघासन मिलल। राजा पंडित लोग के बोला के सिंघासन पर बैठे के मुहूर्त निकलवले आ जब मुहूर्त के दिन सिंघासन पर बैठे चलले तब सिंघासन में लागल सोना के बत्तीस पुतरी ठठा के हंस देली स। जब राजा पुतरी से हँसे के कारन पुछले तब पुतरी कहे लगलि स ये राजन यी सिंघासन त राजा बिक्रमादित्य के ह एकरा प तू तबे बईठीह जब तू राजा बिक्रमादित्य नियन होइह तब राजा पुछले की राजा बिक्रमादित्य में का खासियत रहे एह सवाल के जबाब में बिक्रमादित्य के बत्तीस गो पुतली 32 गो काथा सुनवलिस एहि 32 कथा के आधार पर राजा भोज के एगो सभ्य संस्कृति के ज्ञान भइल जेकरा के उ भोजपुरी संस्कृति के नाम से परम प्रतापी राजा बिकमादित्य के दिब्य अंश के रूप में लोक कल्याण खाती छोड़ गईल बाड़े राजा बिक्रमादित्य के समय से ही काल गड़ना चलल जेकरा के विक्रम सम्बत कहल जाला हिन्दू आर्य के संस्कृति भी ईहे ह जवन आज भी भोजपुरी संस्कृति के नाम से जानल जाले

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश या यूपी भारत क सभसे ढेर जनसंख्या वाला राज्य आ दुनिया में सभसे ढेर जनसंख्या वाला देस-उपबिभाग बाटे। भारतीय उपमहादीप के उत्तरी-बिचला इलाक में पड़े वाला एह राज्य के कुल आबादी लगभग 200 मिलियन (2 अरब) बाटे। लखनऊ एह राज्य के राजधानी हवे।

ब्रिटिश शासन के दौरान 1 अप्रैल 1937 के यूनाइटेड प्रोविंस के नाँव से ई प्रदेश के रूप में बनावल गइल आ आजादी के बाद 1950 में एकर नाँव बदल के उत्तर प्रदेश रखाइल। 9 नवंबर 2000 के एह राज्य से उत्तरी पहाड़ी इलाका के अलग क के उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) राज्य बनल। वर्तमान में, प्रशासन खातिर ई अठारह गो मंडल आ 75 जिला में बिभाजित कइल गइल बा।

भूगोलीय रूप से ई राज्य गंगा के मैदान के सपाट हिस्सा में स्थित बा आ इहाँ उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु पावल जाले। राज्य के पछिम ओर राजस्थान; उत्तर-पच्छिम में हरियाणा, दिल्ली आ हिमाचल प्रदेश; उत्तर में उत्तराखंड आ नेपाल; पूरुब ओर बिहार आ दक्खिन ओर मध्य प्रदेश बाड़ें; जबकि एकदम दक्खिन-पूरुब के छोर पर एकर कुछ सीमा झारखंड आ छत्तीसगढ़ के साथ भी सटल बा। कुल 243,290 बर्ग किलोमीटर (93,933 बर्गमील) रकबा वाला ई राज्य भारत के 7.33% भाग हवे आ चउथा सबसे बड़ राज्य भी हवे।

अर्थब्यवस्था के आकार के मामिला में ई भारत के तीसरा सभसे बड़ राज्य बा जहाँ जीडीपी ₹9,763 बिलियन (US$150 बिलियन) बाटे। खेती आ सर्विस क्षेत्र प्रमुख आर्थिक कामकाज बाड़ें; सर्विस सेक्टर में परिवहन, पर्यटन, होटल, अचल संपत्ति, इंशोरेंस आ फाइनेंस संबंधी चीज सामिल बाटे। गाजियाबाद, बुलंदशहर, कानपुर, गोरखपुर, इलाहाबाद, भदोही, रायबरेली, मुरादाबाद, बरेली, अलीगढ़, सोनभद्र, आ बनारस एह राज्य में औद्योगिक रूप से महत्व वाला शहर बाने।

प्राचीन आ मध्य्कालीन दौर में उत्तर प्रदेश ताकतवर राज सभ के भूमि रहल बा। इहाँ प्राकृतिक आ इतिहासी पर्यटन के कई जगह बा जइसे की आगरा, बनारस, कौशांबी, बलियाँ, श्रावस्ती, गोरखपुर, कुशीनगर, लखनऊ, इलाहाबाद इत्यादि। धार्मिक रूप से हिंदू धर्म के सबसे प्रमुख शाखा वैष्णव मत के दू गो अवतार राम आ कृष्ण एही राज्य में पैदा भइल बतावल जालें आ अजोध्या आ मथुरा प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थ हवें। गंगा के तीरे बसल बनारस आ गंगा आ यमुना नदी के संगम पर मौजूद इलाहाबाद के हिंदू धरम में बहुत महत्व बा। दूर उत्तर-पूरुब कोना पर मौजूद गोरखपुर नाथ सम्प्रदाय के संस्थापक गोरखनाथ के भूमि मानल जाले।

ओखरी आ मूसर

ओखर आ मूसर धातु, पत्थर या लकड़ी से बनल एक प्रकार के गहिर पात्र (बर्तन) ह, जेमे पदार्थ के डाल के कूट के तोड़ल या पिसल जाला। अक्सर छोट ओखरी जेमे जड़ी-बूटी या मशाला वगैरह कुटल जाला भोजपुरी में खल कहल जाला।

भोजपुरी संस्कृति में ओखर आ मूसर शब्द के प्रयोग द्विअर्थी रूप में भी सुनल जाला, जवन अक्सर भोजपुरी गाना में सुनल जा सकत बा। कुछ भोजपुरी गाना के बोल:

भतार मूसर डाल, ओखर कुटी...

राजा जी कलपता ओखर मूसर के बिना...

ओखर में मूसर छटके...

कजरी

कजरी एक तरह क भोजपुरी लोकगीत हवे। ई सावन की महीना के गीत ह जेकरा के बिटिया-मेहरारू कुल झुलुआ खेलत समय गावेलीं। कजरी गा-गा के झुलुआ खेलला के "कजरी खेलल" कहल जाला। ई उत्तर प्रदेश आ बिहार के एगो प्रमुख लोक गीत ह। भोजपुरी के अलावा ई गीत मैथिली आ मगही में भी गावल जाला हालाँकि, कजरी के मुख्य क्षेत्र भोजपुरी इलाका ह आ एहू में बनारस आ मिर्जापुर के एकर मुख्य क्षेत्र मानल जाला।कुछ बिद्वान लोग कजरी के उत्पत्ति बनारस मिर्जापुर के इलाका में होखे वाली शक्ति पूजा भा गौरी पूजा से जोड़े ला जबकि कुछ वैष्णव लोग एकरा के कृष्ण के पूजा आ लावनी से जोड़े ला; मिर्जापुर के परंपरागत लोक कलाकार लोग एकरा के बिंध्यवासिनी देवी के देन माने ला।

कोहबर

कोहबर (कौतुकगृह, कोष्ठवर) उत्तरी-मध्य भारत, मने कि उत्तर प्रदेश आ बिहार के अवध, भोजपुरी क्षेत्र आ मिथिला क्षेत्र, अउरी एह से सटल नेपाल के तराई क्षेत्र (जनकपुर अंचल) में चलनसार सांस्कृतिक चित्रकारी के एगो बिधा हऽ।बियाह के समय, घर के कवनो एगो कोठरी में पुरबी भीत प्रदेश पर गोबर से लीप के, पीसल हरदी (ऐपन) आ पिसल चाउर (चउरठ) से चित्रकारी कइल जाला; एकरे ठीक नीचे जमीन पर गोबर से लीप के बिबिध पूजन सामग्री रखल जालीं। लइका आ लइकी दुनों के घर में, बियाह के रसम सभ में से एक कार्यक्रम कोहबर पुजाई होला जेहमें भीत पर बनल एह कोहबर के पूजल जाला। कोहबर पुजाई के समय गावल जाये वाला गीत कोहबर गीत कहालें आ इनहन में दुलहा-दुलहिन के बीच परेम-भाव बढ़ावे के भाव होला। कोहबर घर के ओह कोठरियो के कहल जाला जहाँ ई चित्र बनावल गइल होला। दुलहिन के बिदाई के बाद ससुरें आवे पर उतार के एही कोहबर में ले जाइल जाला।

गीत गवाई

गीत गवाई भोजपुरी क्षेत्र के एक ठो रेवाज हवे जे बियाह से पहिले होला। एह में औरत लोग एकट्ठा हो के गीति गावे लीं।

मॉरिशस में भोजपुरी भाषा बोले वाला लोग खातिर भी एह परंपरा के बहुत महत्व हवे आ ई रेवाज ओहूजा खूब धूमधाम से संपन्न होला।

साल 2016 में यूनेस्को द्वारा मॉरीशस के एह रिवाज के "मानवता के अटोव सांस्कृतिक धरोहर के लिस्ट" (लिस्ट ऑफ दि इनटैलेजिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ ह्यूमनिटी) में शामिल कइल गइल। गीत गवाई, मॉरिशस में सरकारी तौर पर भी आयोजित हो चुकल बाटे।

चइता

चइता या चैता भारत के उत्तर प्रदेश आ बिहार में भोजपुरी क्षेत्र के एक ठो लोकगीत शैली हवे। ई गीत चइत के महीना में गावल जालें। कई जगह पर चैता उत्सव के आयोजन भी कइल जाला। मिथिला क्षेत्र में एकरा के चैती कहल जाला। एही चैता आ चैती से मिलत जुलत धुन घाँटो के भी होला जे एक ठो गीत शैली भी हवे आ तिहुआर भी।

चइता, चइत महीना के गीत हवें आ फागुन के फगुआ खतम होते चइता सुरू हो जाला।

छठ

छठ पूजा भा छठ परब भोजपुरी, मिथिला, मगध आ मधेस इलाका के प्रमुख परब हवे। ई सुरुज के पूजा के तिहुआर हऽ आ मुख्य रूप से हिंदू औरत लोग मनावे ला। मुख्य तिथी कातिक महीना के अँजोर के छठईं तिथी हवे, एकरे दू दिन पहिले से ले के अगिला दिन ले ई तिहुआर मनावल जाला। कातिक के छठ मुख्य हवे जेकरा के डाला छठ भी कहल जाला। एकरे अलावे, चइत के महीना में भी छठ मनावल जाले जेकरा के चइती छठ कहल जाला।

नाहन, बरत आ अरघा दिहल एह पूजा के मुख्य कार्यक्रम होला। जघह के हिसाब से, पानी के कवनों अस्थान, नद्दी-पोखरा के घाट पर मुख्य पूजा आ अरघा संपन्न होला। बिसेस परसाद के रूप में कई किसिम के फल आ खास तरीका से बनावल पकवान ठेकुआ होला जेकरा के माटी के चूल्हा पर पकावल जाला। नया सूप आ डाली में बिबिध किसिम के फल रख के घाट पर ले जाइल जाला। ओहिजा, ई सब सामग्री माटी के बेदी पर सजावल जाले, दिया अगरबत्ती बारल जाला आ कर्हियाइ भर पानी में ऊखि गाड़ल जाला जेह पर साड़ी चढ़ावल जाले। मेहरारू लोग पानी में खड़ा हो के डूबत सुरुज के पहिला अर्घा आ अगिला दिने फिर दोबारा ओही जे जा के उगत सुरुज के अरघा देला लो।

भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वांचल आ नेपाल के मधेस इलाका में, आ जहाँ-जहाँ एह क्षेत्र के लोग पहुँचल बा, धूमधाम से मनावल जाला। बिहार, झारखंड आ पूरबी उतर प्रदेश अउरी नेपाल के मधेस एह परब के मुख्य इलाका हवे। एह क्षेत्र में ई तिहुआर बहुत धूमधाम से मनावल जाला आ नदी किनारे घाट सभ पर एकरे खाती बिसेस तइयारी होले। एह मुख्य इलाका के अलावा, बंगाल, आसाम, दिल्ली, मुंबई, बंगलौर आ बाकी पूरा भारत में जहाँ-जहाँ एक क्षेत्र के लोग निवास करत बा, परंपरागत रूप से ई परब मनावे ला। भारत आ नेपाल के अलावा अउरी कई देसन में एह तिहुआर के मनावल जाला।

जाँता

जाँता या हस्तचक्की या चक्की पत्थर से बनल एक प्रकार के चक्की ह, जवन दुगो गोल (वृताकार) पत्थर के एक दूसरा के ऊपर रख के बनल होखेला, नीचे वाली पत्थर के केंद्र बिंदु पर एगो डंडा लगावल होखेला। ऊपर वाली पत्थर पर केंद्र में एगो छेद होखेला जेसे होके नीचे वाली पत्थर पर लागल डंडा बाहर आइल रहेला। ऊपर वाली पत्थर के केंद्र के छेद से तनिक साइड में एगो दूसर छेद होखेला, जहाँ से अनाज के जाँता में डालल जाला। ऊपर वाली पत्थर पर किनारे के तरफ एगो डंडा लागल रहेला, जे के पकड़ के ऊपर वाली पत्थर के घुमावल जाला।

भारतीय सभ्यता आ भोजपुरी संस्कृति में जाँता के बहुत महत्व बा। ई के प्रयोग प्राचीन काल से होत चलल आइल बा। आज भी कुछ घर में जाँता देखल जा सकत बा।

जिउतिया

जिउतिया या जितिया एक ठो हिंदू तेहवार बाटे जे भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार में आ नेपाल देस में मनावल जाला। एह तेहवार में औरत लोग बिना अन्न पानी के भुक्खे लीं।

अवधि आ भोजपुरी संस्कृति ब्रत,तिउहार के धनि संस्कृति मानल जालिस। एहि संस्कृति में पुत्र के लम्बा आयु खाती कुआर अँधरिया के अष्टमी तिथि भा कुआर शुदी अष्टमी तिथि के मेहरारू लोग के द्वारा कइल जाएवला बहुत कठिन तिउहार ह जिउतिया । एह तिउहार में खर तक मुंह में ना लगावल जाये के कारन एकरा के खर -जिउतिया भी कहल जाला। भोजपुरी में जब केहु के कवनो बड़ दुर्धटना से जब जान बाँची जाला तब ई कहल जाला की फलाना के माई खर-जिउतिया कइले होइन्हे एहि से उनकर जान बाँचल। भोजपुरी संस्कृति में ई तिउहार कुआर अँधरिया के अष्टमी तिथि के दिन आ अवधी संस्कृति में यी तिउहार कुआर शुदी अष्टमी तिथि के दिन मनावल जाला| ई तिउहार हिंदी भाषा में "जीवित्पुत्रिका" के नाम से जानल जाला।

फगुआ

फगुआ भोजपुरी इलाका में फागुन के महीना में, होली के मौसम में, गावल जाये वाला लोकगीत हवे। जाड़ा के बाद बसंत के आगमन के उछाह आ होली मनावे के तय्यारी फगुआ के गीतन से पता चले ला। बसंत पंचिमी के सम्मत गड़ा जाला आ एही दिन से फगुआ गवाये लागे ला जे लगभग चालीस दिन चले ला, होली के दिन ले।कुछ अन्य क्षेत्रन में एकरा के फाग भी कहल जाला। होरी आ रसिया गीत भी एही से मिलत जुलत भावना के गीत होलें।

एक ठो खास अर्थ में, झुंड में फगुआ गावत समय अगर केहू कौनों भुलाइल फगुआ के गीत इयाद क के कढ़ा देला त ओकर फगुआ साथी लोग पर चढ़ गइल अइसन कहल जाला, एह तरह के उधारी के दूसर अइसने फगुआ सुना के उतारल जाला, जेकरा के फगुआ दिहल कहल जाला।फगुआ के गीत अक्सर शृंगार रस के या भक्ति के गीत होलें जेह में राधा-कृष्ण, राम-सीता या शिव पार्वती के बर्णन होला।फागुन में फगुआ मनावे के उल्लेख साहित्य में भी कई जगह मिले ला।फगुआ मनावे के रिवाज भोजपुरी इलाका ले सीमित नइखे, भोजपुरी भाषा बोले वाला लोग जहाँ दूसरा देस जा के बस गइल उहाँ भी एकर महत्व बाटे।फागुन आ होली के मौसम में फगुआ के महत्व अब घटत जात बा।

बिआह

बियाह एगो संस्कार हवे जेवना में लड़िका आ लड़की के सामजिक रूप से एक संघे पति-पत्नी की तरे रहे आ जीवन बितावे खातिर एक-दूसरा द्वारा चुनल आ सर्ब समाज द्वारा एके मान्यता दिहल जाला।

जब लईका आ लईकी एक दूसरा के, समाज क़ानून या रीती रिवाज के साक्षी राखी, के एक दोसरा के आपन जीवन साथी बनावेले बिआह कहल जाला। बिआह हिंदी भाषा के " बिबाह " शब्द के अपभ्रंस रूप ह। भोजपुरी भाषा के ई देशज शब्द के श्रेणी में आवेला। उर्दू के निकाह शब्द के मतलब बिआह ना होला। इस्लाम सभ्यता में बिआह ना होला। एह संस्कृति में बंस बढ़ावे खाती चाहे मानव के मूल जरूरत मैथुन के पूर्ति खाती मेहर (धन) देके कनिया कीनल जाला। एगो पुरुष क्ईओगो कनिया किन सकता एकर इस्लाम सभ्यता में आजादी बा।

बिरहा

बिरहा एक किसिम के लोकगीत हवे जे उत्तर भारत के भोजपुरी क्षेत्र आ अवधी भाषी इलाका में प्रमुख रूप से गावल जाला, हालाँकि एकर बिस्तार मध्य प्रदेश के बघेलखंड आ उत्तरी छतीसगढ़ में भी मिले ला। एकरे आलावा भोजपुरी लोग जहाँ जहाँ गइल बा ओहिजा भी ई सुने के मिल सके ला। मूल रूप से ई अहिर लोग के गीत मानल जाला। हालाँकि, वर्तमान में एकरा गावे वाला लोग अहिरे होखे अइसन कौनों पाबंदी ना बा।

भुरुकुआ

मुख्य लेख शुक्र ग्रह

भुरुकुआ चाहे भुरुकुवा चाहे शुकवा क मतलब होला 'भोर क तारा'। भोर क तारा शुक (शुक्र) ग्रह के कहल जाला काहें से कि ई अक्सर भोर में सुरुज उगला से पहिले ख़ूब चटकार पूरुब ओर लउकेला। भोजपुरी भाषा की साहित्य में आ मैथिली आ मगहियो में ई शब्द बहुत चलनसार बाटे।

भोजपुरी लोकगीत

भोजपुरी लोकगीत भारत आ नेपाल के भोजपुरी क्षेत्र में, आ कुछ अउरी देसन में जहाँ भोजपुरी भाषा बोले वाला लोग बसल बा, परंपरागत रूप से गावल जाए वाला लोकगीत हवें। भारत में भोजपुरी इलाका के बिस्तार पूरबी उत्तर परदेस, पच्छिमी बिहार, झारखंड आ छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सा में बा आ नेपाल के तराई वाला इलाका के कुछ हिस्सा भोजपुरी भाषी क्षेत्र में आवे लें, जहाँ ई लोकगीत चलनसार बाने। अन्य जगहन में सूरीनाम, फिजी, मॉरिशस इत्यादि देशन में जहाँ भोजपुरी भाषी लोग बाटे एकर प्रचलन बाटे।आमतौर पर एहू के दू गो बिभेद में बाँटल जा सकेला। एक हिस्सा ओह गीतन के बा जवन परंपरा में पुराना जमाना से चलि आ रहल बाड़ें। इन्हन के रचना के कइल ई किछु अता-पता नइखे। सैकड़न साल में ई गीत बनल बाड़ें। कजरी, सोहर, झूमर इत्यादि परंपरागत गीत एही श्रेणी में आई। दूसरा ओर पछिला कुछ समय में प्रोफेशनल लोग के द्वारा लोकगीत के एगो बिधा के रूप में बिकसित करि के गावे के परंपरा शुरू भइल। भिखारी ठाकुर के बिदेसिया से ले के वर्तमान समय के ढेर सारा गायक लोग के गीत के लोकगीत के बिधा में कहल जाला।

भोजपुरी लोकगीतन के एकट्ठा करे के दिसा में कई लोग काम कइल। परसिद्ध भाषा बिग्यानी आ भारत के भाषाई सर्वे करे वाला जार्ज ग्रियर्सन कुछ भोजपुरी लोकगीत सभ के एकट्ठा क के उनहन के अंगरेजी में अनुवाद 1886 में रॉयल एशियाटिक सोसायटी के जर्नल में छपववलें। देवेंद्र सत्यार्थी कुछ अहिरऊ गीत "बिरहा" सभ के संकलन करिके छापा में छपववलें। भोजपुरी लोकगीतन के साहित्यिक दृष्टि से अध्ययन कई गो लोग कइले बाटे जेवना में कृष्णदेव उपाध्याय के काम बहुत महत्व वाला बाटे। एकरे अलावा श्रीधर मिश्र आ विद्यानिवास मिश्र के लिखल चीज भी खास महत्व के बा।

भोजपुरी सिनेमा

भोजपुरी सिनेमा में, भारत के पूरबी उत्तर प्रदेश आ पच्छिमी बिहार के भाषा भोजपुरी में बने वाली फिलिम सभ के गिनल जाला। पहिली भोजपुरी फिलिम विश्वनाथ शाहाबादी के गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबों रहे जेवन 1963 में रिलीज भइल रहे। अस्सी के दशक में कई ठे उल्लेख जोग भोजपुरी फिलिम रिलीज भइली जिनहन में बिटिया भइल सयान, चंदवा के ताके चकोर, हमार भौजी, गंगा किनारे मोरा गाँव, आ सम्पूर्ण तीर्थ यात्रा के नाँव प्रमुख रूप से गिनावल जाला।

पुराना समय में भोजपुरी में फिलिम बनावे के काम भी बंबई में होखे आ ई हिंदी सिनेमा के एक ठो हिस्सा के रूप में बनावल जायँ। अब एह फिलिम सभ के निर्माण भोजपुरी इलाका में भी हो रहल बा आ गोरखपुर, बनारस आ पटना नियर छोट शहर भी एह इंडस्ट्री के हिस्सा बन चुकल बाने।

भोजपुरी फिलिम के मुख्य दर्शक लोग पूरबी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड आ नेपाल के मधेस इलाका में बा लो जहाँ के ई भाषा हवे। एकरे अलावा अन्य शहर सभ में रहे वाला भोजपुरी भाषी लोग बा। एही कारन भोजपुरी सिनेमा के दर्शक यूरोप आ अमेरिकी देस सभ में भी बा आ सूरीनाम नियर देस सभ में भी जहाँ भोजपुरी बोलल जाले।

रवीन्द्र कुमार 'राजू'

रवीन्द्र कुमार 'राजू' एगो भोजपुरी लोकगीत गायक रहलें। 'राजू'के साल 2002 में उनकर भोजपुरी एलबम 'ए बलम जी' आ गाना 'खेत बारी बंटि जाई' से कमे उमिर में शोहरत मिल गइल रहे। जेवना के बाद उनकर कई गो एलबम टी-सीरीज आ अउरी दोसरा संगीत कंपनियन से जारी भइल। राजू के भोजपुरी संगीत में उनकर दमदार आवाजा खातिर जानल जाला। उनकर 30 दिसंबर 2017 के लंबी बीमारी के बाद बनारस में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल में निधन हो गइल।

लिट्टी

लिट्टी, बाटी या भउरी भोजपुरी क्षेत्र के एक ठो पकवान हवे जे गोहूँ के आटा के बनल गोल-गोल लोई के रूप में होला आ एकरे बीच चना के सतुआ के चटक मसाला भरल होला आ ई आगि के भउर में सेंक के बनावल जाला। आम तौर पर ई गोइंठा के आगि में सेंकल जाला हालाँकि, कोइला के आंच में या आधुनिक ओवन में भी संकल जा सकेला। नया जमाना में एकरा तेल में छान के भी बनावल जा रहल बाटे। लिट्टी के गाढ़ दाल, चोखा या मीट के साथ खाइल जाला। लिट्टी-चोखा प्रसिद्ध आ पूरा भोजन हवे। बिहार आ झारखंड में टीशन के आसपास या बजार में चोखा के साथ लिट्टी बेचे वाला ठेला एक ठो आम दृश्य हवे। लिट्टी-चोखा के भोजपुरी संस्कृति आ बिहार के पहिचान के रूप में देखल जाए लागल बा आ अब ई भोजन देस-बिदेस में ले पहुँच बना चुकल बाटे।

संस्कृति

कौनों भी पुरान भा वर्तमान लोगन के समूह के आचार- बेहवार के सगरी अमूर्त तत्वन के एकट्ठा रूप होला संस्कृति । जब कवनो संस्कार के आकर के रूप में देखल जाला वोह आकर के नाम ह संस्कृति । संस्कृति सभ्यता के क्रियारूप होला जवन आदमी के ब्यक्तिगत भा सामाजिक लुरी,रहन,शहुरि,पहिरावा,उठ -बइठ,बोली ,बिचार भा सामाजिक क्रियाकलाप के रूप में लउकेला। जतना भी देवनागरी लिपि से जुडल भाषा बडिस उ सब भाषा में एकरा के संस्कृति ही कहल जाला अंगरेजी में एकरा के culture कहल जाला।

संस्कृति शब्द के उत्पत्ति

संस्कृति शब्द के उत्पत्ति संस्कृत शब्द के साथ साथ मानल जाला। संस्कृत भाषा के उत्पत्ति [1] प्राकृत,यवाणी,भजपुरी(भोजपुरी ) ,अवधी ,मैथली ,सैथली कुवांड,लुवांड,ज्वाठी,हलथि,मियांजा ,संस्थाली, बिरोछा ,कुमान्ड आदि चौदह भाषा के संस्कार देला से भइल बा । एह प्रकार से भाषा आ संस्कृति के संबंध नोह् आ मांस नियन एक दूसरा के पूरक बन गईल।हर भाषा के आपन संस्कृति होला,एकर कारण मानव सभ्यता के बिकाश के समय में मानव के अलग अलग समूह में रहेके प्रविर्ती के मानल जाला। भोजपुरी भाषा संस्कृत से भी पुरान भाषा ह। आज सांस्कृतिक कर्मकांड में बहुत क्रिया के भोजपुरी संस्कृति के अनुसार कइल जाला जैसे भोजपुरी संस्कृति के मट्कोड ,भूमिपूजन बनल।

संस्कृति के अंग -

भाषा :- भाषा कवनो भी संस्कृति के मुख्य अंग मानल जाला। भाषा के मुख्य शक्ति शब्द होला आ शब्द वोह संस्कृति में कइल जाये वाला सामाजिक क्रिया कलाप आ अनुभव के प्रतिफल होला। जवना भाषा में शब्द संख्या जतना ज्यादा होई उ ओतना समृद्ध भाषा मानल जाला संपूर्ण भाषा में सबसे ज्यादा शब्द संस्कृत भाषा में बा आ संस्कृत में 12 आना शब्द भोजपुरी भाषा से गईल बा। संस्कृत ब्याकरण में तीन लिंग भी भोजपुरी संस्कृती के देन मानल जाला।भोजपुरी भाषा सहचर शब्द के सबसे ज्यादा धनि भाषा ह। बिना सहचर शब्द के कवनो भी शब्द भोजपुरी में नईखे जैसे पानी -वानी ,खाना-पीना,बैठाल -वैठाल आदि ई सहचर शब्द भोजपुरी में प्राकृत भाषा से जुडल बा। एह प्रकार से भोजपुरी के शब्द संख्या बहुत बढ़ जाला।

पहिरावा:-पहिरावा भा पहिरन कवनो भी संस्कृति के दूर से लउकेवाला चीज है। कवनो भी संस्कृति में पहिरन के आधार जलवायु ,सुलभता आ सहजता के मानल जाला। पूरा भारत में कवनो भी बिधार्थी के यदि ई कहब की ये बाबू तनी किशान के चित्र बनाव त उ फट से भोजपुरी पहिरन से सज़ल पुरुष के चित्र बना दी। भारत ही ना बहुत सारा देश में किशान के चित्र में भोजपुरी पहिरन ही लउकेला ला।पहिरन संस्कृति के पहिचान ह। एह से पहिरन के संस्कृति के मुख्य अंग मानल जाला।

क्रिया-कलाप :-आदमी के क्रिया-कलाप ओकरा संस्कृति से झळकावेला। रोज करे वाला काम भी संस्कृति के आधार पर होला। एह से आदमी के रोज के क्रिया-कलाप भी संस्कृति से अंग मानल जाला।

सामाजिक परम्परा :- सामाजिक परंपरा हमेशा संस्कृति के आधार प होला आ एकरा के संस्कृति के आधार आ अंग मानल जाला।

तिउहार :- तिउहार संस्कृति के मुख्य अंग मानल जाला। तिउहार सामाजिक क्रिया-कलाप के अंग ह। समाज में मनवाल जएवाला तिउहार संस्कृति के पहिचान होला।संस्कृति के महत्व :- मानवता के श्रृंगार ,पालन ,आ रक्षा करे में संस्कृति के महत्वपूर्ण भूमिका बा ,संस्कृति बिहिन मानव समाज जीव मात्र बन के रह जाला। संस्कृति खाली मानवता खाती मात्र ना होके एह धरती प के जीव खाती भी बहुत आवस्यक बिआ। पशु-पालन ,कृषि संस्कृति के आधार प ही बिकाश करेले। सामाजिक बिकाश के आधार में संस्कृति रीढ़ के हड्डी नियन भूमिका निर्वाह करेली। संस्कृति से परिवार ,समाज ,देश के संबंध सूत्र मिलेला।

सतुआन

सतुआन भोजपुरी संस्कृति के काल बोधक पर्व ह। हिन्दू पतरा में सौर मास के हिसाब से सुरूज जहिआ कर्क रेखा से दखिन के ओर जाले तहिये ई पर्व मनावल जाला। एहि दिन से खरमास के भी समाप्ति मान लिहल जाला।

सतुआन के बहुत तरह से बनावल जाला, सामान्य रूप से आज के दिन जौ के सत्तू गरीब असहाय के दान करे के प्रचलन बा। आज के दिन लोग स्नान पावन नदी गंगा में करे ला, पूजा आदि के बाद जौ के सत्तू, गुर, कच्चा आम के टिकोरा आदि गरीब असहाय के दान कइल जाला आ ईस्ट देवता, ब्रह्मबाबा आदि के चढ़ा के प्रसाद के रूप में ग्रहण कइल जाला ई काल बोधक पर्व संस्कृति के सचेतना, मानव जीवन के उल्लास आ सामाजिक प्रेम प्रदान करेला।

भोजपुरी से जुड़ल बिसय

दुसरी भाषा में

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